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आडवाणीजी के आवास पर संगीतमय एकल नाटक 'तुलसी' का मंचन
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  Monday, 15 December 2008

आडवाणीजी शेखर सेन के अभिनय की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए

 

 प्रसिध्द नाटय कलाकार और गायक श्री शेखर सेन ने मंगलवार 16 दिसम्बर, 2008 को श्री लालकृष्ण आडवाणी के आवास पर लगभग 300 खास दर्शकों के समक्ष अपने प्रसिध्द संगीतमय एकल नाटक 'तुलसी' का मंचन किया।

 शेखर सेन (http://www.shekharsen.com) एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी और दूरदर्शी  कलाकार हैं जिन्होंने नाटककार, निर्देशक, अभिनेता, गीतकार और गायक की भूमिकाओं के सम्मिश्रण से एकल अभिनीत संगीतमय नाटकों की एक नई शैली का सृजन किया है। शेखर सेन की अद्वितीयता न केवल भाव-भंगिमाओं में है अपितु विषय-वस्तु में भी निहित है। उन्होंने भारतीय संस्कृति रूपी बड़े जलाशय में निरन्तर डुबकी लगाई है ताकि कलात्मक रचनाओं की उन मणियों को ढूंढा जा सके जिनकी जड़ें हमारी परम्पराओं में गहरी समाई हुई हैं और जो वर्तमान समय में भी प्रासंगिक हैं। 'गोस्वामी तुलसीदास' (1998) उनका पहला नाटक था। इसके बाद इन्होंने कबीर और विवेकानन्द नाटकों का मंचन किया।

 शेखर सेन ने रायपुर शहर, छत्तीसगढ़ में ग्वालियर घराने के एक संगीतज्ञ परिवार -डा0 अरूण कुमार सेन और डा0 अनिता सेन के यहां जन्म लिया। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में रसखान, रहीम, ललित किशोरी और भूषण् बिहारी जैसे मध्यकालीन कवियों की काव्य-रचनाओं के गायक के रूप में अपनी निजी पहचान बनाई। उन्होंने 1000 से अधिक मंच कार्यक्रम प्रस्तुत किये और 165 से अधिक कैसेटें तथा सी.डी. जारी की हैं। उन्होंने प्रसिध्द टेलिविजन सीरियल रामायण में पार्श्व संगीत भी दिया है।

गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623) का जन्म का नाम रामबोला था। उनका जन्म हुमायूं के शासनकाल में, उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में ब्राहमण माता-पिता, हुलसी और आत्माराम दुबे के घर हुआ। तुलसी को उनके माता-पिता ने जन्म लेने के तत्काल बाद त्याग दिया था और उनका पालन-पोषण एक निम्न जाति के दम्पति के घर हुआ। पन्द्रह वर्ष की आयु में उन्हें नरहरिदास नाम के साधु को सौंप दिया गया जिनके साथ उन्होंने पवित्र स्थानों की यात्रा करते हुए सम्पूर्ण उत्तरी भारत का भ्रमण किया। बड़ा होते ही तुलसीदास ने अयोध्या और उसके बाद वाराणसी में अपना आसन जमा लिया। उन्होंने दैवी प्रेरणा से वाल्मीकि रामायण के हिन्दी रूपान्तर 'रामचरित मानस' महाकाव्य की रचना करनी शुरू कर दी जिसका उद्देश्य जनमानस में रामायण को लोकप्रिय बनाना था। आज रामचरित मानस, बाईबल और कुरान के बाद विश्व में सबसे अधिक बिकने वाली तीसरी पुस्तक है।

 शेखर सेन एकल गायन की कलात्मक शैली का प्रयोग करते हुए और बीच-बीच में रामचरित मानस तथा हुनमान चालीसा के दोहे गाते हुए गोस्वामी तुलसी के बचपन से लेकर वृध्दावस्था तक एक संत का जीवन जीने वाले व्यक्ति की खोज करते हैं। सेन का विशिष्ट गीत  एक सम्मोहक रचना और असीम गतिशीलता से उस समय काफी रोचक बन जाता है जब वे एक पात्र से  दूसरे पात्र की भूमिका को बदलकर कभी बजरंग बली के रूप में; कभी बच्चे के रूप में; कभी पत्नी रत्नावली के रूप में; कभी बनारस के विरोध करने वाले पंडितों के रूप में बोलकर अलग-अलग पात्र का अभिनय करते हैं। जैसा आडवाणीजी ने उनके स्वागत में कहा है : सेन की कला बेजोड़ है।


 इस नाटय मंचन का बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन और अन्य पार्टियों के सांसदों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनीजी, मीडिया के लोगों तथा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों - श्री शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह जैसे कुछ सम्मानीय मेहमानों ने आनन्द उठाया। आडवाणीजी ने दर्शकों के मिजाज को अच्छी तरह से भांपकर अपनी टिप्पणी में कहा ''शेखर जी गोस्वामी तुलसीदास की आंखों से छलकते हुए आंसुओं का वर्णन कर रहे थे। उन्होंने संत के जीवन का जो सुन्दर चित्रण किया है, उससे काफी भाव-विभोर होकर मेरी आंखों में आंसू आ गए हैं।''

 

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