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भारत में अमीर और गरीब के बीच खाई के बारे में आडवाणीजी के विचार
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मैं जब भी पीछे मुड़कर पिछले छह दशकों की भारत की राजनीतिक यात्रा को देखता हूँ तो सन् 1947 की अपूर्ण आकांक्षाओं और साकार नहीं हो सके सपनों के अंबार को देखकर मन की गहराई में उदास हो जाता हूँ। हर वर्ष मेरी सर्वाधिक पीड़ा का क्षण वह होता है जब मैं ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल और यूनाइटेड नेशंस की दो वार्षिक रिपोटर्ें देखता हूँ। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट भ्रष्टाचार सूचकांक के आधार पर देशों को दर्जा प्रदान करती है, जिसमें विश्व के सबसे भ्रष्ट देशों में भारत को हमेशा ऊँचा दर्जा दिया जाता है तथा मानव विकास सूचकांक पर यूनाइटेड नेशंस की वार्षिक रिपोर्ट भारत को उन देशों के साथ निचले क्रम में रखती है, जिनका इस मामले में प्रदर्शन फिसड्डी है। हमारी अर्थव्यवस्था की कुछ दिखाई देनेवाली सफलताओं के बावजूद मानव विकास सूचकांक में हमारी स्थिति विश्व के सौ से अधिक देशों से नीचे है और विकास के कुछ मानदंडों पर वह हमें अफ्रीका के सहारा खंड के देशों की श्रेणी में रखती है।

हम करोड़ों देशवासियों को अब तक पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हमारी आधी से अधिक आबादी स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में भूख हमारे कई देशवासियों को अब भी शिकार बना लेती है और इन अभावों के परिणामस्वरूप हमने अपने निर्धन देशवासियों को, जिनमें से अधिकांश के पास ठीक-ठाक मकान भी नहीं हैं, इन बीमारियों के हवाले कर दिया है, जिनसे बचा जा सकता है, लेकिन जो अकसर जानलेवा सिध्द होती हैं। इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि हमारे आदिवासी क्षेत्रों में कई शिशु कुपोषण की वजह से मर जाते हैं या यह कि हमारे देश में लगभग दो करोड़ लोग शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम हैं? और इस तथ्य से ज्यादा दिल दहलानेवाली बात क्या होगी कि हाल के वर्षों में समस्त देश में कई हजार किसानों ने आत्महत्या कर ली है? सामाजिक अन्याय और महिलाओं पर अत्याचार मेरे मन में खलबली मचाते हैं। हमारे लाखों बच्चोंजिन्हें मेहनत-मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जबकि उन्हें खेलना और पढ़ना चाहिएका खोया हुआ बचपन मेरे हृदय में उदासी भर देता है। हमारी शहरी झुग्गी बस्तियों की गंदगी और हमारे कई गाँवों का उजड़ा हुआ रूप मुझे शर्मिंदा कर देता हैऔर ये निश्चय ही किसी भी विचारशील व्यक्ति को शर्मिंदा कर देंगेकि हमारी विकास प्रक्रिया में कोई गंभीर चूक हुई है।

यह सच है कि कुछ समग्र मानदंडों के अनुसार हमारी अर्थव्यवस्था जिन ऊँचाइयों को छू रही है, वह पहले कभी नहीं देखी गई। आज की ऊँची सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) विकास दरों ने लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, जिसने हमारे लोगों की उद्यमशीलता का गला घोंट दिया था, के युग में हुई धीमी गति के विकास को बहुत पीछे छोड़ दिया है। परंतु विकास एक ऑंकड़े से कुछ अधिक होना चाहिए, जो प्रकट करने से अधिक छिपाता है। तकनीकी रूप से यह सच है कि वृध्दि दर 9 प्रतिशत है, परंतु यह वृध्दि भौगोलिक और जनसांख्यिकीय खंडों तक व्याप्त नहीं है। समूचे भारत की आर्थिक वृध्दि 9 प्रतिशत की दर से नहीं हो रही है। भारत का एक छोटा सा हिस्सा 20 प्रतिशत या इससे भी अधिक की दर से बढ़ रहा हो, लेकिन अधिकांश भारत में यदि कोई वृध्दि हो तो भी वह वृध्दि के निचले अंक पर ही अटका हुआ है। विकास का 'रिसाव सिध्दांत' इस धर्म-संकट का एक असमान उत्तर है और लोकतंत्र में देर तक नहीं चल सकता, क्योंकि 'वंचित' बहुसंख्यक जनता, जो विकास की बूँदों के रिसने का इंतजार कर रही है, साफ तौर पर देख रही है कि विकास के 'लाभान्वितों' के लिए उसका झरना बह रहा है। यह स्थिति पूरे भारत में संघर्ष के गंभीर स्तरों को जन्म दे रही है। स्पष्ट रूप से अब समय आ गया है कि हम अपनी आर्थिक नीति पर कड़ी नजर डालें। हमें पूरी ईमानदारी से स्वयं से पूछना चाहिएइस (आर्थिक नीति) ने भारत के गरीबों को वह सब क्यों नहीं दिया, जो उसने अमीरों को दिया है?

हम दूसरे मोर्चों पर भी असफल हो रहे हैं। भारत राष्ट्र-विरोधी बाहरी शक्तियों द्वारा प्रवर्तित आतंकवाद, जो सामाजिक शांति और आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है, के प्रति अब भी नरम बना हुआ है। संसद् और न्यायपालिका सहित हमारी कई जनतांत्रिक संस्थाएँ हमारी जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर रही हैं। यह सच है कि हमारे यहाँ सावधि चुनावों के बाद सत्ता का हस्तांतरण हमेशा सुगम और शांतिपूर्ण रहा है। परंतु बढ़ते हुए धन और बाहुबल के उपयोग से चुनाव-प्रणाली कमजोर हो चुकी है। विविधता सचमुच हमारी शक्ति है, परंतु कभी-कभी विविधता के इस बिंदु पर इतने एकतरफा ढंग से जोर दिया जाता है कि वह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को हानि पहुँचाता है।

    मैंने इन सरोकारों का जिक्र इसलिए किया है, क्योंकि एक बेहतर भारत के निर्माण की हमारी आकांक्षा तभी पूरी हो सकती है, जब हम इनसे निपटने की क्षमता विकसित करें।

-'मेरा देश मेरा जीवन' पुस्तक के मनोगत से
 

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