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मैत्रीपूर्ण भावना के विकास की तुलना में जब घृणा फैलाने के लिए प्रचार किया जाता है, तब यह इतना सफल क्यों होता है? - बट्रेंड रसेल, ब्रिटिश दार्शनिक एवं शांति कार्यकर्ता मैं गृह मंत्रालय में अपने छह वर्षों का विवरण इस घटना के साथ समाप्त कर रहा हूँये एक नहीं, बल्कि दो परस्पर जुड़ी घटनाएँ हैंजब छह वर्ष तक के कार्यकाल में वाजपेयी सरकार, हमारी पार्टी तथा उसकी विचारधारा की छवि धूमिल करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरजोर ढंग से निरंतर प्रचार अभियान चलाया गया था। मैं फरवरी-मार्च 2002 में गोधरा कांड तथा गोधरा के पश्चात् के दोनों चरणों में गुजरात में भड़की सांप्रदायिक हिंसा का उल्लेख कर रहा हूँ। मैंने बार-बार कहा है कि दोनों घटनाएँ ऐसी थीं जो असमर्थनीय थीं और 'मेरी सरकार के नाम पर लगा धब्बा' थीं। मैं इन घटनाओं से बहुत अधिक दु:खी हो गया था; क्योंकि इन घटनाओं से वाजपेयी सरकार की छवि धूमिल हो गई थी, जिसका अभी तक यह रिकॉर्ड रहा था कि उसके शासन काल में देश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की संख्या में बहुत अधिक कमी आई है।
गुजरात में इस दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम के बाद कांग्रेस तथा अन्य छद्म सेक्युलरवादी तीन झूठे मुद्दों के आधार पर निरंतर मेरी पार्टी के विरुध्द बढ़-चढ़कर दुष्प्रचार करने लगे। अभी भी ये झूठ विद्यमान है। पहला झूठ यह है कि गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा मुस्लिम समुदाय के प्रति राज्य-प्रयोजित सुनियोजित नरसंहार है। दूसरा झूठ यह है कि जब पूरा गुजरात हिंसा की आग में झुलस रहा था तब केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार ने कुछ नहीं किया। और तीसरा झूठ यह है कि साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में लगी आग के कारण गोधरा नरसंहार आकस्मिक था और इससे भी बदतर, यह कहा गया कि आग स्वयं भड़की थी। मेरा यह कर्तव्य है कि मैं इन तीनों झूठी बातों की सच्चाई प्रस्तुत करूँ।
30 अप्रैल, 2002 को लोकसभा में एक बहस के दौरान बोलते समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुजरात की हिंसा को 'नरसंहार' बताया, और कहा, '...लेकिन अंतत: जीत सत्य की होगी।' आधिकारिक सूचना के अनुसार तथा उनकी खुद के सरकार के अनुसार सत्य कुछ और था। विभिन्न धर्मों के मारे गए लोगों के विस्तृत ब्योरे इस प्रकार थेमुस्लिम 790, हिंदू 254; इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए। मैं स्वीकार करता हूँ कि गैर-सरकारी रूप से मरनेवालों की संख्या और अधिक हो सकती है। लेकिन क्या इस प्रकार के त्रासदीपूर्ण कांड को मुस्लिमों का 'नर-संहार' कहा जा सकता है, जिसमें मारे गए हिंदुओं की संख्या भी कम नहीं थी? बहस के दौरान प्रधानमंत्री वाजपेयी ने सोनिया गांधी को चेतावनी दी कि वे इतने कठोर शब्दों का प्रयोग न करें। लेकिन वे निरंतर ऐसे शब्दों का प्रयोग करती रहीं, जिनका खूब प्रचार हुआ तथा हमारे देश के लिए अहितकर शक्तियाँ सक्रिय हो गईं, ताकि हमारी सरकार को ही नहीं बल्कि गुजरात और भारत को भी बदनाम किया जा सके।
यहाँ इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि अहमदाबाद, वडोदरा तथा गुजरात के अन्य हिस्सों में पुलिस फायरिंग की दर्जनों घटनाओं में 200 से भी अधिक दंगाई मारे गए। पुलिस द्वारा लगभग 10,000 राउंड गोलियाँ दागी गईं। प्रारंभिक दिनों में पुलिस ने लगभग 18,000 हिंदुओं और 3,800 मुस्लिमों को एहतियातन बंदी बना लिया था। क्या इससे यह स्पष्ट होता है कि पूर्व-नियोजित योजना के तहत मुसलमानों की सामूहिक हत्या के पीछे राज्य सरकार का हाथ था और इस दौरान राज्य के सुरक्षा-तंत्र एवं साधन निष्क्रिय रहे?
क्या केंद्र मूकदर्शक बना रहा?
केंद्र पर यह आरोप लगाया गया कि जब गुजरात हिंसा की आग में झुलस रहा था तब केंद्र सरकार मूकदर्शक बनी रही। इस संबंध में मैं निम्नलिखित तथ्य स्पष्ट करना चाहता हूँ। 27 फरवरी को गोधरा में हुए नरसंहार के कुछ घंटों के भीतर गोधरा और अहमदाबाद में रेपिड ऐक्शन फोर्स (आर.ए.एफ.) की तैनाती करने के साथ-साथ तत्काल 'रेड अलर्ट' की घोषणा कर दी गई। अगले ही दिन राज्य सरकार ने केंद्र से अनुरोध किया कि गुजरात में सेना भेज दी जाए। साथ ही पड़ोसी राज्यों से अनुरोध किया गया कि वे अपने सशस्त्र पुलिस बल गुजरात में भेजें। उसी रात प्रधानमंत्री वाजपेयी ने रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज को अहमदाबाद भेजा, जहाँ रक्षामंत्री ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सेना की तैनाती के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की। 1 मार्च की सुबह सैनिकों से लदे हवाई जहाज वहाँ पहुँच गए तथा दोपहर होने से पहले ही संवेदनशील स्थानों पर सैनिकों की तैनाती का कार्य आरंभ हो गया। अहमदाबाद, राजकोट और वडोदरा आदि दंगा-प्रभावित क्षेत्रों में विलंब किए बिना सेना फ्लैग मार्च करने लगी। जब दंगे नहीं रुके तब राज्य सरकार ने गुजरात भर में देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए।
गोधरा से बाहर हिंसा फैलने के तीन दिनों के भीतर मैंने राज्य का दौरा किया, जिसके बारे में मीडिया ने इस प्रकार रिपोर्ट दी। आडवाणी द्वारा गुजरात की स्थिति का जायजा, सरकार को सख्ती बरतने को कहा केंद्रीय गृहमंत्री एल.के. आडवाणी ने रविवार को कहा, 'हम किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक तनाव की अनुमति नहीं देंगे।' उन्होंने यह भी कहा कि गोधरा में भीड़ का हमला तथा उसके बाद भड़की हिंसा उनकी पार्टी के चार वर्ष के इस रिकॉर्ड पर लगा कलंक है कि उनकी सरकार 'सांप्रदायिक तनाव से मुक्त' रही है। उन्होंने दावा किया कि सरकार सांप्रदायिक सद्भावना एवं भाईचारा बहाल करने पर सबसे ज्यादा प्राथमिकता देगी। गृहमंत्री ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और वरिष्ठ प्रशासनिक, पुलिस और सैन्य अधिकारियों के साथ बैठकें आयोजित कीं तथा सिविल अस्पताल एवं बापू नगर, नरोदा व मेघनी नगर के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने कहा कि गोधरा कांड तथा राज्य में इसके बाद फैली हिंसा के बारे में सरकार की तीन प्रमुख जिम्मेदारियाँ हैं। पहली, हमें अपराधियों को पकड़ना है; दूसरी, किसी प्रकार की हिंसा की पुनरावृत्ति को रोकना है, तथा तीसरी, प्रत्येक नागरिक और समुदाय के लिए शांति व सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। आडवाणी ने उस क्षेत्र का भी दौरा किया, जहाँ कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी तथा उनके परिवार के 19 सदस्य जलकर राख हो गए थे। उन्होंने दु:खी परिवार के सदस्यों को सांत्वना दी।'
उससे पहली शाम को मैंने नई दिल्ली में प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओें के साथ गुजरात की स्थिति पर विचार-विमर्श करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में भाग लिया था। देश के अन्य भागों में हिंसा फैलने की आशंका से चिंतित अटलजी और मैंने महसूस किया कि पार्टी के संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति संकल्प-शक्ति दर्शाई जाए, ताकि सांप्रदायिक शांति और सद्भावना बनी रहे। तदनुसार प्रधानमंत्री ने यह आश्वासन दिया था कि केंद्र गुजरात की स्थिति से दृढ़तापूर्वक निपटेगा। इस आश्वासन के बाद हमने विपक्षी दलों के नेताओं से अनुरोध किया कि हर कीमत पर शांति बनाए रखने तथा बंधुत्व और एकता को बढ़ावा देने के लिए देशवासियों के नाम अपील जारी करने में हमारा साथ दें। इस अपील पर हस्ताक्षर करनेवालों में अटलजी और मेरे अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल, सोनिया गांधी, भाजपा अध्यक्ष जना कृष्णमूर्ति, कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत तथा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव थे।
हमारे विरोधियों के प्रचार के बावजूद समूचा गुजरात दंगों की चपेट में नहीं आया था। केंद्र तथा राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से हिंसा की आग राज्य के बाकी हिस्सों में फैलने से बच गई थी। यह तथ्य कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि केंद्र ने इस प्रकार का दंगा अन्य राज्यों में न फैलने के लिए कारगर उपाय किए।
4 अप्रैल, 2002 को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने गुजरात का दौरा किया। अहमदाबाद में शाह आलम राहत शिविर में लगभग 8,000 दंगा-प्रभावित मुस्लिमों ने आश्रय लिया था। प्रधानमंत्री ने बताया, 'संकट की इस घड़ी में आप अकेले नहीं हैं। हम सभी आपके साथ हैं। पूरा देश आपके साथ है। अपने ही देश में शरणार्थी हो जाना, यह दिल को चीरनेवाली बात है। गोधरा में जो कुछ हुआ, वह निंदनीय है, पर उसके बाद राज्य के अन्य भागों में जो कुछ हुआ वह भी शोचनीय है।' उन्होंने खेद प्रकट किया कि 'गुजरात में फैली हिंसा के कारण राष्ट्रों के समुदाय में भारत की स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। मैं नहीं जानता कि किस मुँह से मैं इस घटना के बाद विदेश जाऊँगा। यह पागलपन बंद होना चाहिए।'
अप्रैल के उत्तरार्ध्द में संसदीय बहस में मैंने कहा था, 'इस बहस में भाग लेते हुए मैं दु:ख का अनुभव करता हूँ। पिछले चार वर्षों के स्वच्छ और गौरवमय तथा दंगा-मुक्त शासन का हमारा रिकॉर्ड इस घटना से कलंकित हो गया। जब मैं समग्र रूप में गुजरात के घटनाक्रम पर दृष्टिपात करता हूँ तो यह कहने से स्वयं को नहीं रोक पाता कि गोधरा तथा गोधरा के बाद की हिंसा अक्षम्य, निंदनीय एवं लज्जाजनक है। सदन के सम्मानित सदस्यों द्वारा सदन में वर्णित गोधरा के बाद की घटनाएँ निंदनीय हैं चाहे वे अहमदाबाद में नरोदा पटिया तथा गुलबर्ग सोसाइटी हो या वडोदरा की बेस्ट बेकरी, मेहसाना में सरदारपुरा की घटना हो या अन्य कोई भीसभी भर्त्सना योग्य हैं। गोधरा घटनाक्रम स्पष्ट कर सकता है कि उसके बाद क्या हुआ होगा, लेकिन गोधरा नरोदा पटिया या मेहसाना या किसी अन्य जगह में हुई मार-काट को न्यायोचित नहीं ठहरा सकता। मैं यहाँ तक कहना चाहूँगा कि कानून द्वारा शासित समाज में जब एक अपराधी का प्रतिशोध भी न्यायोचित नहीं हो सकता, तब निरपराध व्यक्ति के विरुध्द प्रतिशोध कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है? पीड़ित व्यक्ति हिंदू हो या मुस्लिम, सभ्य समाज में प्रतिशोध का कोई स्थान नहीं है। इसे क्रूरता, अमानवीयता ही समझा जाएगा।'
मैंने अपनी बात जारी रखी, 'मैं स्वीकार करता हूँ कि कहीं-न-कहीं प्रशासन में, पुलिस की कार्य-प्रणाली आदि में कोई चूक हो गई होगी। लेकिन यदि यह आरोप लगाया जाता है कि गोधरा के बाद की घटनाओं के पीछे स्वयं सरकार का हाथ था, जान-बूझकर किया गया नरसंहार था, राज्य सरकार द्वारा किया गया विध्वंस था तथा इस नर-संहार के पीछे सरकार थी, तो मुझे डर है कि ऐसे आरोपों से भारत के शत्रुओं को हमारे देश पर आक्रमण करने के हथियार मिल जाएँगे।' इसके पश्चात् हमारी सरकार में मंत्री तथा नेशनल कॉन्फे्रंस के नेता (तब यह पार्टी राजग की घटक थी) उमर अब्दुल्ला को उत्कृष्ट एवं संयत भाषण के लिए बधाई देते हुए मैंने उनके द्वारा की गई अपील का दृढ़तापूर्वक समर्थन किया'हमें बहस में एक-दूसरे से बाजी नहीं मारनी, बल्कि हमें देश को दिशा प्रदान करनी है।'
गुजरात में सांप्रदायिक रक्तपात की इस हताश अवधि के दौरान मैंने निर्दोष लोगों की जानें बचाने के लिए कई बार हस्तक्षेप किया। मैं यहाँ ऐसी दो घटनाएँ बताऊँगा। एक दिन मेरे पास राज्यसभा की तत्कालीन उपाध्यक्ष नजमा हेपतुल्ला का फोन आया, 'मेरे पति अकबर आपसे अहमदाबाद के कुछ मुस्लिम व्यापारियों के एक अत्यावश्यक संदेश के बारे में तुरंत बात करना चाहते हैं।' अकबर ने मुझे बताया कि बोहरा बाजार के व्यापारी मेरे पास आए हैं। वे पड़ोसी हिंदू बस्ती के सशस्त्र लोगों के आक्रमण से बचने के लिए सरकार के किसी जिम्मेदार व्यक्ति से मिलना चाहते हैं। मैंने तत्काल मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया तथा जरूरतमंदों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा। मोदी ने अगले दिन मुझे फोन पर यह बताया कि कोई अनचाही घटना घटित नहीं हुई है तथा दंगाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया है। सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद अकबर के साथ बोहरा बाजार के व्यापारियों का शिष्टमंडल मुझसे मिलने दिल्ली आया और उसने केंद्र व राज्य सरकार द्वारा समय पर किए गए उपायों के लिए आभार व्यक्त किया तथा सराहना की।
ऐसी ही एक अन्य घटना और हुई जब एक दिन कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के अनुभवी व वरिष्ठ सांसद सोमनाथ चटर्जी, जो बाद में लोकसभा अध्यक्ष भी बने, का फोन आया'आडवाणीजी, मैं बहुत जरूरी विषय पर आपसे बात करना चाहता हूँ।' उन्होंने ऐसी आवाज में कहा था कि मैं तत्काल उनकी चिंता और आवश्यकता को भाँप गया'सी.पी.आई. (एम) की भावनगर यूनिट के मेरे सहयोगियों ने मुझे अभी-अभी फोन पर बताया है कि हिंदुओं की भीड़ ने उनके कस्बे के प्रख्यात मदरसे की घेराबंदी कर ली है। वे लोग उसे जलाना चाहते हैं। उस मदरसे के भीतर बड़ी संख्या में पढ़नेवाले बच्चे और मौलवी हैं। कृपया आप यह सब रोकने के लिए कुछ करें।' मैंने तत्काल अहमदाबाद में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भावनगर में अपनी पार्टी के नेताओं से बात की और उन्हें हिदायत दी कि इस हमले को रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए तथा स्थिति पर काबू पाया जाए। मैंने यह जानकर संतोष की साँस ली कि कुछ अनचाहा नहीं हुआ। बाद में भावनगर में दौरे के समय स्थानीय सी.पी.आई. (एम) के कार्यकर्ताओं तथा मौलवियों ने मुझसे बात की तथा आभार व्यक्त किया। 'हमने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाया है।' मैंने कहा।
कुछ माह बाद स्वयं सोमनाथ चटर्जी ने एक दिन मुझे फोन किया और कहा, 'आडवाणीजी, मैं अहमदाबाद से बोल रहा हूँ। भावनगर के मेरे सहयोगी भी यहाँ पर हैं तथा मुझे बता रहे हैं कि, ''हम वास्तव में आपका आभार व्यक्त करना चाहते हैं। यदि आप समय पर बीच में नहीं पड़ते तो मदरसे के भीतर अनेक लोग जलकर मर जाते।'' मैंने उन्हें बताया कि, 'मेरे प्रति आभार क्यों व्यक्त कर रहे हैं? इसके लिए आडवाणीजी धन्यवाद के पात्र हैं।'''
मैं अभिमानवश यह सब नहीं बता रहा, बल्कि विनम्रतापूर्वक इन घटनाओं का वर्णन कर रहा हूँ। जब भी मैं अचेतन रूप में अपने कर्तव्य के बारे में सोचता हूँ तो यह अनुभव करके मुझे पीड़ा होती है, कि शांतिप्रिय भारत के आदर्श के प्रति हमारी सरकार की वचनबध्दता के बावजूद सैकड़ों निरपराध लोगों की जानें सांप्रदायिक हिंसा की आग में चली गईं। इसका इस बात से संबंध नहीं है कि वे हिंदू या मुस्लिम थे, वे सभी केवल भारतीय थे।
इसके बावजूद मैं निष्पक्ष लोगों का ध्यान इसके विपरीत वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली तथा उत्तर भारत के अन्य स्थानों पर भड़के सिख-विरोधी दंगों की ओर दिलाना चाहता हूँ, ताकि ऊपर दिए गए वर्णन तथा इन घटनाओं की तुलना की जा सके। पहले तीन दिनों में, दिल्ली की सड़कों पर कोई पुलिस का सिपाही या सैनिक नजर नहीं आ रहा था। उस दौरान लाठीचार्ज का एक भी उदाहरण नहीं मिलता। यही नहीं, जब राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह अस्पताल गए थे, जहाँ पर प्रधानमंत्री का शव रखा था, तब उनके काफिले पर भी पथराव किया गया था। हालाँकि तत्कालीन गृहमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव से बार-बार विशिष्ट, अत्यावश्यक और वैयक्तिक अनुरोध करने के बावजूद 3 नवंबर की शाम को जाकर सेना तैनात की गई। अपनी माँ के जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा, 'इंदिराजी की हत्या के बाद देश में कुछ दंगे हुए थे। हम जानते हैं कि लोग बहुत ज्यादा क्रोधित थे तथा कुछ दिनों तक ऐसा लग रहा था कि पूरा भारत हिल गया है। लेकिन जब कोई विशाल पेड़ गिरता है तो पृथ्वी का थोड़ा-बहुत हिलना स्वाभाविक है।'* वर्ष 1984 की त्रासदीपूर्ण घटनाओं पर खेद प्रकट करने में सोनिया गांधी को चौदह वर्ष लग गए।
मैं निष्पक्ष तथा पूर्वग्रहरहित लोगों को बताना चाहूँगा कि वे वर्ष 2002 में केंद्र तथा राज्य सरकारों के आचरण की तुलना नई दिल्ली तथा गांधीनगर में कांग्रेस सरकारों तथा गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा के पूर्ववर्ती असंख्य उदाहरणों में उनकी भूमिका से करें। इस राज्य में सांप्रदायिक दंगों का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 1969 में अहमदाबाद में हुए दंगे वर्ष 2002 से ज्यादा दिन फैले रहे, जिनमें ज्यादा लोगों की जानें गई। लगभग दो माह तक इस शहर में कर्फ्यू लगा रहा। वर्ष 1985 में पाँच माह से भी अधिक समय तक राज्य के अनेक भागों में सांप्रदायिक दंगे-फसाद चलते रहे, जबकि गोधरा में लगभग एक वर्ष तक कर्फ्यू लगा रहा।
• मनोज मिट्टा तथा एच.एस. फूलका, 'व्हेन ए ट्री शुक दिल्ली : द 1984 कार्नेज ऐंड इट्स आफ्टरमैथ, लोटस', 2007। इस पुस्तक में मई 2000 में न्यायमूर्ति जी.टी. नानावटी आयोग के गठन में मेरी भूमिका का उल्लेख किया गया है। इस आयोग का प्रयोजन 1984 के दंगों की पुन: जाँच करना था। फरवरी 2005 में इस आयोग ने रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन संप्रग सरकार द्वारा तैयार की गई कार्रवाई रिपोर्ट (ए.टी.आर.) का सभी क्षेत्रों में भारी विरोध हुआ और इसे 'न की गई कार्रवाई रिपोर्ट' तक कहा गया। इस पुस्तक में पुन: मेरी भूमिका का उल्लेख है, साथ ही अन्य गैर-कांग्रेस पार्टियों के नेताओं का भी, जिन्होंने सरकार को बाध्य किया गया कि ए.टी.आर. की समीक्षा की जाए तथा दंगों में लिप्त कम-से-कम एक केंद्रीय मंत्री को त्यागपत्र देने के लिए कहा जाए और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सिख समुदाय से क्षमा माँगें।
सितंबर 2004 में संप्रग सरकार नेविशेष रूप से कि लालू प्रसाद यादव की अध्यक्षता में रेल मंत्रालय नेगोधरा ट्रेन अग्निकांड की जाँच के लिए यू.सी. बनर्जी कमेटी गठित की। वस्तुत:, जैसाकि बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला दिया था, इस कमेटी का गठन अवैध था। यह कमीशंस ऑफ इन्क्वायरी ऐक्ट, 1952 का उल्लंघन था, जिसमें सार्वजनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण विषय की जाँच के लिए राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार द्वारा पृथक् आयोगों के गठन पर रोक लगाई गई है। राज्य सरकार द्वारा गठित शाह-नानावटी आयोग पहले ही गोधरा और गोधरा के बाद की हिंसा, दोनों मामलों में तहकीकात कर रहा था। अक्तूबर 2005 में जब राष्ट्रीय जनता दल बिहार में विधानसभा के चुनावों में हारने के कगार पर थी, तब बनर्जी कमेटी ने यह रिपोर्ट दी कि गोधरा कांड महज एक 'आकस्मिक घटना' थी। भाजपा के कुछ आलोचकों ने यहाँ तक कहा कि रेलगाड़ी में झुलसे कारसेवक स्वयं ही इस आग के लिए उत्तरदायी थे ताकि राज्य में अन्यत्र गोधरा की उत्तरवर्ती हिंसा के नाम पर इस घटना से लाभ उठाया जा सके। मैं इन सिध्दांतों के बारे में यही कहना चाहता हूँ कि ये सभी विचार इस दुर्घटना की तरह ही अत्यंत कू्रर और बीभत्स हैं।
नरेंद्र मोदी : योजनाबध्द दुष्प्रचार अभियान के शिकार
अकसर यह कहकर मेरी आलोचना की जाती रही है कि मैंने मोदी के त्यागपत्र की माँग दृढ़ता से ठुकरा दी। गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा फैलने के कुछ ही दिनों में यह माँग की जाने लगी तथा इसके बाद कई महीनों और वर्षों तक यह माँग जारी रही। राजग की कुछ सहयोगी पार्टियाँ भी चाहती थीं कि मोदी त्यागपत्र दे दें। प्रधानमंत्री वाजपेयी पर भी विभिन्न क्षेत्रों से निरंतर बहुत ज्यादा दबाव पड़ रहा था कि वे मोदी से त्यागपत्र माँगें। मैंने इस माँग का, यहाँ तक कि बहुत ज्यादा संवेदनशील मोड़ों पर भी, विरोध किया था।
इस बारे में मैंने अपने तर्क 6 मई, 2002 को राज्यसभा में विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किए थे, 'हमें इस राज्य की स्थिति को सुधारने के लिए कोई वास्तविक समाधान ढूँढ़ निकालना हैऔर मुख्यमंत्री मोदी को पद से हटाना कोई समाधान नहीं है। इनके विरुध्द निरंतर प्रचार अभियान चलाया जा रहा है, जो सही नहीं है। विपक्ष के नेता के नाते डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लगाया गया यह आरोप उचित नहीं है कि बड़े स्तर पर गुजरात पुलिस का सांप्रदायीकरण हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति से मेरा अनुरोध है कि पुलिस बल पर ऐसे गंभीर आरोप न लगाए जाएँ। कुछ कमियाँ हैं और मैं उनसे परिचित हूँ; परंतु हमेें यह नहीं भूलना चाहिए कि दंगों के दौरान पुलिस बल ने बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों की जानें बचाईं हैं।'
मैंने पार्टी के भीतर विभिन्न मंचों पर नरेंद्र मोदी के त्यागपत्र के लिए की गई माँग का भी विरोध किया। हमें इस बात की खुशी है कि बाद के घटनाक्रम ने उनमें मेरे विश्वास को पूर्णत: सही सिध्द किया है। वर्ष 2002-07 में, उनके मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान गुजरात में न तो एक भी सांप्रदायिक दंगा हुआ, न ही आतंकवाद की कोई एक भी घटना घटित हुई और न ही इन पाँच वर्षों में कहीं पर एक घंटे के लिए भी कर्फ्यू लगाना पड़ा। इस दौरान गुजरात में विभिन्न आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसके कारण देश-विदेश से यहाँ भारी मात्रा में निवेश किया गया तथा गुजरात देश के सर्वाधिक विकसित राज्य के रूप में जाना जाने लगा। लेकिन जिस बात से मुझे सबसे अधिक संतोष मिला, वह यह था कि मोदी ने राजनीतिक और नौकरशाही तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर काबू पाने में सफलता प्राप्त की, जिससे उनके आलोचक भी उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं रहे। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि गुजरात में सभी जातियों और समुदायों के लोगों तक सुरक्षा, विकास एवं स्वच्छ प्रशासन के प्रति वचनबध्दता का लाभ पहुँचा है।
इसका एक प्रमाण नवीनीकृत जनादेश है, जिस कारण गुजरात में दिसंबर 2007 में आयोजित विधानसभा चुनावों में भाजपा को भारी जीत हासिल हुई। कांग्रेस तथा छद्म-पंथनिरपेक्षता के समर्थक इन चुनावों को 'सांप्रदायिकता बनाम पंथनिरपेक्षता' के संबंध में राष्ट्रीय जनमत-संग्रह में परिवर्तित करना चाहते थे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि वे अपने इरादों में बुरी तरह से विफल रहे। इससे भी ज्यादा बुरा यह हुआ कि वे ईमानदारी से आत्म-विश्लेषण करने के लिए अनिच्छुक दिखाई देते हैं तथा अपनी इस हार से कोई उचित निष्कर्ष भी नहीं निकालना चाहते।
मोदी के पुनर्निर्वाचित होने से कई बातें उजागर होती हैं, जो केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए महत्त्व रखती हैं। उन्होंने पारंपरिक धारणा को गलत साबित किया कि सुराज को उत्कृष्ट राजनीति के दर्पण में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने इस धारणा का खंडन किया कि विकास के मुद्दे पर चुनाव नहीं जीता जा सकता। गुजरात में भाजपा ने इस विश्वास को गलत ठहरा दिया है कि लोगों की जाति और समुदाय संबंधी भावनाओं को भुनाकर चुनाव जीते जा सकते हैं। इसके अलावा सी.पी.आई. (एम) के शासन में पश्चिम बंगाल से उलटा गुजरात में भाजपा ने यह दिखा दिया कि चुनावी कदाचार का सहारा लिये बिना भी नवीनीकृत जनादेश प्राप्त किया जा सकता है।
मैं एक अन्य कारण से गुजरात चुनावों के परिणाम को महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। इससे पता चलता है कि किस तरह से एक निष्ठावान्, साहसी एवं समर्थ नेता लोगों के समर्थन से दुष्प्रचार के निजी अभियान को पराभूत कर सकता है। मैंने पिछले साठ वर्षों के दौरान भारतीय राजनीति में ऐसा कोई नेता नहीं देखा, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर निरंतर इतने घृणित तथा अनैतिक रूप से बदनाम किया गया हो, जितना मोदी को सन् 2002 से। सोनिया गांधी ने तो सारी मर्यादा तोड़कर उन्हें 'मौत का सौदागर' तक कह दिया। मुझे प्रसन्नता है कि गुजरात के लोगों ने ऐसी विषैली राजनीति करनेवालों को सटीक उत्तर दिया।
हमारे देश में विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव होते रहते हैं; लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में किसी राज्य विशेष में जनता का फैसला 'निर्णायक बिंदु' बहुत कम ही बनता है। मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि गुजरात में हमारी पार्टी की जीत वास्तव में एक निर्णायक बिंदु बनेगी, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि अगले संसदीय चुनावों में भाजपा का पुनरुत्थान होगा और उसे विजय प्राप्त होगी।
-माय कंट्री माय लाइफ से उध्दरण |