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बच्चों के पोषाहार के बारे में आडवाणीजी के विचार
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  वास्तव में यह बहुत ही चिन्ता का विषय है कि भारत में बड़ी संख्या में बच्चे -एक अनुमान के अनुसार, 46 प्रतिशत - कुपोषण के शिकार हैं। गरीबी के कारण पुराने मामलों में कुपोषण से होने वाली मृत्यु और बीमारी की दरें काफी अधिक है। भारतीय बच्चों में हर तीसरा बच्चा पैदा होने के समय काफी कम वजन, 2.5 कि.ग्रा. से भी कम का होता है जिससे बाद में जीवन में अनेक दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं।

    इसलिए एक मेजबान के रूप में मैं आप सभी का, विशेषकर बच्चों का हार्दिक स्वागत करता हूं। मुझे अपने घर पर बच्चों को देखकर बहुत खुशी होती है।

    भुखमरी और कुपोषण के कारण मृत्यु के अधिकतर मामले आदिवासी क्षेत्रों में होते हैं। उदाहरण के लिए, मुझे दो साल पहले महाराष्ट्र की यात्रा के समय काफी दु:ख हुआ जब मैंनें ठाणे जिले जो देश की वित्तीय राजधानी मुम्बई का एक पड़ौसी जिला है, के आदिवासियों की आबादी वाले क्षेत्रों में बच्चों की कुपोषण से हुई मौतों के बारे में सुना।

    लेकिन उतनी ही दु:ख की बात यह भी है कि कुपोषण केवल गरीबी के कारण ही नहीं है बल्कि खान-पान की आदतों के कारण भी है। लोगों की आय में बढ़ोतरी हो रही है। लेकिन उसी दर से कुपोषण में सुधार नहीं हो रहा है।

    अधिक वजन, मोटापन, मधुमेह, हृदयरोग-ये सभी रोग विशेषकर शहरी क्षेत्रों में गलत जीवन शैली के कारण पैदा होते हैं। असुरक्षित खाद्य पदार्थों और अधिक भोजन खाने और साथ ही शारीरिक मेहनत न करने से हमारे समाज में बच्चों की काफी मौतें हो रही हैं।

    मैं खुश हूँ कि बच्चों में जागरुकता पैदा करने के लिए इस राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता के माध्यम से एक प्रयास किया गया है। बचपन में अच्छी आदतें सीखने से आप जीवनभर स्वस्थ रहेंगे।

    बच्चे कोई भी बात अच्छी तरह सीख लेते हैं। बच्चे सूचना और ज्ञान को भी सर्वोत्ताम ढंग से ग्रहण कर लेते हैं। इसीलिए वे बढ़ते हुए बच्चों में भी जागरुकता पैदा कर सकते हैं।

    &दिनांक 31 अगस्त, 2008 को नई दिल्ली में पोषाहार के बारे में बच्चों में जागरुकता पैदा करने हेतु सन् 2008 के अभियान के लिए राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में विजेताओं को पुरस्कार वितरण के समय दिए गए भाषण से।
 

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