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वरिष्ठ नागरिकों के बारे में आडवाणीजी के विचार
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 यदि ऐतिहासिक तौर पर कहा जाए तो हमारे देश में ''वरिष्ठ नागरिकाें'' ंकी धारणा अभी हाल की उपज है। क्योंकि 'नागरिक' की अवधारणा की उत्पत्ति, जैसाकि आधुनिक संवैधानिक दृष्टि से अर्थ लगाया गया है, ''राष्ट्र-राज्य'' की स्थापना के बाद हुई है। भारत एक प्राचीन राष्ट्र है जिसका हजारों साल पुराना इतिहास है। प्राचीन समय में हमारे देश की जनता के अधिकारों और जिम्मेदारियों को किसी संविधान में विधिबध्द नहीं किया जाता था बल्कि वे हमारी संस्कृति और जीवन के हमारे आध्यात्मिक दृष्टिकोण में निहित थे। पिछली सदियों के बुध्दिमान बुजुर्ग लोगों ने भारत में एक ऐसा सांस्कृतिक वातावरण बनाया था जिसमें प्रत्येक व्यक्ति से यह आशा की जाती थी कि वह जीवन के चार आश्रमों में एक आश्रम से उठकर अगले आश्रम की ओर बढे। मानो वह एक सीढ़ी पर चढ़ रहा हो और जितना भी संभव हो, वह आत्म- अनुभूति प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहा हो।

परिवार व्यवस्था को सरंक्षित और मजबूत बनाने की अनिवार्यता

      मैं केवल आपको यह बताने के लिए कह रहा हूं कि जीवन के भारतीय दृष्टिकोण में युवा बनाम वृध्द अथवा वरिष्ठ नागरिकों की कोई कृत्रिम धारणा नहीं है। हमारा समाज आधुनिकता के खिलाफ कभी भी नहीं रहा है। लेकिन आधुनिकता का अर्थ यह नहीं है कि उन सभी बातों को नष्ट कर दिया जाए जो हमारे विगत में बहुमूल्य और जीवन को पोषित करने वाली रही हों।

    सभी संस्थाओं जिनका निर्माण मनुष्य ने अपने अस्तित्व और प्रगति के लिए किया है, उन सभी में परिवार व्यवस्था सबसे उत्तम है। मैं समझता हूं कि मनुष्य परिवार की एक श्रेष्ठ कृति है। सुखी परिवार वह है जिसमें युवा और बुजुर्ग साथ-साथ रहते हों, जो प्यार के बंधनों में बंधे हुए हों और आपस में एक-दूसरे की चिन्ता करते हों।

      पारिवारिक जीवन की जरूरत वरिष्ठ नागरिकों के लिए और भी ज्यादा है। और मैं 'जरूरत' शब्द का प्रयोग सिर्फ शारीरिक देखभाल के रूप में नहीं कर रहा हूं। उनका स्वास्थ्य उनके पारिवारिक जीवन की गुणवत्ताा पर भी निर्भर करता है। मैं ऐसे कई उदाहरण जानता हूं जहां वरिष्ठ लोगों को सही पारिवारिक माहौल में न रहने के कारण बीमारियां हुई हैं। और जहां कहीं वे सुखी पारिवारिक माहौल में रहते हैं, उन्हें दवाईयों की जरूरत नहीं पड़ती हैं क्योंकि खुशी और संतुष्टि ही वरिष्ठ नागरिकों के लिए अत्यधिक प्रभावकारी दवा है।

सार्वजनिक मामलों में वरिष्ठ नागरिकों की भागीदारी बढ़ाना

मित्रो, हम सभी जानते हैं कि हमारे परिवारों, समाजों और गांवों में कैसे हमारे वरिष्ठों को उनके ज्ञान के कारण महत्व दिया जाता है। जब भी कभी लोग किसी महत्वपूर्ण मामले पर मार्गदर्शन चाहते हैं तो वे वरिष्ठों या बुर्जुगों से सलाह करते हैं। उनकी राय और सलाह को सामान्य तौर पर सभी के द्वारा स्वीकारा जाता है।

यह बहुमूल्य परम्परा आधुनिक समय में भी सरंक्षित रखी जानी चाहिए। गांवों में आज भी यह परम्परा काफी हद तक मौजूद है। लेकिन बडे शहरों में वरिष्ठों के ज्ञान और विवेक से हमारा समाज लाभान्वित नहीं हो पा रहा है। हमें नए रास्ते, नए औपचारिक और अनौपचारिक नियम तलाशने होंगे जिससे जन मामलों में वरिष्ठों की भागीदारी बढ़ाई जा सके।

एक ऐसा क्षेत्र है जो तत्काल मेरे ध्यान में आता है और वह है स्थानीय स्तर पर विवादों का निपटारा। ऐसा कहा जाता है कि भारत पूरी दुनिया में सर्वाधिक मुकदमों से ग्रसित समाज है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। यह हमारे सामाजिक आचार-विचारों से मेल नहीं खाता। हमें समझौते, निर्णय और संघर्ष समाधान के लिए गैर-न्यायिक तंत्र को प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे परस्पर विश्वास, समझ, सद्-इच्छा के साथ-साथ समाज में सहिष्णुता की भावना और एक-दूसरे को संभालने के साथ सहयोग पनपेगाA

मैं मानता हूं कि हमारे वरिष्ठजन रेजीडेंटस वेलफेयर एसोसियेशनों और अपने पड़ोस में शिक्षा, स्वास्थ्य-देखभाल पर्यावरण की रक्षा, संस्कृति, कला और लोकपरोपकार क्षेत्र में अपनी स्वयंसेवी सेवाएं दे सकते हैं। ऐसी भागीदारी कई जगहों पर देखी गई है लेकिन ऐसे कामों में उनकी भागीदारी को बढ़ाने की गुंजाइश काफी है।

-दिनांक 20 जुलाई, 2008 को नई दिल्ली में वरिष्ठ नागरिकों के सम्मेलन में आडवाणीजी के भाषण से उध्दरण।

 

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