मेरे जीवन में पुस्तकें, थिएटर तथा सिनेमा अपार हर्ष व आनंद का स्रोत रहे हैं। जैसाकि मैं अपने इन संस्मरणों में बता चुका हूँ, पुस्तकों के प्रति मेरा प्रेम तब जागा, जब मैं किशोरावस्था में ही था। राजस्थान आने के बाद मैंने हिंदी सीखी और के.एम. मुंशी की 'जय सोमनाथ' पुस्तक पढ़ी थी। वस्तुत: मैंने उनके द्वारा लिखी प्रत्येक पुस्तक पढ़ी। जीवन के प्रारंभिक दौर में विकसित इस आदत ने मुझे व्यस्त राजनीतिक जीवन में भी पुस्तकों के सान्निध्य में रखाचाहे मैं चुनावों के प्रचार अभियान में व्यस्त हूँ, यात्रा पर हूँ या बैठकों के बीच एकांत क्षणों में डूबा हूँ। पुस्तकें मुझे ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जो सीमित विचार-जगत् से दूर ज्ञान, विचारों, भावों, अपूर्व कार्यों, कल्पना तथा स्वप्नों का जगत् है। पुस्तकों ने मुझे चौंका देनेवाले पात्रों की जानकारी दी। प्रत्येक पात्र में मानव प्रकृति की अद्भुत विशेषता प्रकट होती है; प्रत्येक पात्र गुणों-अवगुणों का अद्भुत संगम है; प्रत्येक पात्र अपने तरीके से जीवन की चुनौतियों का सामना करता है; अनेक असफल हो जाते हैं, कुछ सफल।
मुझे भिन्न-भिन्न प्रकार की पुस्तकें पसंद हैं। लेकिन मैं राजनीति, अध्यात्म, इतिहास और भविष्य-शास्त्र से जुड़ी पुस्तकें अधिक पसंद करता हूँ। सी. राजगोपालाचारी की 'रामायण' और 'महाभारत' मेरे सर्वदा-प्रिय ग्रंथ रहे हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की हिंदू धर्म पर लिखी पुस्तकों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। मुझे एल्विन टॉफलर की त्रयीफ्यूचर शॉक, द थर्ड वेव तथा पावर शिफ्ट_पढ़कर अपार आनंद मिला। उन्होंने कहीं पढ़ा होगा कि मैं उनकी पुस्तकों का प्रशंसक हूँ तो वर्ष 2002 में अपनी भारत यात्रा के समय वे मुझसे मिलने मेरे निवास पर आए। मैं भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास तथा राजनीति पर लिखी स्टैनली वॉल्पर्ट की पुस्तकों का बड़ा प्रशंसक हूँ। स्टीफन कोवे की पुस्तक द सेवन हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपुल तथा पाओलो कोएल्हो की अनेक पुस्तकों ने मुझे प्रेरित किया। कोवे में महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि आत्म-विकास करने या प्रभावशाली बनने के लिए व्यक्ति को मात्र मीठी बातें ही नहीं करनी या लोगों के जन्मदिन ही याद नहीं रखने। ये शिष्टाचार की बातें अच्छी हैं, लेकिन व्यक्ति की ईमानदारी तथा निष्ठा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। यही कितना सही है।
यद्यपि मैं पार्टी सहयोगी के रूप में अरुण शौरी के संपर्क में रहा हूँ पर स्वतंत्र रूप से एक प्रभावशाली लेखक के रूप में मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ। यदि मुझे संवैधानिक विषयों पर किसी एक लेखक का नाम लेना पड़े, जिसने मुझे प्रभावित ही नहीं किया बल्कि जिसकी पुस्तकें राजनीतिक तथा संसदीय कार्य में संदर्भ के रूप में नियमित स्रोत रहीं, तो मैं दुर्गादास बसु का नाम लूँगा। उनकी पुस्तक इंट्रोडक्शन टु द कॉन्स्टीटयूशन ऑफ इंडिया तथा आठ खंडों में लिखित पुस्तक कमेंट्री ऑन द कॉन्स्टीटयूशन ऑफ इंडिया असाधारण कृतियाँ हैं।
मुझे फिल्म तथा नाटक देखना भी अच्छा लगता है, फिर भी मुझे इस बात का दु:ख है कि मुझे आजकल इस शौक को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। थिएटर में मुझे शेखर सेन के एकल अभिनीत (मोनो ऐक्ट) संगीतमय नाटक 'कबीर' और 'स्वामी विवेकानंद' बहुत पसंद हैं। सत्यजित रे की फिल्मों ने मेरे अंतर्मन को छू लिया तथा ऐसे ही गुरुदत्त की फिल्मों ने भी। मुझे राजकपूर की शुरुआती फिल्में तथा मनोज कुमार द्वारा निर्मित देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत फिल्में बहुत पसंद हैं। मैं स्व. सुनील दत्त की एक अभिनेता और एक अच्छे मनुष्य, दोनों रूप में प्रशंसा करता था। उन्होंने आतंकवाद की चपेट में आए पंजाब में हिंदू-सिख एकता स्थापित करने के लिए 'पदयात्रा' करके उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। मैंने हाल ही में अपने परिवार और मित्रों के साथ कुछ प्रशंसनीय फिल्में देखीं जिनमें आमिर खान की 'तारे जमीं पर', फिरोज खान की 'गांधी, माई फादर', शाहरुख खान की 'चक दे इंडिया' तथा विधु विनोद चोपड़ा और राजू हीरानी की 'लगे रहो मुन्ना भाई' देखीं। िवदेशी फिल्मों में मुझे सबसे ज्यादा 'द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई', 'माइ फेयर लेडी' तथा 'द साउंड ऑफ म्यूजिक' प्रिय हैं।
मुझे यहाँ विशेष रूप से अमिताभ बच्चन का उल्लेख करना है। उनकी बहुमुखी तथा विलक्षण प्रतिभा मुझमें हमेशा आश्चर्य एवं कौतूहल उत्पन्न करती रही है। उनके पिता महान् हिंदी कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन तथा माँ तेजी बच्चन को मैं अच्छी तरह से जानता था। वस्तुत: जब अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' सन् 1969 में आई थी, जिसके लेखक तथा निर्देशक के.ए. अब्बास थे, तब तेजी बच्चन ने मेरे लिए इस फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग की व्यवस्था की थी। इसलिए एक तरह से यह मेरी स्मृतियों के गलियारे की यात्रा थी जब मेरी बेटी प्रतिभा ने जी टी.वी. पर अपने साप्ताहिक कार्यक्रम 'नमस्ते सिनेमा' के सौवें एपीसोड के अवसर पर पाँच हिस्सों में अमितजी का एक विस्तृत साक्षात्कार लिया था। भारतीय सिनेजगत के महानायक होते भी वे युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करते हैं। कार्यक्रम के प्रसारण के बाद अमितजी ने प्रतिभा को संदेश भेजा'धन्यवाद! आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। साक्षात्कार की गुणवत्ता उस व्यक्ति से नहीं ऑंकी जाती जिसका साक्षात्कार लिया जाता है, बल्कि उस व्यक्ति से ऑंकी जाती है, जिसने साक्षात्कार लिया। आपने आश्चर्यजनक ढंग से मेरा साक्षात्कार लिया है।'
पूर्व सिनेमा समालोचक एवं आजीवन फिल्मों का शौकीन होने के कारण मैंने हिंदी सिनेमा के विकास को ध्यान से देखा है। चूँकि एक समय में मैं नाटकों को भी बहुत पसंद करता था, अत: मैंने अकसर सिनेमा तथा थिएटर को कला दो रूपों में तुलना की है। थिएटर द्वारा कलाकारों और दर्शकों के बीच तीव्र कलात्मक संप्रेषण उत्पन्न होता है। यह अपने आप में अनूठा है, लेकिन सिनेमा और टी.वी. की तरह यह आम जनता तक नहीं पहुँच पाता। इन दोनों माध्यमों के प्रभावपूर्ण दृश्यों, संगीतमय विषय-वस्तु तथा दर्शक को सपनों की नगरी में ले जाने की क्षमता से इनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। जब से मैं देख रहा हूँ, हिंदी फिल्में शुरू से ही राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में योगदान करती आई हैं।* हाल के दशकों में ये दोनों विधाएँ पूरे विश्व में भारत के सशक्त सांस्कृतिक दूत के रूप में उभरी हैं। जब मैं भारतीय सिनेमा की द्विमुखी भूमिकाओं के बारे में विचार करता हूँ (तथा मैं इस संदर्भ में हिंदी-इतर फिल्मों की भूमिका को भी स्वीकार करता हूँ) तो मेरा हृदय सभी महान् कलाकारों, गायकों, संगीतज्ञों, निर्माताओं, निर्देशकों तथा फिल्म उद्योग से जुड़े अन्य सभी लोगों के प्रति आभार की भावना से भर जाता है। मैं विशेष रूप से भारतीय सिनेमा की युवा प्रतिभा से प्रभावित हूँ तथा उनसे आशा करता हूँ कि वे भारत के साहित्य, कला, समाज-सुधार, देशभक्ति की भावना तथा आध्यात्मिक गवेषणा की बहुमूल्य एवं अनंत विरासत को अधिकाधिक समृध्द बनाएँ।
मेरे लिए संगीत हमेशा आनंद और मानसिक शांति का स्रोत रहा है। मैं जब छोटा था तो अकसर बाँसुरी बजाता था। कराची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैंड में मैं नियमित बाँसुरीवादक था। मुझे नए-पुराने सभी फिल्मी गीत पसंद हैं, खासतौर पर धीमी व मधुर धुनवाले गीत हैं। मेरे आई-पॉड तथा एमपी-3 मोबाइल में लगभग 300 गाने स्टोर्ड हैं। जब भी मेरे पास खाली समय होता है, मैं ये गाने सुनता हूँ। भारत की स्वर-कोकिला लता मंगेशकर हमेशा मेरी प्रिय गायिका रही हैं। मैं कभी भी उनके गीत, खासतौर पर 'ज्योति कलश छलके' जैसे भक्ति गीत सुनता नहीं अघाता हूँ। मैं लताजी का आभारी हूँ, क्योंकि उन्होंने अनेक बार ऐसे सार्वजनिक समारोहों में मेरे अनुरोध पर यह गीत गाया, जहाँ मंच पर हम दोनों साथ होते थे। अनूप जलोटा के भजन सुनकर मुझे असीम शांति मिलती है। जगजीत सिंह, मेहँदी हसन तथा मल्लिका पुखराज की गजलों को सुनकर सुकून मिलता रहा है। शास्त्रीय नर्तक-नर्तकियों में मैं सोनल मानसिंह तथा राजा राधा रेड्डी का प्रशंसक हूँ, जो मेरे पारिवारिक मित्र भी हैं। मेरे पारिवारिक मित्रों में फिल्म तथा टी.वी. जगत् की चार प्रतिष्ठित हस्तियाँ हैं, जो भाजपा के सदस्य भी हैंशत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, हेमा मालिनी और स्मृति ईरानी।
* इस संदर्भ में मैं फिल्म निर्माता भारत बाला तथा उनकी पत्नी कणिका के लोकप्रिय संगीत निर्देशक ए.आर. रहमान के साथ मिलकर किए गए प्रयासों की सराहना करता हूँ। इन्होंने सृजनात्मक रूप से राष्ट्रीय गान 'जन-गण-मन' तथा राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' प्रस्तुत किया।
दो गैर-राजनीतिक साक्षात्कारसन् 1991 में मुंबई से प्रकाशित 'आफ्टरनून डिस्पैच ऐंड कूरियर' नामक समाचार-पत्र में '20 प्रश्न' नामक शीर्षक के अंतर्गत मेरा साक्षात्कार छपा था, जो मेरे गैर-राजनीतिक जीवन से संबंधित था
प्रश्न : आपकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
उत्तर : पुस्तकें; और सामान्य स्तर पर चॉकलेट।
प्रश्न : आपका सबसे ज्यादा अनमोल खजाना क्या है?
उत्तर : मेरी पुस्तकें; और मेरी पत्नी द्वारा संगृहीत गणपति की मूर्तियाँ।
प्रश्न : आप मानसिक थकान कैसे दूर करते हैं?
उत्तर : जब संभव हो, नाटक देखने थिएटर चला जाता हूँ या किताबों अथवा टी.वी. में व्यस्त हो जाता हूँ।
प्रश्न : यदि आप अपने भीतर कोई एक चीज बदल सकते हैं तो आप क्या बदलेंगे?
उत्तर : मैं सोचता हूँ कि मेरे स्वभाव में हाजिर-जवाबी और हास्य का अंश अधिक होना चाहिए (जिसकी अभी मुझमें कमी है) तथा छोटी-मोटी बातचीत में प्रवृत्त होने की क्षमता होनी चाहिए।
प्रश्न : आप स्वयं को कैसे वर्णित करेंगे?
उत्तर : एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जिसने मनोयोग से भाजपा को ऐसा माध्यम बनाने का भरसक प्रयास किया, जिससे आज भ्रष्टाचार तथा अवसरवादिता में धँसे 'भद्दे भारतीय राजनीतिज्ञ' की छवि बदली जा सके।
प्रश्न : आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि कौन सी है?
उत्तर : राम रथयात्रा के माध्यम से मैं भारतीय राष्ट्रवाद तथा पंथनिरपेक्षता के सही अर्थ पर एक जोरदार राष्ट्रीय बहस छेड़ने में मैं सफल हो सका।
प्रश्न : यदि आपको दोबारा जन्म लेना हो तो आप किस रूप में इस दुनिया में जन्म लेकर जीना चाहेंगे?
उत्तर : जैसा मैं हूँ, ताकि अपने अधूरे कार्यों को पूरा कर सकूँ।
प्रश्न : यदि आपको बताया जाता है कि आपको चौबीस घंटे और जीना है, तो आप यह समय कैसे बिताएँगे?
उत्तर : यह भूलकर कि मेरे जीवन का मात्र एक दिन शेष है, इस दिन को सामान्यत: वैसे ही बिताऊँगा जैसे अकसर बिताता हूँ।
प्रश्न : आपका सबसे ज्यादा प्रिय व्यक्ति कौन है?
उत्तर : मेरी बेटी, प्रतिभा।
प्रश्न : आपका मनपसंद शहर?
उत्तर : कराची।
प्रश्न : आप अपने आपको किस रूप में याद करवाना चाहेंगे?
उत्तर : एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो ईमानदारी और निष्ठापूर्वक अपनी धारणाओं के अनुसार जीने का प्रयास करता रहा।
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उसी वर्ष कोलकाता के एक समाचार-पत्र 'टेलीग्राफ' ने मुझसे इसी तरह के ही कुछ प्रश्न पूछे थे।
प्रश्न : पूर्ण सुख के बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर : स्व-चेतना के साथ पूर्णत: शांत अवस्था।
प्रश्न : आपको दूसरे लोगों में कौन सी बात पसंद नहीं है?
उत्तर : संकुचित मन तथा अशिष्टता।
प्रश्न : आप सबसे ज्यादा अवसाद में कब होते हैं?
उत्तर : एक समय था, जब अपने विचारों की आलोचना पर मुझे दु:ख होता था। पर अब मैं इसकी परवाह नहीं करता। फिर भी, मेरी निष्ठा पर जब कोई छींटाकशी की जाती है तो मुझे गहरी हताशा होती है।
प्रश्न : आपके प्रिय शब्द कौन से हैं?
उत्तर : विश्वसनीयता। हाल ही के वर्षों में विभिन्न पार्टियों तथा राजनीतिज्ञों का आकलन करने के लिए 'विश्वसनीयता' एक मुख्य तकाजा बन गई है।
प्रश्न : आप झूठ कब बोलते है?
उत्तर : ऐसे अवसर आए हैं, जब सत्य बोलने से मेरा कोई प्रिय व्यक्ति आहत या दु:खी हो जाए, ऐसी स्थिति में मैं झूठ बोलने की कोशिश करता हूँ। मैं नहीं जानता कि मैं ऐसा सफलतापूर्वक कर पाता हूँ या नहीं।
प्रश्न : आपको सबसे ज्यादा किस बात पर दु:ख या पश्चात्ताप है?
उत्तर : संस्कृत के प्रति अपार प्रेम होने के बावजूद मैं इसे नहीं पढ़ पाया।
प्रश्न : किस बात पर आपकी ऑंखों में ऑंसू आ जाते है?
उत्तर : खुशी हो या गम, ऑंसुओं से मेरी ऑंखें तुरंत नम हो जाती हैं। यहाँ तक कि किसी फिल्म में मार्मिक संवाद से या किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा भाजपा की भरपूर प्रशंसा करने या किसी प्रियजन द्वारा किसी असाधारण उपलब्धि की खबर मिलने पर मैं भावुक हो जाता हूँ।
प्रश्न : आप कैसी मृत्यु चाहेंगे?
उत्तर : मैं चाहूँगा कि मृत्यु अचानक ही, बिना बताएचाहे मुझे या किसी अन्य कोआ जाए।