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एक बार फिर श्री आडवाणी ने निष्ठुर, लोकतंत्र-विरोधी और जन-विरोधी उपायों के विरूध्द जनमत जुटाने हेतु नेतृत्व प्रदान किया। उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में देश की चारों दिशाओं से यात्रा आरंभ करने की योजना बनाई। इस तरह दो विधेयकों - संविधान 80वां संशोधन विधेयक तथा लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक के विरोध में लोगों को जनादेश प्राप्त करने के उद्देश्य से जनादेश यात्रा का जन्म हुआ।
उन्नीस सौ तिरानवें। माक्र्सवादियों और अन्य विविध छद्म-पंथनिरपेक्षवादियों के समर्थन से राव सरकार ने दो कठोर विधेयक - संविधान 80वां संशोधन विधेयक तथा लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - अर्थात सार्वजनिक जीवन में धर्म पर प्रतिबंध लगाने और भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक स्थान देने से इंकार करने के दोहरे उद्देश्य से पेश किए। विगत की तरह इन प्रस्तावित विधानों का आधार अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करना तथा वोट-बैंक की राजनीति चलाना था। भारतीय जनता पार्टी ने संसद में इन विधायकों का विरोध किया और बहस को टाल दिया गया लेकिन विधेयकों को वापिस नहीं लिया गया।
श्री आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस प्रकार विरोध जताया :
''हम रिलीजन का धर्म के रूप में अर्थ लगाए जाने का कड़े शब्दों में विरोध करते हैं - एक आम भारतीय के लिए चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान अथवा ईसाई हो, उसका अपना धर्म अच्छा आचरण करने की प्रेरणा देता है। राजनीति से धर्म को दूर करके हम सार्वजनिक जीवन का नैतिक आधार ही कमजोर बना देंगे......राजनीति से अधर्म का सफाया किया जाना चाहिए न कि धर्म का। राजनीति को भ्रष्टाचार और अपराध से मुक्त कराना चाहिए न कि सुचिता और ईमानदारी से।''
इन विधेयकों के जरिए छद्म-पंथनिरपेक्षवादी चार प्रमुख उद्देश्य प्राप्त करना चाहते थे।
• चुनावों की मूल योजना को बिगाड़ना और पहले से अधिकृत अयोग्यता की अनुमति देना। • प्रतिबंधित संगठनों को संवैधानिक वैद्यता उपलब्ध कराना। • ऐसे राष्ट्र जो सभी धर्मों का समान रूप से आदर करता हो, को अधार्मिक बनाना। • राजनीतिक पार्टियों के पंजीकरण को समाप्त करने की अनुमति देना।
चारों यात्राएं 11 सितम्बर, 1993 को स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिन से देश की चारों दिशाओं से आरम्भ हुईं। श्री आडवाणी ने मैसूर से यात्रा का नेतृत्व किया। श्री भैरोसिंह शेखावत ने जम्मू से; श्री मुरली मनोहर जोशी ने पोरबंदर से और श्री कल्याण सिंह ने कलकत्ता से यात्रा आरंभ की। 14 राज्यों और 2 केन्द्रशासित क्षेत्रों से यात्रा करते हुए यात्री एक बड़ी रैली में 25 सितम्बर को भोपाल में एकत्र हुए। जनादेश यात्रा को जबरदस्त सफलता मिली।
''यह यात्रा हर तरह से जन-सम्पर्क करने का एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था; एक ऐसा कार्यक्रम जिसमें दिल्ली के साफ-सुथरे कमरों से लेकर भारत के धूल-धूसरित गांवों तथा ''धर्म विधेयकों'' पर चर्चा हुई। एक बार फिर, जब भारतीय जनता पार्टी के निन्दक राष्ट्रीय राजधानी में योजना बना रहे थे और षड़यंत्र रच रहे थे तो भारतीय जनता पार्टी देश की जनता के पास गई।
श्री आडवाणी का नक्सलवादी तेलगांना में जबरदस्त स्वागत हुआ। अहमदाबाद में भारी भीड़ ने श्री जोशी का स्वागत किया। कलकत्ता में श्री कल्याण सिंह के हुए भारी स्वागत का ''इंडियन एक्सप्रेस'' ने अपनी रिपोर्ट की मुख्य पंक्ति में लिखा था। ''लाल शहर भगवा रंग में डूबा।'' रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया ''शहर शायद फिर ऐसा कभी नहीं रहेगा।'' पिछले एक दशक में पहली बार आतंकवाद से प्रभावित पंजाब में कोई राजनीतिक पार्टी इतने बड़े पैमाने पर आगे आई है : जिस तरह से श्री शेखावत का भीड़ ने स्वागत किया, अधिकारियों ने उनका यह कहते हुए धन्यवाद किया कि इस यात्रा से प्रशासन का हौंसला बढ़ा है।
विधेयक कभी भी पारित नहीं हुए। वस्तुत: उनकी संदिग्ध चेष्ठा को जनता द्वारा नकार दिए जाने के डर से वे चर्चा आरंभ कराने का साहस नहीं जुटा सके। छद्म-पंथनिरपेक्षता क अधार्मिक कदम को धर्म की ताकतों से पुन: मात खानी पड़ी थी। जनादेश यात्रा के मूल उद्देश्य ''लोकतंत्र रक्षामये धर्मचक्र परिवर्तन्ये'' की जीत हुई। *** |