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भारतीय जनता पार्टी की पहली यात्रा छद्म पंथनिरपेक्षवादियों के दावे के विपरीत अयोध्या में राम जन्मभूमि के इर्द-गिर्द घूमता हुआ केवल मंदिर-मस्जिद विवाद का हिस्सा नहीं है। हालांकि यह मुद्दा राम जन्म-भूमि की मुक्ति से जुड़ा हुआ था फिर भी इसका उद्देश्य तीन मौलिक प्रश्न उठाना था जो राष्ट्र की सामूहिक अवचेतना में छिपे हुए थे, लेकिन उन छद्म-निरपेक्षवादियों जिन्होंने सन् 1947 से गलती से भारत पर शासन किया है, के डर से किसी ने भी उनसे यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटाई।
• पंथनिरपेक्षता क्या है? साम्प्रदायिकता क्या है? • क्या अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता का लगातार इस्तेमाल करके राष्ट्रीय एकता लाई जा सकती है? • क्या सरकार अल्पसंख्यकवाद की संस्कृति को अस्वीकार नहीं कर सकती?
राम रथ यात्रा 25 सितम्बर, 1990 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जन्मदिन पर सोमनाथ से शुरू हुई थी और जिसका 10,000 कि.मी. की यात्रा करने के बाद 30 अक्तूबर को अयोध्या में समापन किया जाना था।
सोमनाथ ही क्यों? और, अयोध्या ही क्यों?
सोमनाथ में मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा हमारे प्राचीन राष्ट्र के जीवन्त प्रतीकों हिन्दू मंदिरों और मठों पर हमले शुरू किए गए। सन् 1026 ई0 में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर को लूटा गया और इसकी वैभवता को तहस-नहस कर दिया गया था। मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण किया गया और बार-बार इस पर हमले किए जाते रहे। लेकिन आक्रमणकारियों की सेनाएं सोमनाथ की आत्मा को नहीं मार सकीं। सन् 1950 में सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर भारतीय राष्ट्रीयता के प्रतीक के रूप में सोमनाथ के ध्वस्त मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया है।
श्री आडवाणी ने अपनी रथयात्रा को सोमनाथ से आरम्भ करना इसलिए चुना क्योंकि लूटपाट और तोड-फ़ोड़ के स्थान पर मंदिर का पुनर्निर्माण करना, और ''एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकत्व के प्राचीन प्रतीकों का संरक्षण करना'' इस यात्रा का पहला उद्देश्य था। यात्रा का समापन अयोध्या में किया जाना था क्योंकि राम जन्मभूमि को मुक्त कराना राम रथयात्रा का दूसरा उद्देश्य था।
यात्रा का सीधा सा सन्देश जनता में एकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना जागृत करना, परस्पर समझदारी बढ़ाना तथा जनता को सरकार की तुष्टिकरण तथा अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के बारे में समझाना था। इस यात्रा को अभूतपूर्व सफलता मिली - राजनीतिक तौर पर भीड़ जुटाने हेतु ऐसी लोकप्रियता कभी हासिल नहीं हुई। इस यात्रा ने जनता द्वारा दर्शायी गई ''लोकशक्ति'' और दिल्ली के शासकों द्वारा प्रस्तुत ''राजशक्ति'' के बीच तुलना की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया।
राम रथ यात्रा के नैतिक और क्रान्तिकारी आयाम की तुलना महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह अथवा सन् 1930 के दांडी मार्च से की गई। इस यात्रा ने प्रभावी ढंग से इस तर्क को जन्म दिया कि यदि राम ने सदाचरण का आदर्श प्रस्तुत किया था तो राम राज्य ने सुशासन का आदर्श प्रस्तुत किया था। इस यात्रा की व्यापक लोकप्रियता की तुलना औपनिवेशक शासन के विरुध्द जनमत जुटाने हेतु गणेश चतुर्थी की उपयुक्तता से की गई। यात्रा के सांस्कृतिक आयाम की तुलना गांधीजी के ''गऊ हत्या विरोधी अभियान'' से की गई। इस यात्रा से पैदा हुई राष्ट्रवाद की जबरदस्त हवा से छद्म-पंथनिरपेक्ष समर्थकों के होश उड़ गए। जय श्रीराम के उद्धोष का महत्व परम्परागत अभिवादन से कहीं अधिक बढ़ गया। यह भारतीय जनता पार्टी के विचार की सशक्त पुष्टि थी कि पंथनिरपेक्षता का अर्थ अपने इतिहास और अपनी सांस्कृतिक विरासत एवं परम्पराओं जो हमारे महान राष्ट्र की नींव हैं, को नकारना नहीं है। छद्म-निरपेक्षता के दो अग्रणी समर्थक भी मुलायम सिंह यादव तथा श्री लालू प्रसाद यादव दमन तथा आतंक का इस्तेमाल करते हुए हरकत में आ गये । श्री आडवाणी को समस्तीपुर (बिहार) में 23 अक्टूबर की सुबह गिरफ्तार कर लिया गया और मसंजोर में बंदी बनाकर रखा गया। उत्तर प्रदेश में पुनरुत्थानशील राष्ट्रवाद के उपासकों के विरुध्द क्रूरतापूर्ण हमले का आदेश दिया गया।
विडम्बना की बात यह है कि राज्य की ताकत को व्यवस्थित करने के बावजूद ''राजशक्ति'' को ''लोकशक्ति'' के हाथों में अपमानजनक रूप से परास्त होना पड़ा। श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने शासन को स्थायी बनाने के लिए जाति और धार्मिक विशिष्टता का दोहन करने का प्रयास किया और उन्हें बदनाम होकर सत्ता से बाहर जाना पड़ा। आज उनकी पार्टी जनता दल लगभग बुझा हुआ राजनीतिक दल है और यह कांग्रेस की मदद से मुश्किल से जीवित है। जिस विवादित ढांचे पर मुसलमानों को उनके स्व-निर्धारित ''पंथनिरपेक्ष'' संरक्षकों द्वारा खून बहाने के लिए उकसाया जा रहा था, वे अब अस्तित्व में ही नहीं है। जिस आदमी ने राम रथ यात्रा को रोकने और श्री आडवाण्ाी को गिरफ्तार करने के लिए ढ़ीठता दिखाई थी, आज उसकी धन और ताकत के बल पर भ्रष्ट राजनीतिज्ञ के रूप में कलई खुल गई है।
आज भारतीय जनता पार्टी देश में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है जिसका श्रेय सन् 1990 की नवरात्रि के दौरान सोमनाथ से शुरू हुई तीर्थयात्रा को जाता है। दृढ़-प्रतिज्ञ राष्ट्रवादियों के नेतृत्व में कुछ राष्ट्रवादी लोगों के साथ शुरू हुई यह यात्रा राष्ट्रवादी उत्साह की एक तूफानी धारा बन गई। तीर्थयात्रा की विजय उस दिन होगी जिस दिन रामलला को अपने पवित्र जन्म-स्थान पर बने मंदिर में उपयुक्त स्थान मिल जाएगा। *** |