यात्राएं
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यात्रा, शोभायात्रा, तीर्थयात्रा। ये शब्द हमारी प्राचीन भारतीय परम्परा के प्रतीक हैं जो शताब्दियों से प्रचलित हैं।

ऐसी परम्परा जो नितान्त सार्वभौमिक है तथा जिसकी गहरी जडें एकमात्र भारतीयता में समायी हुई हैं।

ऐसी परम्परा जो प्राचीन और आधुनिक, विगत और वर्तमान के बीच के अंतराल को पाटती है।

ऐसी परम्परा जो सर्वग्राही और सहभागी है। यह परम्परा इन्हीं कारणों से धार्मिक व पवित्र स्वरूप अपनाए हुए है।

वर्ष 1990 में जब राष्ट्र एक विकट संकट से गुजर रहा था जिसमें एक ओर जातिवादी ताकतों से हमारे सामाजिक ताने-बाने के टुकडे होने का खतरा बना हुआ था तो दूसरी ओर, छद्म-पंथनिरपेक्ष लोगों द्वारा साम्प्रदायिकता फैलाई जा रही थी जिसके परिणामस्वरूप, हमारे समाज में नई दरारें पैदा हो गईं। श्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस घृणास्पद प्रवृति को रोकने हेतु आगे कदम बढाया। उन्होंने हमारे दबे हुए राष्ट्रवादी उत्साह को जगाने तथा उच्चतर मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखने की हमारी आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु श्री राम के अद्वितीय प्रतीक का इस्तेमाल किया जो हमारी एकता अथवा अखंडता का द्योतक है।

एक प्राचीन परम्परा जनमत जुटाने का पहली बार माध्यम बनी। श्री आडवाणी ने अपनी विख्यात राम रथयात्रा उस समय प्रारंभ की - जब दूसरे नेता धर्म और जाति का सहारा लेकर दिल्ली की सत्ता में जोड-तोड बैठाने में व्यस्त थे, तो भारतीय जनता पार्टी जनता के पास सन्देश लेकर गई जो लोकतंत्र में एक अंतिम निर्णायक है। एक स्तर पर, यह यात्रा एक राजनीतिक ’’शोभायात्रा‘‘ थी तो दूसरे स्तर पर, यह भारत की आत्मा की खोज की यात्रा थी। एक ऐसी यात्रा जिसका लक्ष्य समुद्री तटों के बीच स्थित भूमि का विस्तार करना और तेजस्वी हिमालय पर्वत की ऊंचाइयों तक उठना था। तीसरे स्तर पर, यह एक ऐसी तीर्थयात्रा थी जिसका अंतिम उद्देश्य एक ऐसे राष्ट्र मंदिर का निर्माण करना था जो ईंट और पत्थर से नहीं बल्कि राष्ट्रवादी उत्साह और जोश से बने।

और इस तरह, यह यात्रा लोगों में राष्ट्रवाद की छिपी भावना को जागृत करने और हमारे विशाल राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता में पुनः विश्वास जगाने के लिए जनमत जुटाने का एक सशक्त माध्यम बनी।

चूंकि हमारा राष्ट्र विदेशी शासन से प्राप्त अपनी स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयंती मना रहा था। श्री आडवाणी ने दूसरी यात्रा आरंभ करने का निर्णय लिया। यह एक ऐसी उत्सव शोभायात्रा थी जिसने सम्पूर्ण राष्ट्र की चारों दिशाओं का भ्रमण किया। लेकिन यह एक पवित्र उद्देश्य वाली यात्रा थी - अर्थात देशभक्ति की बुझती हुई लौ को फिर से प्रज्ज्वलित करना तथा ऐसे बिखरे हुए सपनों जो भारतीयों ने 15 अगस्त, 1947 को देखे थे, को फिर से बुनना। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस यात्रा का लक्ष्य उन शहीदों को श्रद्धाजंलि अर्पित करना भी था जिन्होंने राष्ट्रवाद की वेदी में अपना जीवन बलिदान कर दिया था।

पिछले आठ वर्षों के दौरान भारतीय जनता पार्टी द्वारा शुरू की गई यह पांचवीं यात्रा थी। चूंकि स्वर्ण-जयंती रथयात्रा पूरे देश का भ्रमण करने के लिए आरम्भ की गई थी इसलिए पिछली चार यात्राओं का आह्वान करना और उनमें से प्रत्येक यात्रा के बारे में जनता को बताना उचित होगा।
 

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