डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953)
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भारतीय जनसंघ के संस्थापक

भारतीय जनता पार्टी, भारतीय जनसंघ की उत्तरवर्ती पार्टी है। जनसंघ का 1977 में जनता पार्टी में विलय हो गया था। सन् 1980 में जनता पार्टी में आंतरिक मतभेद होने के कारण सरकार टूटने पर भारतीय जनता पार्टी का एक अलग पार्टी के रूप में गठन किया गया।

एक संक्षिप्त जीवन परिचय

डा0 मुखर्जी की मां जोगमाया देवी अपने बेटे की मौत का समाचार सुनकर चिल्ला उठीं।

''मैं गर्व से कहती हूं कि मेरे पुत्र की मौत भारतमाता का नुक्सान है!,

डा0 मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई, 1901 को एक प्रसिध्द बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष बंगाल के एक जाने-माने व्यक्ति थे। डा0 मुखर्जी ने कलकत्ता से स्नातक डिग्री प्राप्त की। वे 1923 में सीनेट के सदस्य (फैलो) बन गये। उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1924 में कलकता उच्च न्यायालय में एडवोकेट के रूप में नाम दर्ज कराया। बाद में, वे सन् 1926 में 'लिंकन्स इन' में अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड चले गए और 1927 में बैरिस्टर बन गए। वे तैंतीस वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय में विश्व के सबसे कम उम्र के कुलपति बने और सन् 1938 तक इस पद पर आसीन रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अनेक रचनात्मक सुधार किए तथा कलकत्ता एशियाटिक सोसायटी में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। वे इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ साइंस, बंगलौर की परिषद् एवं कोर्ट के सदस्य और इंटर-यूनिवर्सिटी ऑफ बोर्ड के चेयरमैन रहे। 

वे कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद् के सदस्य चुने गए लेकिन उन्होंने अगले वर्ष इस पद से उस समय त्यागपत्र दे दिया, जब कांग्रेस ने विधानमंडल का बहिष्कार कर दिया था। बाद में उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए।

जब वर्ष 1937-41 में कृषक प्रजा पार्टी-मुस्लिम लीग गठबन्धन सत्ता में आया, वे विरोधी पक्ष के नेता बन गए। वे फज़लुल हक़ के नेतृत्व में प्रगतिशील गठबन्धन मंत्रालय में वित्त मंत्री के रूप में शामिल हो गए लेकिन उन्होंने एक वर्ष से कम समय में ही इस पद से त्यागपत्र दे दिया। वे हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में उभरे और शीघ्र ही हिन्दू महासभा में शामिल हो गए। सन् 1944 में वे इसके अध्यक्ष बनाए गए।

गांधीजी की हत्या के बाद वे चाहते थे कि हिन्दू महासभा को केवल हिन्दुओं तक ही सीमित न रखा जाए अथवा यह जनता की सेवा के लिए एक गैर-राजनीतिक निकाय के रूप में ही कार्य न करे। वे 23 नवम्बर 1948 को इस मुद्दे पर इससे अलग हो गए।

पंडित नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। डा0 मुखर्जी ने लियाकत अली खान के साथ दिल्ली समझौते के मुद्दे पर 6 अप्रैल, 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। श्री मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरू गोलवलकर जी से परामर्श करने के बाद 21 अक्तूबर, 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और वे इसके पहले अध्यक्ष बने। सन् 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद की तीन सींटें जीतीं जिनमें से एक सीट पर श्री मुखर्जी जीतकर आए थे। उन्होंने संसद के भीतर 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी' बनायी जिसमें 32 सदस्य लोकसभा तथा 10 सदस्य राज्यसभा से थे जिसे हालांकि, अध्यक्ष द्वारा एक विपक्षी पार्टी के रूप में मान्यता प्रदान नहीं की गई।

वे अपने विरोध को स्वर देने के लिए संसद से बाहर गए और उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत प्रावधान को भारत की विफलता तथा शेख अब्दुल्ला का त्रि-राष्ट्र सिध्दांत बताया। भारतीय जनसंघ ने हिन्दू महासभा तथा राम राज्य परिषद् के साथ मिलकर एक व्यापक सत्याग्रह शुरू किया ताकि इन घातक प्रावधानों को हटाया जा सके। डा0 मुखर्जी सन् 1953 में कश्मीर का दौरा करने के लिए गए और सीमा पार करते हुए उन्हें 11 मई को गिरफ्तार कर लिया गया। नजरबंदी के दौरान 23 मई, 1953 को उनकी मृत्यु हो गई। 

डा0 मुखर्जी एक अनुभवी राजनीतिज्ञ थे। उनके ज्ञान, प्रतिभा और स्पष्टवादिता के कारण उनके मित्र और शत्रु सभी उनका आदर करते थे। उन्होंने पंडित नेहरू के सिवाय अन्य सभी मंत्रियों को अपनी विद्वत्ता और संस्कृति-भाव से पीछे कर दिया था। भारत ने स्वतंत्रता के शुरूआती चरण में ही एक महान सपूत खो दिया।

 

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