भारतीय जनता पार्टी का इतिहास : जन्म, विकास और उसकी विजय गाथा
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भारतीय जनता पार्टी ''संघ परिवार'' नामक वटवृक्ष की प्रमुख शाखा के रूप में उभर कर सामने आई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की इसके प्रतिपक्षियों द्वारा साम्प्रदायिक प्रतिक्रियावादी तथा न जाने क्या क्या कहा जाता रहा है। उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से जितना भी कीचड़ उछाला गया, संघ परिवार इन सबकी परवाह किए बिना निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ता ही चला गया। संगठन व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र को राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और राष्ट्रीय चेतना का मूलमंत्र मानते हुए सफलता की दूरवर्ती ऊंचाईयों तक पहुंचा है। आज यह संगठन अपने उत्कर्ष पर पहुंच चुका है। अब तो इसके पुराने समय से चले आ रहे विरोधी आलोचक यह मानने को विवश हो गए हैं कि ''भाजपा'' का कोई विकल्प नहीं और इसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। इस राष्ट्रीय संगठन की विजय-गाथा की कहानी इस प्रकार है :-

राष्ट्रों के उत्थान और पतन का दर्शन इतिहास का निर्माण करता है। भारतीय इतिहास के पन्ने संघ परिवार की स्पष्ट और विस्तृत संकल्पना का दिग्दर्शन करते हैं जिसके लंबे संघर्ष की कहानी सभी के लिए प्ररेणा का स्त्रोत है। भारत भारती की महान सभ्यता के गीत श्रीलंका से जावा व जापान तथा तिब्बत व मंगोलिया से चीन और साइबेरिया में गाए जाते रहे हैं। हूण और शकों द्वारा इसकी सभ्यता का आकलन कर हम पाते हैं कि इसकी सभ्यता रक्तरंजित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई लेकिन इसने टूट कर बिखरना नहीं सीखा। इसे जीवंत बनाने के लिए विजय नगर एम्पायर, शिवाजी, महाराणा प्रताप तथा गुरू गोबिन्द सिंह के अलावा अनगिनत राष्ट्रनायकों के बलिदान एवम् महानायकों की अक्षुण्ण भूमिका रही है।

हाल के वर्षों में इस महान प्ररेणा की मशाल को लेकर स्वामी दयानन्द तथा स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान का ज्योतिर्मय प्रकाश फैलाया जिसे बाद में अरविंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी तथा अन्य लोकनायकों ने जन जन तक इसे प्रकाशित किया इस विरासत को आगे बढ़ाने में डॉ. हेडगेवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही जिन्हाेंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। 1940 में में प.पू गुरूजी द्वारा इस महान विरासत को आगे पहुंचाया गया। उनके दर्शन में भारतीय मुसलमानों के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी लेकिन वे जानते थे कि इससे पूर्व के शासकों का रवैया दुर्भावनापूर्ण रहा और उन्हाेंने हिंदुओं को मुसलमान बनने के लिए बाध्य किया। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि ''सभी को न्याय मिले लेकिन किसी को खुश करने के लिए उसे पक्षपात पूर्ण समर्थन न दिया जाए''। इसके साथ ही उनका मानना था कि हम हिंदू राष्ट्र थे और हिंदू राष्ट्र हैं और महज़ विश्वास में परिवर्तन का अभिप्राय राष्ट्रीयता में परिवर्तन से नहीं लगाया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ गांधीजी के इस फलसफ़े से पूर्ण रूप से सहमत रहा कि हिंदू धर्म में ईसा, मोहम्मद, ज़ोरोस्टर तथा मोजेज़ के प्रति पूरी आस्था है और सम्मान भी। परिस्थितियों के परिणामस्वरूप अधिकांश हिंदू मुसलमान बनने के लिए विवश हुए। आज के संदर्भों में अधिकांश मुसलमान स्वतंत्र, समृध्द और प्रगतिशील भारत में हिंदुओं की तरह विचारधारा रखते हैं। विश्व में आ रहे बदलाव और विवेकशीलता के परिणामस्वरूप वे अपने प्राचीन विश्वास और जीवन पथ में परिवर्तन के लिए स्वतंत्र हैं और ऐसे भारतीय मुसलमान विचारधारा से हिंदू ही है।

अंग्रेजी हकूमत की ''फूट डालो और राज करो'' की कूटनीति को मान कर तथा राजनेताओं की अदूरदर्शिता के परिणामस्वरूप देश बंटवारे की आग में झोंक दिया गया। परन्तु संघ परिवार नि:संदेह अपनी एकता, मकसद और सुढ़ता के परिणामस्वरूप भारतीय संस्कृति को जीवंत रख पाया। अपनी स्थापना से लेकर अब तक, राष्ट्र निर्माण के कार्य में संलग्न रह कर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने 1930 से 1940 तक के संघर्षपूर्ण समय के दौरान वह सब कुछ कर पाया जो आज के सदंर्भ में हम देख रहे हैं लेकिन गांधी जी की हत्या और उस राष्ट्रीय क्षति के समय शासकीय राजनीति में आई गिरावट के परिणामस्वरूप इसे गहरा आघात लगा।

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ तथा लाखों अन्य लोगों ने मुसलमान को खुश करने की महात्मा गांधी की नीति का समर्थन नहीं किया जो उन्होंने ''खिलाफत आंदोलन'' के समय उन्हें दिया लेकिन गाँधी जी के लिए उनके मन में अपार श्रध्दा थी। वास्तव में गांधी जी ने दिसम्बर, 1934 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शीतकालीन कैंप का दौरा किया था तथा भंगी कालोनी में दिल्ली के राष्ट्रीय स्वंय सेवकों के बीच भाषण भी दिया था। यह सितम्बर 1947 में भाषण दिया गया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आदर्श भावनाओं तथा कठोर अनुशासन की उन्हाेंने मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी। कभी भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उन्होनें आलोचना नहीं की और उसकी खिलाफ़त में एक शब्द भी नहीं बोला लेकिन उनकी हत्या के उपरांत 17000 राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कार्यकर्ताओं के साथ गुरूजी पर गांधी जी की हत्या के षडयंत्र रचने का अभियोग लगाया गया जिसके लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा सत्याग्रह किया गया। परन्तु इस समय तक किसी भी विधायक अथवा सांसद ने इस विवाद को नहीं उठाया। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के लिए यह सत्य की परीक्षा थी और ऐसे सत्य के लिए जैसा कि गोखले जी ने कहा कि ''राजनीति में जो जितना गहरा काटा जाता है वह चारों ओर उतना ही अधिक प्रभाव छोड़ता है''

जब तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक नन्हें पौधे की तरह रहा, हर समय अवांछित राजनीतिज्ञों ने उसकी जड़े काटने का प्रयास किया ताकि संघ रूपी वह पौधा ही समाप्त हो जाए लेकिन 1951 में गुरूजी के आर्शीवाद से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ ने जन्म लिया और पहले ही आम चुनाव में देश की चार बड़ी पार्टियों में उसने अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। तब से अब तक पार्टी ने कभी मुड़ कर नहीं देखा।

पहला दशक

पहली दशाब्दी का संपूर्ण कार्यकाल संगठनात्मक विकास तथा नीतिगत तथा वैचारिक प्रसार में ही बीत गया। कश्मीर, कच्छ तथा बेरूबारी जैसी समस्याओं से जूझने में इसने अपना अधिकांश समय बिताया जो कि प्रादेशिक अखण्डता से जुड़े प्रश्न थे लेकिन बदले में उसे क्या मिला, उसी के संस्थापक अध्यक्ष डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कश्मीर जेल में बलिदान। अनुच्छेद 48 के अनुसार गाय के सरंक्षण की मांग करने वाली पार्टी यह थी जैसा कि महात्मा गांधी ने घोषणा की थी कि ''गाय का सरंक्षण स्वराज्य से भी महत्वपूर्ण है''। जमींदारी और जागीरदारी के विरूध्द भी इस पार्टी ने अपना बिगुल बजाया। परमिट-लाइसेंस, कोटा राज के खिलाफ भी आवाज़ उठाने वाली यही पार्टी थी। न्यूक्लीयर ताकत बढाने के पक्ष में भी यही पार्टी थी ताकि देश की सैन्यशक्ति दुनियाँ के सामने अपनी अलग ही पहचान बना पाए। 1962 के चीन युध्द तथा 1965 में पाकिस्तान युध्द ने संघ परिवार को देश की संवेदनशीलता के शीर्ष पर बैठा दिया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक परिवार को 1965 में जन पुलिस कार्य सौंपा गया तब इसने समाज के सभी वर्गों और यहां तक कि मुसलमान भाईयों को संतुष्ट कर दिखाया। राष्ट्रीय एकता परिषद में गुरूजी को विशेष रूप से बुलाया गया और जनरल कुलवंत सिंह ने तब कहा कि पंजाब देश की तलवार की धार है जिसकी कमाँड राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है।

सभी देशों में पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का अलख जगाया। ऐसा ही कांग्रेस द्वारा किया गया लेकिन 1967 में कांग्रेस को सत्ता से हटना पड़ा। पंजाब से लेकर बंगाल तक सभी जगह कांग्रेस विरोधी सरकार और अमृतसर से लेकर कलकता तक कांग्रेस का कहीं नामोनिशान नहीं था।

कुछ राज्यों में जनसंघ और कम्यूनिस्ट पार्टियों ने अपने पांव गाड़ दिए। उनके मन में केवल यही भावना थी कि ''हम भारत की संतान हैं और भारत माता के लिए 20वीं शताब्दी के लिए समर्पित हैं।''

कांग्रेस का वर्चस्व इससे समाप्तप्राय हो गया लेकिन धन की ताकत से कांग्रेस ने कई राज्यों में शासन सत्ता हथिया ली।

परंतु जनसंघ ने अपना हृदय संकुचित नही होने दिया। पंडित दीन दयाल उपाध्याय की अध्यक्षता में कालीकट में अभूतपूर्व सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय भाषा नीति पर विचार विमर्श किया गया और यह निर्णय लिया गया कि सभी भारतीय भाषाओं का समादर करते हुए देश में राजभाषा की गंगा बहाई जाए। मलयायम डेली ने इस सम्मेलन के बारे में कहा कि दक्षिण से गंगा बहने का यह पहला अवसर रहा।

परंतु इस ऐतिहासिक सम्मेलन के उपरांत पं. दीनदयाल उपाध्याय की कुछ ही दिनों में हत्या कर दी गई और उनका शव मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर पड़ा मिला। भारतीय जन संघ ने इसकी सी.बी.आई से जांच की मांग की लेकिन जिस तरह की जांच की गई वह राजीनीति से प्रेरित थी। जिसके कुछ भी परिणाम नहीं निकल पाए।

हांलाकि पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या भारतीय जनसंघ के लिए बहुत बड़ी दुर्घटना थी जिससे इस संस्था की संपूर्ण चूलें हिल गई। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बंगलादेश की मुक्ति आंदोलन के लिए इस दल ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और खाद्यान्नों कीे आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा के लिए इसके द्वारा ऊंची वसूली दरों से इस दिशा में सकारात्मक प्रभाव पड़ा। 1971 का इसका चुनावी रणनीति ''गरीबी उन्मूलन के विरूध्द जंग'' थी। कांग्रेस ने ''गरीबी हटाओं'' इस नारे को चुरा कर  1971-1972 में भारतीय जनसंघ के साथ ने राजनीति कर में अपने स्थान का बरकरार रखा।

जयप्रकाश नारायण का आह्वान

चुनाव और उप चुनावों में जनसंघ ने सकारात्मक भूमिका अदा की और जयप्रकाश नारायण के हाथ मजबूत किए जो भ्रष्टाचार के समापन तथा एक पार्टी शासन के विरूध्द उठ खड़े हुए थे। तत्कालीन भारतीय जनंसघ बिहार और गुजरात में जन आंदोलन में संलग्न रही और वहां सफल भूमिका अदा करने में कामयाब रही। जयप्रकाश नारायण ने ज़ोरदार शब्दों में यह बात कही कि '' यदि जनसंघ सम्प्रदायकारी है तो मैं भी सम्प्रदायवादी हूँ। विरोधी पार्टियां चुनाव तथा उप चुनावों में कामयाब रही। एक गूंज पूरे देश में उठी ''सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है''। बौखला कर श्रीमती इंदिरागांधाी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी और सैकड़ों उन लोगों को जिनका संबंध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से था, जेल भिजवा दिया गया। लेकिन देश इस अग्नि परीक्षा के लिए तैयार था। वह संघ परिवार ही था जिसके 80 प्रतिशत से अधिक कार्यकर्ता इमरजेंसी में या तो जेलों में बंद थे या सत्याग्रह की तैयारी कर रहे थे।

श्रीमती गांधी ने चंडीगढ़ में, 1975 में आयोजित कांग्रेस के सत्र में इस तथ्य को स्वीकार किया कि हालांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक देश के लिए अनजाना संगठन होने के बावजूद भी पूरे देश में गहरी छाप छोड़ गया है। लंदन के अर्थशास्त्री (दिसम्बर 4, 1970) ने संघ परिवार के भूमिगत आंदोलन के बारे में पूरे संसार को बताया कि संघ परिवार ही पूरे विश्व में नॉन-लेफ्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी है। मर्ाक्सवादी पार्टी के नेता श्री ए.के.गोपावन को कहना पड़ा कि संघ परिवार के पास ऐसा ठोस उपाय है जो बहादुरी तथा बलिदान के लिए पूरे देश को प्रेरित कर सकती है।

इन सभी प्ररेणादायक प्रयासों से इंदिरागांधी की सरकार का 1977 में पतन हुआ और जनता पार्टी की सरकार जिसमें भारतीय जनसंघ, भारतीय लोक दल, कांग्रेस (ओल्ड), समाजवादी तथा सी.एफ.डी. घटक शामिल थे, ने सरकार की कमान संभाली। यहां इस सरकार के विदेश मंत्री के रूप में श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा सूचना तथा प्रसारण मंत्री के रूप में श्री लाल कृष्ण अडवानी ने अपनी कमान संभाली और देश को आगे ले जाने की दिशा में बखूबी अपनी भूमिका का निर्वाह किया। लेकिन 30 महीने के बाद ही यह सरकार गिर गई जिसका प्रमुख कारण व्यक्तिगत सत्ता संघर्ष था जिसने जनता का आकांक्षाओं पर तुषाराघात किया। चरणसिंह सरकार को गिराने के लिए विदेशी धन के रूप में करोड़ों रुपए का व्यय किया गया। 11 फरवरी 1980 को स्टेट्समैन को यह समाचार में प्रकाशित किया गया कि रुपया जिसे काले विश्व बाज़ार में डिस्काउंट के रूप में प्रयोग किया जाता रहा वह अब प्रीमियम के रूप में चल पड़ा है। डॉलर की दर जो 7.91 रुपए 4 जनवरी को थी वही गैर सरकारी तौर पर 7.20 रुपए हो गई। अनजाने खरीददारों के कारण रूपए की दरों में काले बाजार में भारी वृध्दि हुई और यह जानकारी स्पष्ट रूप से सामने आई कि कहां विदेशी सरकारें चुनावों में पानी की तरह पैसा बहा रही है। फरवरी के प्रथम सप्ताह, 1980 में मुद्रा का अवमूल्यन उस दर तक पहुंचा जहाँ कोई सोच भी नहीं सकता था।

जनता पार्टी के घटक दलों का 1980 में विखण्डन हो गया। भारतीय जनसंघ पार्टी के घटक दलों ने इसे अनुचित करार करते हुए इस दल को भारतीय जनता पार्टी के रूप में स्थापित किया जिससे भारतीय राजनीति का नए इतिहास का सूत्रपात हुआ।स्वंय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष ने दोहरी सदस्यता का मामला उठाया। अटलजी और अडवानी जी सहित सभी ने एक स्वर में कहा कि हम अपनी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संध को नहीं छोड़ सकते। भारतीय जनसंघ ने अलग होने का निर्णय लिया।

भारतीय जनता पार्टी का पहला सत्र बंबई में सम्पन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता की अटल बिहारी वाजपेयी ने की। यह सम्मेलन काफी सफल रहा। इस सम्मेलन को संबोधित करते हुए वयोवृध्द नेता श्री छागवन ने कहा ''मैं पार्टी का सदस्य नहीं हूँ और न ही पार्टी का कोई प्रतिनिधि भी नही हूँ लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जब मैं आपके समक्ष आपसे बात कर रहा हूँ तब मैं अपने आपको आप सबसे अलग नहीं महसूस कर रहा। इमानदारी और निष्ठा से आपके बीच का ही व्यक्ति हूँ जो यह कहना चाहता है कि बी.जे.पी. आपकी अपनी पार्टी है जो राष्ट्रीय स्तर की तो है ही लेकिन जिसकी निष्ठा और अनुशासन ऊंचे दर्जे का है।

आप सभी की इस विराट रूप में उपस्थिति इंदिराजी को हटाने में सक्षम भी है और इंदिराजी को बंबई का जवाब भी है।''

इंदिराजी ने अकालीदल को बांटने और उसे कमजोर करने के उद्देश्य से भिंडरावाले को मान्यता दी और उसे प्रचारित किया जो देश के सामने सबसे बड़ी कलंकित सेवा थी। आज तक देश में यह आग ठंडी नहीं हो पाई है जिसका वर्तमान शिकार पंजाब के वर्तमान मुख्य मंत्री श्री बेअंतसिंह है।

लिट्टे से सांठगांठ कर उसे आर्थिक सहायता प्रदान करना, उसके लिए हथियार उपलब्ध करवाना और उसे हर प्रकार प्रोत्साहित करना कम खतरनाक कदम नहीं था और यह सब हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका की मैत्री के विरूध्द था।

अपने राजनीतिज्ञ पुत्र की हवाई दुर्घटना में निधन के उपरांत इसने अपने पायलट पुत्र को देश रूपी का सारथी बना दिया जिन्हें राजनीति का नाममात्र का भी अनुभव नहीं था।

भारतीय जनता पार्टी ने इन सभी उलटे कार्यों का प्रसार कर विरोध किया और निंरतर एक जुट होकर नैतिक और राष्ट्रीय चरित्र को प्रधानता हुई, अपनी राजनैतिक यात्रा में कोई अड़चन नहीं आने दी। प्रमुख नगरों में इसने कॉर्पोरेट चुनावों में अपने झंडे गाड़ दिए। यह जनभावना तब 1985 में फैली कि इंदिरा गांधी चुनाव में किसी भी स्थिति में नहीं जीत पाएँगी। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को भी यह कहते सुने गये कि वे इसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करेगें चाहे वे जीत कर भी आएँ। गोल्डन टेम्पल, अमृतसर की पवित्रता भंग करने के एवज में उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई। सिक्ख समुदाय पर मानों वज्रपात हुआ। हत्याएं और लूटपाट में जानमाल के अतिरिक्त 10,000 करोड़ रुपए की क्षति हुई । ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से इस नरसंहार रोकने और सुव्यवस्था की अपील की। इस नाटक का अंत राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बना कर तथा राव को गृहमंत्री बना कर समाप्त हुआ लेकिन विडम्बना देखिए सिक्खों के विरूध्द किए गए नरसंहार की सज़ा किसी को नहीं दी गई।

श्री राजीव गांधी का शासन

सहानुभूति की लहर से कांग्रेस ने अधिक से अधिक सीटे आम चुनाव में जीती और पंडित नेहरू से भी ज्यादा बहुमत कांग्रेस को मिला। एक राजकुमार के रूप मिस्टर क्लीन की छवि राजीव के चेहरे पर जबर्दस्ती जड़ दी गई लेकिन अंत में यह महसूस किया गया कि चुनाव जीतना देश चलाने से काफी आसान है।

श्री लोंगोवाल के साथ हुए पंजाब करार का कभी कार्यान्वयन नहीं हो पाया। आसाम करार से बंगलादेश के घुसपेठियों की चांदी हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो का फैसला सुनाया तो शुरू में उसका पक्ष इस सरकार ने किया लेकिन कुछ समय बाद ही इनके द्वारा इसका विरोध किया जाने लगा। मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए अयोध्या में जो कुछ हुआ और बाद में हिंदुओं को खुश करने के लिए जो हुआ, वह सर्वविदित है। श्रीलंका में सेना भेज कर रक्तक्रांति की गई जो उद्देश्यहीन थी।

भारतीय जनता पार्टी ने अपनी अगली रणनीति के लिए अपनी कमर कस ली। 1984 के चुनावों की समीक्षा की गई और पाई गई कमियों में सुधार किया गया। संगठन को जटिलता से सरलता में परिणत कर मानवीय मूल्यों के अनुरूप संगठन को बनाया गया। चुनाव सुधारों के लिए पार्टी ने संघर्ष किया। बंगलादेश से घुसपैठ कर भारत में आने जैसे समस्याओं को उठा कर भाजपा ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया। राजीव गांधी के दो वर्ष भी अभी पूरे नहीं हो पाए थे कि ''भाजपा'' ने सरकार आरोपों की झड़ी लगा दी।

विजय पथ पर अग्रसर : भारतीय जनता पार्टी

आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, उड़ीसा, गोवा, गुजरात एवं महाराष्ट्र में 1995 के चुनावों के परिणाम और भी अधिक उल्लेखनीय रहे। आन्ध्र प्रदेश में मुख्य टक्कर टी.डी.पी एवं कांग्रेस के बीच थी लेकिन फिर भी भारतीय जनता पार्टी 3 सीटें झटक गई। परन्तु कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी ने 40 सीटें जीती एवं कांग्रेस को तीसरे स्थान पर छोड़ दिया। गोवा में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने 60 सीटों के सदन में 4 सीटों पर जीत दर्ज की। उड़ीसा में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी संख्या तिगुनी अर्थात 3 से 10 तक पहँचा दी। बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पार्टी को तीसरे स्थान पर छोड़ा एवं प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभर कर सामने आया। महाराष्ट्र में शिव सेना एवं भारतीय जनता पार्टी ने संयुक्त सरकार का गठन किया। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत प्राप्त किया। इस प्रकार के सुखद परिणामों से न केवल भारतीय जनता पार्टी के आलोचकों बल्कि सभी को स्पष्ट हो गया कि अब भारतीय जनता पार्टी रूकने वाली नहीं है।

यह तर्कसंगत है कि 1989 में भारतीय जनता पार्टी ने जनता दल के साथ सीटों के समायोजन के कारण 89 लोक सभा की सीटों पर एवं 1991 में अयोध्या मुद्दे के परिणामस्वरूप 119 सीटों पर जीत दर्ज की। इसमें कोई संशय नही कि ये केवल अंशदायी घटक थे। हाल ही के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अपने उत्कृष्ट कार्य-निष्पादन एवम् अयोध्या मुद्दे के कारण विजयी हुई जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि भारतीय जनता पार्टी मुख्यतया अपने उत्कृष्ट संगठन, कुशल नेतृत्व एवं कुलीनता के कारण आगे बढ़ी है।

सन् 1991 में जन कांग्रेस ने अपनी सरकार गठित की तब उसे बहुमत प्राप्त नहीं था। भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण जिम्मेवारी से कार्य किया एवं इसे अपना लोकसभा अध्यक्ष अपनी इच्छानुसार एवं सहमति से उपाध्यक्ष चुनने में सहायता की। लाईसेंस-परमिट-कोटा राज का सब तरह से विरोध होने के बावजूद भी सैध्दान्तिक रूप से इसने उदारीकरण की नीति का स्वागत किया। सरकार ने इजरायल एवं साउथ अफ्रीका को मान्यता दी जिसके पक्ष में ''भाजपा'' निरंतर पहल करती रही।

आरक्षण के मामले में भारतीय जनता पार्टी ने दूरदर्शिता दिखाई एवं अर्थव्यवस्था मानदंडों पर ओ.वी.सी का समर्थन किया जोकि उच्चतम न्यायलय के निर्णय में ''क्रीमि लेयर''' के नाम से उल्लेख में आया।

भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों ने नई शिक्षा पध्दित का समर्थन किया एवं परीक्षा में नकल को अपराध घोषित किया। उन्होंने प्रशासन का विकेन्द्रीकरण किया एवं अंत्योदय योजना के अधीन गरीब एवं सीमांत किसानों को ऋण मुक्त किया। अपराधिक तत्वों के विरूध्द इसने युध्द छेड़ा एवं उन्हें जेल में डाला।

कांग्रेस की दोहरी नीति : कांग्रेस का दोहरा संबंध खुलकर सामने तब आया जब उन्होनें जनता दल एवं समाजवादी पार्टियों इत्यादि कि बीच मतभेद पैदा किये जिससे देश की जनता इनके विरूध्द खड़ी हो गई । उन्होनें अयोध्या के साथ खिलवाड़ जारी रखा परिणामस्वरूप 6 दिसम्बर, 1992 को विवादग्रस्त ढांचा गिराया गया। जो ढाँचा गिरने के पक्षधर थे, उन्होंने इसका स्वागत किया एवं संघ परिवार को बधाई दी और जो इसके पक्षधर नहीं थे उन्होंने संघ परिवार का खंडन किया हालांकि संघ परिवार का नेतृत्व यह नहीं जानता था कि यह किसने किया है। हम इसे सम्माजनक ढंग से कानून की विधि के अनुसार हटाना चाहते थे। जो कुछ भी हुआ वहा हमारी योजना का भाग नहीं था। इसलिए यह एक रहस्य पहेली बन कर रहा। अब यदि श्री अर्जुन सिंह के 1 दिसम्बर 1992 को मंत्रीमंडल से दिए गए त्यागपत्र में उल्लेख किए गए तथा पर नज़र डालें जोकि उन्होने प्रधानमंत्री को भेजा था जिसकी एक प्रति कांग्रेस के एक सक्रिय कार्यकर्ता द्वारा फैक्स द्वारा अयोध्या से भेजी गई थी जिसमें इस बात का उल्लेख था कि पाकिस्तान के कुछ एजेन्ट ढाँचे के साथ छेड़खानी एवं बाबरी मस्ज़िद को क्षति पहँचा सकते हैं यदि विश्च हिन्दू परिषद के कार सेवक अपने मिशन के अंतर्गत कामयाब नही हो पाते। विश्व हिन्दू परिषद का कोई ऐसा मिशन नही था। परन्तु मुद्दा यह है कि क्यों इस फैक्स सन्देश को सरकारी तंत्र से दूर रखा गया। अत: यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान एवं इसके मित्रों का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम दंगें भड़काना, मुम्बई में बम विस्फोट करवाना था जिससे भारत की छवि खराब हो एवं भारतीय अर्थव्यव्स्था की विकास गति धीमी हो। यह भी रिर्पोटें प्राप्त हुई कि 6 दिसम्बर को नई दिल्ली में पाकिस्तान को हाई कमीशन में खुशियाँ मनाई गई। परन्तु इसके अतिरिक्त, सरकार ने चार राज्य सरकारों को बर्खास्त करते हुए चार राज्य विधान मण्डलों को भंग किया एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार किया।

इसी बीच, उदारीकरण एवं वैश्वकरणी के नाम पर विदेशी बैंको एवं गैर-ईमानदार सट्टेबाजों को देश को धोखा देने के लिए अनुमति प्रदान की गई जिसके परिणामस्वरूप देश में करोड़ों रूपए के प्रतिभूति घोटाले हुए लेकिन सरकार इस विषय पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट की विसंगतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। उद्योगपतियों को करोड़ों रूपए की क्षति हुई जिन्होंने राष्ट्रीयकृत बैंको से अपने ऋणों की अदायगी नहीं की थी। दूसरी ओर लाभ कमा रहे सरकारी उपक्रमों को बेचा जा रहा है परिणामस्वरूप मूल्यों में अभूतपूर्व वृध्दि हुई। इसकी प्रतिक्रिया में भारतीय जनता पार्टी ने एक वार्षिक विकल्प बजट  देकर मूल्य वृध्दि को रोका गया और रोजगार के अवसरों में वृध्दि की।

सबसे खतरनाक कार्य यह रहा कि विवादों के हर घेरे में सरकार का विदेशी ताकतों के आगे झुकना है जिससे हमारी अखंडता एवं स्वतंत्रता को खतरा है।

भारतीय जनता पार्टी के उदारीकरण योजना पर नजर डालने पर हम पायेगें कि हमने आंतरिक रूप से कम एवं बाह्य रूप से अधिक उदारीकरण को अपनाया है। फिलहाल हमें एक चीनी मिल अथवा जूते के फैक्टरी पा्ररंभ करने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता होती है। निसंदेह इंस्पेक्टर राज ने लघु उद्योगों से संबंधित निमार्ताओं का निरन्तर शोषण किया है जोकि भारतीय उद्योग की रीढ़ की हड्डी है। परन्तु विदेशियों को बेकार खाद्य पदार्थों के विक्रय के लिए भारत में आने की अनुमति प्रदान की जाती रही है।

भारतीय जनता पार्टी की स्पष्ट स्थिति

वर्तमान राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम की अध्यक्षता में हमारा रक्षा एवं अनुसंधान विकास संगठन द्वारा प्रस्तुत भारतीय किसान एवं प्रौद्योगिकी के मुद्दों पर जो प्रगति की ओर उन्मुख हैं, भारतीय जनता पार्टी की स्थिति स्पष्ट है। इसलिए पार्टी ने गहन पूंजीगत हाइटैक एवम् मूलभूत ढांचे के विकास क्षेत्रों में विदेशी पूंजी का स्वागत किया। तथापि उसने यह भी स्वीकार किया कि इसे उचित एवम प्रतियोगितात्मक दरों पर किया जाना चाहिए। चूंकि एनारॉन एक अदूरदर्शी, खर्चीला एवं अस्पष्ट सौदा था। अत: महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सरकार द्वारा इसे रद्द कर दिया गया। यह राष्ट्री हित एवम् राष्ट्रीय सम्मान को संरक्षित करने वाली पार्टी है। जिसका मूलमंत्र ''स्वदेशी'' भी है। इस मूलमंत्र में यह स्पष्ट रूप से अवगत करवाया गया है कि भारत किसी भी प्रकार की गलत शर्तों पर अनुदान नही लेगा पूरे विश्व ने भारत के इस पहलू को बेहतर माना है।

भारतीय जनता पार्टी की स्थिति का चित्रण डॉ. सैमुएल डीत्र हटिंगटन ने अपने लेख ''कलश ऑफ सिवलाइजेशन'' में किया है जिसके अंतगर्त वह कहता है कि अन्तर्राष्ट्रीय मॉनिटरी फंड तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए गैर पश्चिमी मुल्कों पर ऐसी शर्तें थोपता है जो उसे अपने हित में लगती हैं।

आज विदेशी दबाव बहुत अधिक है। राष्ट्रवादी ताकतों को संबल प्रदान करने के लिए देश को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। विदेशी दबाव के तले हमारे मिसाइल कार्यक्रम में रोक लग गई है। विपरीत परिस्थिति में सरकार ने सी.एन.एन के साथ असमान करार पर हस्ताक्षर किए हैं। देश में सांस्कृतिक ह्ास हो रहा है जिसके लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपना आधार तैयार किया है। उन्होने राष्ट्र विरोधी प्रत्यक्ष संशोधन बिल को पारित करने पर रोक लगाई है जिसमें एनरॉन सौदे को रद्द करना भी शामिल है।

भारतीय जनता पार्टी ने हर ऐसे विवादों का खुलकर विरोध किया। राष्ट्र विरोधी पेटेन्ट कानून में संशोधन के लिए विधेयक पारित करने की पूरी तैयार है। एनरॉन डील के परिसमापन के लिए दल ने जो कार्य किया, वह सर्वविदित है। स्टॉर टी.वी पर गाँधी विरोधी और राष्ट्र विरोधी कार्यक्रमों को रोक दिया गया। इतना ही संसद के अधिवेशन को प्रारम्भ करने और समापन पर वंदे मातरम के अनिवार्य गायन के लिए भी पार्टी ने सरकार को राजी करवाया। डॉ. जोशी के नेतृत्व में 1992 में भारतीय जनता पार्टी ने गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय घ्वज फहराया। भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक शाखा ने हुगली पब्लिक ग्राउंड में ईद की नमाज़ के साथ साथ विधिवत रूप से राष्ट्रीय घ्वज़ फहराया।

अनुच्छेद 44 के अधीन भारतीय नागरिकों पर अनिवार्य रूप से एक रूप सिविल कोड लागू करवाना और भाजपा की चार राज्य सरकारों को गिराने से जो स्थिति बनी, उसे कौन नही जानता। इस्लाम के नाम पर पत्नी को छोड़ कर दूसरी शादी की कुरीतियों को दूर किया। आज भारतीय जनता पार्टी निरंतर इन बुराईयों से लड़ रही है।

गणना करने वाले लोग सोचते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की रफ्तार गणितीय अनुपात में नही बढ़ सकती लेकिन वे नहीं जानते कि चुनाव का कोई गणित नही होता उसका तो रसायन है जो अन्य घटक दलों के साथ तालमेल को महत्व देता है। यह स्थिति स्पष्ट होन पर लाखों वे लोग जिनेने कभी भी भाजपा को वोट नही दिया, भाजपा के साथ हो गए। उत्तार प्रदेश की स्थिति को कौन नही जानता जहाँ एक दलित महिला का साथ देकर उसे मुख्यमंत्री के सिंहासन पर बैठा दिया। इसीलिए ''पायोनियर'' ने इस संबंध में लिखा कि ''राम ने शबरी को राजा बनाया''

जब तक कांग्रेस का कोई विकल्प नही माना जाता था, आज की स्थिति में यह उल्टा हो गया है। अब भाजपा का कोई विकल्प नही दिखता। 1967 में आंतरिक समर्थन से 1989 में बाहरी समर्थन से ''भाजपा'' ने सबक सीखा और यह ''नेति नेति'' के सिध्दान्त पर चलता चला गया।

''एकला चलो रे'' की पंक्ति ने भारतीय जनता पार्टी में प्राण फूंक दिए और इस सिध्दान्त ने उस पर जादू सा असर किया।

देश की स्थिति में आए महत्वपूर्ण बदलाव से वे लोग जो इसे पहले की तरह ही देखता चाहते हैं, उनके खेमे में बौखलाहट साफ देखी जा सकती है। भारतीय जनता पार्टी पूरे मनोयोग से देश में राम राज्य की स्थापना ओर रविन्द्रनाथ टैगोर की प्रार्थना ''एक धर्मराज्य हाबले भारते'' की संकल्पना को चरितार्थ करने के महान संकल्प को पूर्ण करने में संलग्न है जो भारत की जनता जनार्दन की आकांक्षा भी है।

सत्यमेव जयते

 

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