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भारत-चीन सम्बन्ध
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यह खुशी की बात है कि हाल के दशकों में भारत और चीन के बीच संबंध तेजी से सुधर रहे हैं। एक गौरवशाली भविष्य एशिया में शांति व स्थिरता को बढ़ावा देने तथा विश्व में सामान्य जन-जीवन को समृध्द बनाने हेतु दुनिया की इन दो प्राचीन सभ्यताओं को मिलकर आपसी सहयोग के मार्ग पर चलने का आह्वान कर रहा है। मेरा खयाल है कि अब दोनों देशों को सीमा विवाद को निष्पक्षता एवं आपसी सौहार्द तथा वस्तुस्थिति के आधार पर तत्काल हल करने की आवश्यकता और महत्त्व को स्वीकार करना चाहिए।

यह संतोषजनक बात है कि चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी वर्ष 2003 से दोनों देशों की सरकारों द्वारा आपसी बातचीत के एक संस्थागत तंत्र को सौंप दी गई है। नई दिल्ली और बीजिंग, दोनों ने ही आश्वासन दिया है कि अन्य क्षेत्रों में पारस्परिक लाभदायक सहयोग से सीमा विवाद के कारण बाधित न हो। दूसरे शब्दों में, बातचीत के जरिए सीमा-निर्धारण और सहयोगदोनों समानांतर मार्ग पर साथ-साथ चल रहे हैं और दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूर्व स्थिति को बदलने के लिए बल-प्रयोग की संभावना को नकार दिया है।

विश्व के इन दो बड़े देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनानेवाला यह आधारभूत खाका तैयार करने का श्रेय मुख्य रूप से दो महान् नेताओंभारत की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी और चीन की ओर से डेंग जियाओपिंगको जाता है। फरवरी 1979 में भारत के विदेश मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी चीन के दौरे पर गए थे। इस प्रकार, सन् 1962 के बाद चीन की यात्रा पर जानेवाले वह पहले भारतीय नेता बने। बीजिंग स्थित ग्रेट हॉल ऑफ पीपुल में उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हुए डेंग जियाओपिंग ने कहा था, 'हमारे कुछ आपसी मसले हैं, जिनपर हमारे विचार भिन्न हैं। उन मसलों को अलग रखकर फिलहाल हमें ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए कि समस्या से निपटा जा सके। हम दो देश विश्व के सर्वाधिक जनसंख्यावाले देश हैं और दोनों एशियाई देश हैं। आखिर हम मित्र क्यों नहीं हो सकते?' वाजपेयी और डेंग ने सीमा समस्या के लिए एक 'पैकेज हल' पर विचार-विमर्श किया, जिसमें दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे को कुछ छूटें देने की बात की गई थी। मेरा विश्वास है कि समस्या को सुलझाने के लिए आगे बढ़ने का यह सबसे अच्छा तरीका है।

इस संदर्भ में, दिसंबर 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक चीन यात्रा के महत्त्व और योगदान का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। राजीव गांधी और डेंग की प्रसिध्द भेंट तथा दोनों देशों के बीच शांति व मित्रतापूर्ण संबंध बहाल करने के लिए दोनों नेताओं द्वारा दिखाई गई गर्मजोशी से इस उम्मीद को बहुत बल मिला था कि हमारे द्विपक्षीय संबंधों को 1962 की कड़वी यादों से उबारा जा सकता है। इस उम्मीद को वास्तविकता में बदलने की प्रक्रिया उस समय आगे बढ़ी, जब जून 2003 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन का दौरा किया और राष्ट्रपति हू जिंताओ तथा प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से मिलकर इस संदर्भ में सार्थक बातचीत की।

नवंबर 2006 में हू जिंताओ स्वयं भारत के दौरे पर आए। उनके साथ नई दिल्ली में अपनी बैठक के दौरान मैंने सीमा विवाद को आपसी बातचीत के जरिए सुलझाने के दोनों देशों के प्रयासों की सराहना की थी। मैंने कहा कि कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए पाकिस्तान को भी यही तरीका अपनाना चाहिए, और साथ ही आपसी लाभ के क्षेत्रों में सहयोग के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। बातचीत के दौरान मैंने यह उम्मीद भी प्रकट की कि चीन सरकार ऐसा प्रयास करेगी कि तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा अक्तूबर 2008 में आयोजित होने जा रहे बीजिंग ओलंपिक से पहले तिब्बत जा सकें।

 

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