विविधता में एकता, सभी धर्मों के प्रति आदर तथा अलग-अलग मतों के प्रचारक लोगों के बीच परस्पर सहनशीलता, सहअस्तित्व की भावना की दृष्टि से भारत विश्व के सामने गौरवशाली एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राय: कुछ स्थानीय परिस्थितियों में, विभिन्न धर्मों पर आधारित समुदायों के बीच संबंधों के साथ-साथ तनाव भी प्रदर्शित होता है, जो अकसर हिंसात्मक संघर्ष की आग में घी का काम करता है। एक ही समुदाय के भीतर भी संबंधों में तनाव के बारे में भी यह बात सही पाई गई है। लेकिन ऐसी सभी घटनाएँ निरपवाद रूप से मतिभ्रंश के कारण होती हैं और ये भारत की सामाजिक वस्तुस्थिति का स्थायी चरित्र नहीं है। ये मात्र अपवाद हैं, न कि कोई नियम।
विविधता में एकता, सभी धर्मों के प्रति आदर तथा अलग-अलग मतों के प्रचारक लोगों के बीच परस्पर सहनशीलता, सहअस्तित्व की भावना की दृष्टि से भारत विश्व के सामने गौरवशाली एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राय: कुछ स्थानीय परिस्थितियों में, विभिन्न धर्मों पर आधारित समुदायों के बीच संबंधों के साथ-साथ तनाव भी प्रदर्शित होता है, जो अकसर हिंसात्मक संघर्ष की आग में घी का काम करता है। एक ही समुदाय के भीतर भी संबंधों में तनाव के बारे में भी यह बात सही पाई गई है। लेकिन ऐसी सभी घटनाएँ निरपवाद रूप से मतिभ्रंश के कारण होती हैं और ये भारत की सामाजिक वस्तुस्थिति का स्थायी चरित्र नहीं है। ये मात्र अपवाद हैं, न कि कोई नियम। भले ही ये अपवाद हैं, लेकिन कोई भी सही सोचवाला व्यक्ति जाति-धर्म के नाम पर हिंसा के लिए न तो इन कृत्यों को माफ कर सकता है, न ही इनका औचित्य सिध्द कर सकता है। इसलिए, मुझे यह देखकर कष्ट हुआ कि हमारे ईसाई भाइयों के प्रति बरती गई हिंसा की कतिपय दुर्भाग्यपूर्ण एवं पूर्णतया निंदनीय घटनाओं को वाजपेयी सरकार की अल्पसंख्यक-विरोधी छवि के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया। देश के भीतर तथा अंतरराष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर भाजपा को बदनाम करने के लिए निरंतर व्यवस्थित ढंग से प्रचार अभियान चलाया गया। इस अभियान का प्रारंभ उड़ीसा के मनोहरपुर गाँव की दिल दहला देनेवाली दुर्घटना से हुआ था, जहाँ 22 जनवरी, 1999 की सुबह ऑस्टे्रलिया के मिशनरी ग्राहम स्टेंस तथा उसके दो छोटे बेटों को जिंदा जला दिया गया। इस अपराध की क्रूरता ने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया। प्रत्येक नागरिक का सिर शर्म से झुक गया। हमारी सरकार ने तत्परता के साथ कार्रवाई की। एक सप्ताह से भी कम अवधि में गृह मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.पी. वधवा की अध्यक्षता में जाँच आयोग गठित किया। इस आयोग ने छह माह से भी कम अवधि में विशद रिपोर्ट प्रस्तुत करके रिकॉर्ड कायम किया। उन्होंने यह निर्णय दिया कि दारा सिंह नामक व्यक्ति इस अपराध का दोषी है, वह तथा उसके साथी आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं। निष्पक्ष जाँच के चलते दोष-सिध्दि में विलंब नहीं हुआ; जिसका सारा श्रेय भारत की पंथ-निरपेक्षता और हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका, दोनों को जाता है। जब यह घटना घटित हुई, तब राजनीतिक वर्ग के कुछ लोगों और कुछ बुध्दिजीवियों ने तत्काल संघ और इसके सहयोगी संगठनों को दोषी ठहराया तथा इसके साथ भाजपा को जोड़कर हमारी सरकार की छवि को धूमिल करने की कोशिश की। इसलिए मैं संसद् में यह दावा करने के लिए विवश हो गया, 'मैं इन संगठनों को जानता हूँ। ये अपराधी नहीं हैं।' हमारे राजनीतिक विरोधियों ने विश्व भर में इस बात का दुष्प्रचार करने के लिए कि मैं स्टेंस के हत्यारों का पक्ष ले रहा हूँ, मेरे इस वक्तव्य का इस्तेमाल किया। यहाँ यह बताना उचित होगा कि अपराध की जाँच करनेवाले वधवा आयोग और केंद्रीय जाँच ब्यूरो दोनों ही संघ एवं न्यायालय द्वारा दोषी पाए गए अपराधियों के बीच कोई संबंध नहीं ढूँढ़ पाए। लोगों से मेरी अपील है कि वे दुष्प्रचार की बजाय तथ्यों पर विश्वास करें। हालाँकि स्टेंस तथा उनके बेटों की हत्या निस्संदेह अमानवीय घटना थी, फिर भी इस घटना से जुड़े सामाजिक संदर्भ की उपेक्षा नहीं की जा सकती। स्वयं वधवा आयोग ने भी नोट किया था कि 'ईसाई मत के प्रसार के कारण ईसाई तथा गैर-ईसाई ग्रामीणों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था। इस तनाव के कारण थे(1) ग्रामीणों ने ईसाई धर्म अपनाने के बाद गाँव के त्योहारों के आयोजन में चंदा देना बंद कर दिया था। (2) ये लोग स्थानीय धार्मिक त्योहारों तथा जनजातीय नृत्य समारोह आदि में भाग नहीं लेते थे। (3) राजा, मकर संक्रांति तथा अन्य त्योहारों के समय जनजातीय परंपरा के प्रतिकूल ये लोग भूमि जोतने लगे थे। ईसाई मतानुयायियों के ऐसे आचरण के कारण अन्य ग्रामीण क्षुब्ध हो गए।' आयोग ने यह भी नोट किया कि स्टेंस सनातन धर्म को मात्र मूर्ति-पूजक तथा पशु-पूजक संप्रदाय बताते थे। अत्यधिक गरीब लोगों के बीच कुष्ठ-निवारण संबंधी कार्य करने के अलावा 'स्टेंस अपने धर्म के प्रति गहरी वचनबध्दता तथा इस विश्वास से प्रेरित होकर मिशनरी कार्य में संलिप्त थे कि उन्हें इस क्षेत्र के लोगों के बीच अपने मत का प्रसार करना चाहिए। उनके मिशनरी कार्यों के परिणामस्वरूप जनजातीय लोग उनके मत में धर्मांतरित होने लगे।' हालाँकि लंबे समय से भारत में ईसाई मिशनरियों पर छिटपुट हमलों की घटनाएँ होती रही हैं, लेकिन वाजपेयी सरकार के छह वर्ष के कार्यकाल में इन घटनाओं का देश के भीतर तथा विदेशों में जितना सनसनीखेज प्रचार हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ था। मैं हमेशा ऐसी घटनाओं का खंडन करता रहा हूँ। 16 दिसंबर, 1998 को ईसाइयों पर होनेवाले अत्याचारों के मुद्दे पर लोकसभा में बोलते समय मैंने कहा, 'जहाँ तक हमारी सरकार का संबंध है, मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस देश के प्रत्येक नागरिक कोचाहे वह अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यकयहाँ पर असुरक्षित अनुभव नहीं करना चाहिए।' मैंने यह भी दावा किया कि 'हिंदू धर्म में असहिष्णुता का कोई स्थान नहीं है। मैं इससे आगे कहूँगा कि असहिष्णुता का इस देश की संस्कृति में कोई स्थान नहीं है।' मैं मानता हूँ कि हिंदू और ईसाईवस्तुत: अलग-अलग धर्मों के अनुयायियों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। ईसाई धर्म लगभग 2,000 वर्ष पहले भारत में आया था जब विश्व के अनेक ईसाई राष्ट्रों का उससे संपर्क हुआ। ईसाइयों के विविध क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान से हमारा राष्ट्रीय जीवन समृध्द हुआ है। कराची के एक कैथोलिक स्कूल में पढ़ने के बाद मैं शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अनाथ लोगों की देखभाल के प्रति ईसाई मिशनरी के सेवा-भाव तथा उनके मानव सेवा संबंधी कार्यों के प्रति उत्कृष्ट प्रतिबध्दता की अत्यधिक सराहना करता हूँ। वास्तव में मेरे कुछ परम एवं अंतरंग मित्र ईसाई हैं। इसके बावजूद मुझे स्पष्ट रूप से बताना पड़ रहा है कि विदेशी सहायता प्राप्त करके धार्मिक समूहों द्वारा धर्मांतरण अभियान हिंदू समाज और राष्ट्रीय अखंडता के लिए बड़ा खतरा है। मुझे भारत की बहुधार्मिक प्रकृति पर गर्व है तथा मैं बिना किसी संशय के प्रत्येक नागरिक के धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का आदर करता हूँ। फिर भी, समाज-सेवा की आड़ में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा कमजोर तबके के लोगों के व्यवस्थित ढंग से एवं व्यापक स्तर पर धर्म-परिवर्तन को धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। न ही धार्मिक स्वतंत्रता के इस दुरुपयोग के प्रति विरोध करने तथा छल-कपट से धर्मांतरण के संबंध में कानून बनाने की माँग करने के लिए हिंदू संगठनों पर दोषारोपण किया जा सकता है।* धर्मांतरण पर गांधीजी के विचार धर्मांतरण के संबंध में मैं यहाँ गांधीजी के विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ 'मैं विश्वास नहीं करता कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का धर्मांतरण करे। दूसरे के धर्म को कम करके ऑंकना मेरा प्रयास कभी नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ है सभी धर्मों के सच में विश्वास करना, और उनका सम्मान करना। इसका अर्थ है, सच्ची विनयशीलता... मेरा मानना है कि मानवतावादी कार्य की आड़ में धर्म-परिवर्तन रुग्ण मानसिकता का परिचायक है। यहीं लोगों द्वारा इसका सबसे अधिक विरोध होता है। आखिर धर्म नितांत व्यक्तिगत मामला है। यह हृदय को छूता है...। मैं अपना धर्म इस वजह से क्यों बदलूँ कि ईसाई मत का प्रचार करनेवाले उस डॉक्टर का धर्म ईसाई है, जिसने मेरा इलाज किया है? या डॉक्टर मुझसे यह उम्मीद क्यों रखे कि मैं उससे प्रभावित होकर अपना धर्म बदल लूँगा?' ('यंग इंडिया', 23 अप्रैल, 1931) * अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा जैसे राज्यों में धर्मांतरण-विरोधी कानून पहले से ही विद्यमान है, जो कांग्रेस सरकार द्वारा पारित किया गया था। इसी प्रकार, विश्व के अनेक देशों में भी ऐसा ही कानून विद्यमान है। 'यदि मेरे पास शक्ति है तथा मैं इसका प्रयोग कर सकता हूँ तो मुझे धर्म-परिवर्तन को रोकना चाहिए। हिंदू परिवारों में मिशनरी के आगमन का अर्थ वेशभूषा, तौर-तरीके, भाषा, खान-पान में परिवर्तन के कारण परिवार का विघटन है।' ('हरिजन', 5 नवंबर, 1935) 'आज भारत में और अन्य कहीं भी धर्मांतरण की शैली के साथ सामंजस्य बिठाना मेरे लिए असंभव है। यह ऐसी गलती होगी, जिससे संभवत: शांति की ओर विश्व की प्रगति में बाधा आएगी। कोई ईसाई किसी हिंदू को ईसाई मत में धर्मांतरित क्यों करना चाहता है? यदि हिंदू भला आदमी है या धर्मपरायण है तो वह इससे संतुष्ट क्यों नहीं हो पाता?' ('हरिजन', 30 जनवरी, 1937) ईसाई संगठनों तथा उनके नेताओं से मेरी अपील है कि वे धर्मांतरण के संबंध में हिंदुओं का भय दूर करने के लिए आगे आएँ। मैं उन्हें आर्चबिशप एस. अरुलप्पा की याद दिलाना चाहता हूँ, जो हैदराबाद में विशिष्ट धार्मिक व्यक्ति के रूप में व्यापक स्तर पर सम्मानित हैं और फरवरी 2005 में जिनका स्वर्गवास हो गया। एक बार उन्होंने मुझसे कहा था, 'मैं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आपकी अवधारणा का पूरा समर्थन करता हूँ। जन्म से मैं भारतीय हूँ, संस्कृति से हिंदू हूँ तथा धर्म की दृष्टि से ईसाई हूँ।' भारत की साझी संस्कृति के प्रति सहिष्णुता, परोपकार तथा गौरव की यह भावना हर किसी के लिए अनुकरणीय है। साथ ही, मैं हिंदू संगठनों से भी अपील करता हूँ कि वे ईसाई समुदाय के साथ व्यवहार के दौरान कट्टरता एवं उग्रता का सहारा न लें। हमें संवाद एवं मेल-मिलाप के सारे द्वार खोलकर प्रत्यारोप तथा कटु निंदा के सारे द्वार बंद कर देने चाहिए। |