Homearrow मुद्दे arrow विकास arrow पर्यावरण पर आडवाणीजी के विचार
पर्यावरण पर आडवाणीजी के विचार
Print Print      
SocialTwist Tell-a-Friend

''मैं ये पंक्तियाँ परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में लिख रहा हूँ, जो कि पवित्र गंगा के तट पर स्थित एक आदर्श आश्रम है और जिसके पीछे विशाल हिमालय दुर्ग के समान खड़ा है। इसका संचालन पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती द्वारा किया जाता है, जिनके द्वारा हिंदू धर्म के नवजागरण और सुधार के लिए किए गए कार्यों की मैं अत्यंत प्रशंसा करता हूँ।

स्वामीजी ने मेरे साथ अपने आश्रम में चल रही और कई भावी परियोजनाओं पर चर्चा की। इनमें गंगा को साफ करना, उत्तराखंडजिसे 'देवभूमि' माना जाता है, को प्लास्टिक और अन्य कूड़ा-करकट से मुक्त करना तथा राज्य के तीर्थस्थलों का सौंदर्यीकरण एवं पुनर्सज्जा करना शामिल हैं। इस विचार ने मुझे बहुत प्रभावित किया क्योंकि हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा, वाराणसी और भारत के कई अन्य पवित्र स्थलों की स्थिति काफी बुरी है, जहाँ प्रतिवर्ष पूरे भारत से लाखों श्रध्दालु आते हैं। ये मुझे हमेशा निराशा से भर देते हैं। सौभाग्य से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) बी.सी. खंडूरी ने भी हमारे साथ इस परिचर्चा में भाग लिया और यह निर्णय लिया कि सरकार, सामाजिक संगठन एवं धार्मिक प्रतिष्ठान एक साथ मिलकर इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए एक व्यापक और समयबध्द अभियान चलाएगी। इसे सर्वप्रथम गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री से आरंभ किया जाएगा। तदुपरांत यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ, उत्तरकाशी, हेमकुंट, ऋषिकेश और हरिद्वार में कार्यान्वित किया जाएगा। मैं इस परियोजना के आरंभ होने के प्रति दो कारणों से आश्वस्त था। पहला कि खंडूरी कर्मठ व्यक्ति हैं और वाजपेयी सरकार में भूतल एवं परिवहन मंत्री के रूप में उन्हें महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना को लागू करने के लिए राष्ट्रव्यापी प्रसिध्दि मिली। दूसरे, उत्तराखंड और पूरे भारत में दूरदृष्टि रखनेवाले ऐसे कई धार्मिक नेता हैं, जो 'निर्मल गंगा' के स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिए योगदान करने की इच्छा रखते हैं।

यह मेरा सपना है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त देख सकूँगंगोत्री से गंगासागर तक, पश्चिम बंगाल का वह स्थान, जहाँ वह सागर में मिलती है। इस उद्देश्य से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 के दशक में 'गंगा एक्शन प्लान' के नाम से एक सराहनीय परियोजना आरंभ की थी। दुर्भाग्य से उसके वांछित परिणाम नहीं निकल सके, क्योंकि उसे नौकरशाही के तरीके से लागू किया गया था और उसमें उन लोगों का उत्साह सम्मिलित नहीं था, जिसे मैं गंगा परिवारगंगा के दोनों ओर रहनेवाले लोग एवं देश के विभिन्न भागों से आनेवाले तीर्थयात्री और सबसे महत्त्वपूर्ण गंगा के साथ-साथ स्थापित सैकड़ों धार्मिक प्रतिष्ठानकहता हूँ।

मुझे कोई संदेह नहीं है कि यदि समाज और राज्य द्वारा संयुक्त रूप से दृढ़ व सतत प्रयास किया जाए तो पवित्र गंगा को उसकी प्राचीन शुध्दता प्रदान की जा सकती है। हालाँकि इस लक्ष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने में वर्षों लग सकते हैं, लेकिन यह महायज्ञ करना उपयोगी होगा। वास्तव में हमारा दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए भारत की सभी नदियों, झीलों और जल निकायों को प्रदूषण-मुक्त करना; क्योंकि वे केवल हमारे देश के विकास की जीवन-रेखा ही नहीं हैं, बल्कि भारत की प्राचीन एवं गौरवपूर्ण सभ्यता के संकेत और संवाहक भी हैं।''

 

top

Print Print      
SocialTwist Tell-a-Friend
< Prev   Next >