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संसद में विश्वासमत के दौरान आडवाणी जी के भाषण से उध्दरण अमेरिका के साथ स्टे्रटेजिक भागीदारी, मगर समान शर्तों पर प्रधानमंत्री के विरूध्द मेरा यह आरोप है कि उन्होंने दो सम्प्रभु राष्ट्रों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते को दो व्यक्तियों - स्वयं तथा राष्ट्रपति बुश के बीच सीमित कर दिया। उन्होंने इस भागीदारी में एक तरह से कनिष्ठ भागीदार के रूप में व्यवहार किया है। वास्तव में, परमाणु समझौते के मूल पाठ और संदर्भ ने शुरू से ही भारतीयों कों यह आभास दिलाया है कि यू.पी.ए. सरकार विश्व-व्यवस्था में भारत की कमजोर स्थिति को स्वीकार करना चाहती है। मैं साफ करना चाहता हूं - और यहां पर वामपंथियों के साथ मेरी पार्टी पूरी तरह से अलग है-कि भाजपा भारत और अमेरिका के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को देखना चाहती है। वास्तव में, दुनिया का एक सबसे बड़ा लोकतंत्र और दूसरा दुनिया का सर्वाधिक मजबूत लोकतंत्र - मैं मानता हूं कि हमारे दोनों देशों को समान उद्देश्यों के लिए स्टे्रटेजिक भागीदारी बनानी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत को इसके साथ-साथ आज विश्व की अन्य सभी बड़ी शक्तियों के साथ गहरी मित्रता और सहयोग स्थापित करना चाहिए जिसे हम भविष्य में एक बहु-धु्रव विश्व के रूप में देखना चाहते हैं। एक ऐसा बहु-धु्रवीय विश्व जिसमें भारत स्वयं ही सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए कार्य करते हुए एक महत्वपूर्ण धु्रव बने। लेकिन मैं बता दूं कि हम अमेरिका से समान शर्तों पर स्टे्रटेजिक भागीदारी चाहते हैं। भाजपा कभी भी, किसी भी देश से ऐसे सम्बन्धों को स्वीकार नहीं करेगी, चाहे वह देश कितना भी मजबूत और शक्तिशाली क्यों न हो -जिसमें भारत एक 'क्लाइंट' या जी-हजूरी वाला भागीदार बनता हो। यह दु:ख की बात है कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि भारत संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों में ''स्टे्रटेजिक जी-हजूरी'' को स्वीकार करे। स्टे्रटेजिक जी-हजूरी'' का पहलू उन प्रतिबंधों में अधिक झलकता है जिन्हें सरकार ने हमारे स्टे्रटेजिक कार्यक्रम के बारे में स्वीकार किया है। परमाणु समझौता अपने वर्तमान स्वरूप में कुछ नहीं है बल्कि हमारे स्टे्रटेजिक परमाणु अस्त्र कार्यक्रम के बारे में कठोर प्रतिबंधों की स्वीकृति है। सभी अमेरिकी वार्ताकारों चाहे वे रिपब्लिकन पार्टी के हों या डेमोक्रेटिक पार्टी से सम्बन्ध रखते हों या स्वतंत्र विशेषज्ञ हाें,ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जहां तक उनके देश का सम्बन्ध है, उनका प्रमुख उद्देश्य भारत को परमाणु अप्रसार व्यवस्था के अंतर्गत लाना है। जो वे चाहते हैं, वह डा0 मनमोहन सिंह के उस आलोचनात्मक रूख से पूरी तरह मेल खाता है जो उन्होंने 1998 में पोखरण-2 परमाणु परीक्षण के बाद अपनाया था। वे दोनों चाहते हैं कि भारत अमेरिका द्वारा निर्देशित परमाणु अप्रसार व्यवस्था के अधीन आ जाए। इसलिए, वर्तमान स्वरूप में परमाणु समझौते का अर्थ है कि भारत को समझौते को समाप्त किए बगैर और कठोर दंडकारी कार्रवाई के बिना पोखरण-3 और पोखरण-4 परमाणु विस्फोट करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह मेरी पार्टी, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन, इस सदन के अधिकांश सांसदों तथा कुल मिलाकर, देश की जनता को स्वीकार्य नहीं है। |