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भारतीय जनता पार्टी संसद तथा विधानमंडलाें में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग करने वाली पहली पार्टी है महिलाओं का सर्वांगीण सशक्तीकरण बेहतर तथा अधिक न्यायोचित समाज-निर्माण का अनिवार्य एवं आंतरिक भाग है। आरक्षण की नीति के माध्यम से महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की अत्यधिक एवं अत्यावश्यक महत्ता है। भाजपा पहली पार्टी है, जिसने वर्ष 1994 में संसद् तथा राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को पारित किया था। हमारी सबसे पहली और अभी तक की अकेली पार्टी है जिसने सर्वप्रथम अपने संगठन के भीतर सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है। मेरी सहयोगी तथा असाधारण वक्ता एवं योग्य सांसद सुषमा स्वराज ने दोनों प्रस्तावों को पारित करने के लिए पार्टी को सहमत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिलाओं के लिए आरक्षण का सीधा-सादा औचित्य यह है कि सार्वजनिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। एक पुरुष की तुलना में उन्हें दोगुनी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। यहाँ तक ऐसी महिलाओं को भी जो पुरुषों की तुलना में दोगुनी सक्षम और योग्य होती हैं। संसद्, राज्य विधायिका तथा मंत्रालयों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व मुझे अखरता है। यह इसलिए भी असमर्थनीय है कि वर्ष 1992 में 73वें एवं 74वें संवैधानिक संशोधन के बाद महिलाओं ने पंचायतों और स्थानीयशासी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर उत्कृष्ट काम किया है। इस क्रांतिकारी उपाय के फलस्वरूप भारत में विभिन्न पंचायती राज संस्थाओं में आज लाखों महिला सदस्य हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में सहकारी निकायों तथा स्व-पोषित समूहों में महिलाएँ निर्वाचित हुई हैं। यह भारत के लिए गर्व की बात है कि बुनियादी स्तर पर लोकतांत्रिक संगठनों में भी सबसे बड़ी संख्या में महिलाएँ निर्वाचित हुई हैं। वास्तव में सर्वश्रेष्ठ रूप से कार्य कर रही कुछ पंचायतें ऐसी हैं, जहाँ महिला सरपंच हैं। इसलिए विडंबना है कि संसद् के भीतर तथा बाहर वर्षों तक बहस चलने के बाद भी संसद् और विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए कानून बनाने में राजनीतिक सर्वसम्मति का अभाव बना रहा है। जब यह क्रांतिकारी कानून वास्तविकता का रूप लेगा, वह दिन भारत के लिए गर्व एवं खुशी का दिन होगा।
महिलाओं के विरूध्द सामाजिक बुराईयों से लड़ना हालाँकि महिला सशक्तीकरण के अनेक अन्य आयाम भी हैं। उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल तथा रोजगार में आनेवाली समस्याओं को दूर करना आवश्यक है। उनके साथ घर तथा सार्वजनिक क्षेत्र में आदर एवं गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए। महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों के समाचारों से मन बहुत ज्यादा खिन्न होता है, अत: सुरक्षा के संबंध में ऐसी परिस्थिति पर विचार किया है, जिसमें हमारी माँ-बहनें बिना किसी प्रकार के भय या आशंका के कभी भी और कहीं भी आने-जाने के लिए सुरक्षित महसूस कर सकें। निश्चित रूप में सुरक्षा का मूल मानदंड जीवन जीने का अधिकार है। किसी सभ्य समाज में शिशु-हत्या या भ्रूण-हत्या तथा लड़कियों की तुलना में लड़कों को प्राथमिकता देना जैसी सांस्कृतिक बुराइयों का कोई स्थान नहीं हो सकता। हालाँकि केवल कानून और सरकारी विनियमों से ही इन सामाजिक कमियों को दूर नहीं किया जा सकता। हमें समुचित जन-शिक्षा द्वारा समर्थन प्राप्त कर सुदृढ़ एवं अनवरत सामाजिक स्तर पर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। |