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भगवान राम और बाबर की तुलना ''अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का निकट संबंध विकृत पंथनिरपेक्षतावाद से है। यह भी कहा जा सकता है कि विकृत पंथनिरपेक्षता ही अल्पसंख्यकवाद का औचित्य स्थापित करती है। इसकी व्याख्या इस प्रकार से की जा रही है तथा इसे इस प्रकार से व्यवहार में लाया जा रहा है कि भारत की संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से बनी पहचान को नकारा जा रहा है। मैंने अयोध्या आंदोलन के संदर्भ में विस्तारपूर्वक इस मुद्दे पर विचार किया है, जहाँ पंथनिरपेक्षता के नाम पर भगवान् राम और बाबर को समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया गया तथा रामजन्मभूमि से जुड़ी करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं की घोर उपेक्षा की गई। 'क्या आप सिध्द कर सकते हैं कि राम ठीक इसी स्थान पर पैदा हुए थे?' कम्युनिस्ट बुध्दिजीवियों ने अपमानजनक लहजे में पूछा, जबकि हिंदू-इतर समुदाय से संबंधित विवाद के मामले में वे ऐसा कदापि नहीं कर सकते। वर्ष 1987 में हिंदी पत्र 'वामा' में साक्षात्कार देते समय मैंने कहा था कि यदि बाबर के साथ भारतीय मुसलमानों का कोई वर्ग तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास करता है तो यह ठीक वैसे ही होगा जैसे दिल्ली के ईसाई इस आधार पर महात्मा गांधी की मूर्ति की जगह जॉर्ज पंचम की मूर्ति स्थापित करने के लिए झगड़ा करें कि जॉर्ज पंचम ईसाई था। अब गांधीजी धर्म की दृष्टि से हिंदू हो सकते हैं, लेकिन वे पूरे देश से जुड़े थे, जबकि जॉर्ज पंचम नहीं। इसी प्रकार, राम इस देश के हैं, चाहे हम उन्हें पौराणिक नायक कहें या ऐतिहासिक पात्र। यहाँ तक कि इतिहास और संस्कृति के मुद्दे पर मैं इस देश के मुस्लिम नेताओं से यह अनुरोध करना चाहूँगा कि यदि इंडोनेशिया के मुसलमान राम और 'रामायण' पर गर्व अनुभव कर सकते हैं तो भारतीय मुसलमान क्यों नहीं?''
भक्ति संगीत ''पंथनिरपेक्ष-विरोधी है''! ''मुझे अपने राजनीतिक जीवन में ऐसे अनेक अनुभव हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि पंथनिरपेक्षता के स्वयंभू रक्षकों ने किस तरह से धर्म-विरोधी व्याख्या की है। निस्संदेह, उनकी पंथनिरपेक्षता हमेशा हिंदू-विरोधी रही है। ये लोग किसी अन्य धर्म के विरुध्द कभी नहीं रहे। मैं वर्ष 1970 का उदाहरण याद दिलाता हूँ, जब राज्यसभा के सदस्य के रूप में मैं पहली बार निर्वाचित हुआ था। भारत सरकार के प्रत्येक मंत्रालय की सलाहकार समिति होती है, जिसमें दोनों सदनों के सांसद होते हैं। ये समितियाँ अपने मंत्रालय से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श करती हैं, सिफारिशें देती हैं; लेकिन कोई निर्णय नहीं लेतीं। इस समिति में नए सांसद को अपनी पसंद की समिति में कार्य करने का विकल्प दिया जाता है। प्रोफेशन से पत्रकार होने के नाते मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय चुना। इस समिति की पहली बैठक में ही मुझे विचार-विमर्श में भाग लेना पड़ा। मेरे विचार में, यह बैठक विलक्षण थी। एक कांग्रेस सदस्य ने रोज सुबह ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित किए जानेवाले 'भक्ति संगीत' पर आपत्ति उठाई, जिसमें भक्ति गीत सुनाए जाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे कार्यक्रमों से हिंदू धार्मिक परिवेश उत्पन्न होता है तथा हमारा पंथनिरपेक्ष राज्य इसकी अनुमति नहीं देता। इस सदस्य के तर्कों का समिति पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। इस फोरम में वे इस विषय को और अधिक लंबे समय तक जारी नहीं रख सके। बाद में मुझे याद आया कि कुछ समय पहले यह सांसद राष्ट्रपति भवन में शिष्टमंडल लेकर गए थे, ताकि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन को इस मुद्दे पर तर्क दिया जा सके। उनकी बातों को धैर्य से सुनने के बाद राष्ट्रपति ने टिप्पणी दी, 'देवियो और सज्जनो! मैं आपको बता दूँ कि मैं आमतौर पर सुबह के कुछ घंटे छोड़कर ऑल इंडिया रेडियो नहीं सुनता। मैं सिर्फ भक्ति संगीत कार्यक्रम सुनना ही पसंद करता हूँ।' अपने लेखों और भाषणों में डॉ. राधाकृष्णन ने दृढ़तापूर्वक इस पर जोर दिया है कि 'पंथनिरपेक्ष राज्य का सीधा-सादा अर्थ ऐसा राज्य है, जिसमें सभी धर्मों के विचारों को समान रूप से आदर किया जाता है तथा किसी प्रकार का भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाता है।' लेकिन उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि पंथनिरपेक्ष राज्य का अर्थ धर्महीन होना कदापि नहीं है। जब गांधीजी रामराज्य के बारे में विचार व्यक्त करते हैं या गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर 'एका धर्मराज्य हबले ए भारते' (भारत में धर्मराज्य हो, न्यायोचित तथा नैतिक व्यवस्था हो) प्रार्थना करते हैं, तब ये दोनों महापुरुष क्या धर्मतांत्रिक या सेक्युलर-विरोधी राज्य का समर्थन करते हैं?'' ''नारियल तोड़ने, दीप प्रज्जवलित करने का विरोध; हम एक सेक्युलर राष्ट्र है'' ^^जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने मुझे भाजपा अध्यक्ष के नाते राष्ट्रीय एकता परिषद् के सदस्य के रूप में आमंत्रित किया था। सितंबर 1986 में आयोजित बैठक में भारत में पंथनिरपेक्षवाद के अर्थ पर गहन विचार-विमर्श हुआ। मैंने अपने साथी सदस्यों से पूछा, 'यदि नए भारतीय जहाज के जलांतरण पर उसके नौतल में नारियल फोड़ा जाता है तो क्या यह पंथनिरपेक्षता के विरुध्द होगा? या फिर इस अवसर पर शैंपेन की बोतल खोली जानी चाहिए? किसी विशेष महत्त्वपूर्ण व्यक्ति (वी.आई.पी.) को किसी प्रदर्शनी की उद्धाटन कैसे करना चाहिएदीप प्रज्वलित करके या कैंची से रिबन काटकर?' अनेक सदस्यों ने मेरे इस विचार से सहमति प्रकट की कि नारियल फोड़ने या दीप प्रज्वलन में कुछ भी गलत नहीं है। तथापि, प्रख्यात सी.पी.आई. नेता सी. राजेश्वर राव ने मेरे विचारों पर झट प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, 'कोई नारियल नहीं, कोई दीप नहीं, हमारा पंथनिरपेक्ष राज्य है।' मैं इस मुद्दे पर स्वयं को रोक नहीं पाया। मार्क्सवादी विचार में धर्म जनसाधारण के लिए अफीम है। इसलिए इस विचारधारा के अनुयायी को ऐसी परंपराओं तथा रीति-रिवाजों से घृणा है, जिनका धर्म से दूर-दराज का भी संबंध हो। लेकिन मैंने अनुभव किया कि भारतीय संविधान निर्माताओं के मन-मस्तिष्क में पंथनिरपेक्षता की संकल्पना का, इस मार्क्सवादी दृष्टिकोण का कोई स्थान नहीं था। मार्क्सवादियों के दृष्टिकोण को पंथनिरपेक्षवाद नहीं, बल्कि छद्म पंथनिरपेक्षवाद ही कहा जा सकता है। मैंने इस पर बल दिया कि, यद्यपि वामपंथ में निजी जीवन से भी धर्म हटा दिया जाता है, भारतीय पंथनिरपेक्षवाद की जड़ें धर्म में हैंइस हिंदू विचार में हैं कि सभी मार्ग उस ईश्वर की ओर जाते हैं, जैसाकि वैदिक उक्ति में कहा गया है, 'एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति'। मैंने राव तथा बैठक में उपस्थित अन्य सदस्यों को याद दिलाया कि गांधीजी ने कहा था कि 'धर्म से रहित राजनीति नितांत दूषित होती है। इसका हमेशा त्याग किया जाना चाहिए।' डोनाल्ड यूजेन स्मिथ ने अपनी पुस्तक 'इंडिया: एज ए सेक्यूलर स्टेट'y में भारतीय पंथनिरपेक्षता का विशद अध्ययन किया है। इसमें पंथनिरपेक्षता के मुद्दे पर गांधीजी और नेहरू के बीच मतभेद उजागर किए हैं तथा यह उल्लेख किया गया है कि स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में ऐसे मतभेद के कारण सरकार के सम्मुख समस्याएँ उत्पन्न हुई थीं। सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी तथा डॉ. के.एम. मुंशी गांधीवादी विचारों को मानने वाले थे। इसके बारे में मैंने विस्तृत जानकारी गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनरुध्दार के बारे में उल्लेख किया है। यह देखकर सबसे ज्यादा विक्षोभ होता है कि वर्तमान नेतृत्व में नेहरू या इंदिरा गांधी काल की तुलना में इस समय कांग्रेस राष्ट्रीयतावाद के गौरवशाली प्रतीकों के प्रति अधिक असंवेदनशील हो गई है। इसका सबसे ज्यादा आघात पहुँचानेवाला उदाहरण यह है कि किस तरह से कांग्रेस पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम मतांध एवं मार्क्सवादियों द्वारा 'वंदे मातरम्' के विरुध्द चलाए गए अभियान का समर्थन किया था। उन्होंने आक्षेप लगाया कि भारत का राष्ट्रगीत सांप्रदायिकता की भावना से प्रभावित है। किसी प्राचीन राष्ट्र की संस्कृति साँझी होना स्वाभाविक है। लेकिन हमारे देश में सामान्यत: भारतीय संस्कृति के साँझा स्वरूप, पर बल देते समय अनिवार्यत: हिंदू धारणा को नकारने का प्रयास होता है। यद्यपि विदेशी डोनाल्ड यूजेन स्मिथ ने भी इस बात पर ध्यान दिया है तथा गौर किया है कि भारत की सामासिक संस्कृति होने के बावजूद हिंदू धर्म संस्कृति का सर्वाधिक सशक्त तत्त्व रहा है। जो लोग बार-बार सामासिक भारतीय संस्कृति पर बल देते हैं, वे इस बुनियादी तथ्य का न्यूनतम मूल्य ऑंकते हैं। हिंदू धर्म वस्तुत: भारतीय संस्कृति की अनिवार्य पहचान है। 'रामायण' और 'महाभारत' ग्रंथ हिंदुओं में पवित्रता तथा धार्मिक आदर-भाव जगाते हैं। लेकिन क्या ये सिर्फ हिंदुओं से संबंधित हैं? भारतीय सांस्कृतिक विरासत के अमूल्य भंडार के रूप में क्या प्रत्येक भारतीयहिंदू, मुस्लिम या ईसाईको इन पर गौरव अनुभव नहीं करना चाहिए? नारियल फोड़ना या दीप प्रज्वलन हिंदुओं का धार्मिक रीति-रिवाज या कर्मकांड हो सकता है, लेकिन समय बीतने के साथ ये विशिष्ट और गरिमामय भारतीय रीति-रिवाज बन गए हैं। वही व्यक्ति इन परंपराओं पर आपत्ति उठा सकता है, जिसे धर्म के नाम से चिढ़ है, घृणा है। भारत को ऐसा पंथनिरपेक्षवाद स्वीकार्य नहीं है, जिसमें किसी भी प्रकार के हिंदू पहचान के प्रति वैमनस्य हो। वस्तुत: हमारी राष्ट्रीय संस्कृति में पंथनिरपेक्षता की भारतीय संकल्पना इस प्रकार से अंतर्निहित है कि भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी यह नहीं सोचा था कि उन्हें विशेष रूप से प्रस्तावना में इसका उल्लेख करना चाहिए। इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई लोकतंत्र-विरोधी आपातस्थिति (1975-77) के दौरान ही पंथनिरपेक्षवाद को संशोधन के माध्यम से संविधान में जगह दी गईऔर वह भी संसद् में विचार-विमर्श किए बिना। जब विपक्षी नेता जेल में हों तथा प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई हो, तब इस विषय पर बहस भी कैसे हो सकती थी?'' हाउस ऑफ कॉमन्स में चैपलिन की प्रार्थना मैं लोकसभा अध्यक्ष रवि राय की अध्यक्षता में सांसदों के शिष्टमंडल की वर्ष 1990 में की गई लंदन यात्रा की याद दिलाना चाहता हूँ। हाउस ऑफ कॉमंस के स्पीकर ने अपने निवास पर रात्रिभोज के लिए इस शिष्टमंडल को आमंत्रित किया। हम सभी समय पर पहुँच गए। हमारे मेजबान तथा हाउस ऑफ कॉमंस के कुछ चुनिंदा सदस्य वहाँ पर पधारे थे। मेज पर हम लोगों के बैठ जाने के बाद भी भोजन परोसना आरंभ नहीं हुआ था। 'क्या किसी की प्रतीक्षा की जा रही है?' मैंने पास बैठे लेबर पार्टी के सांसद से पूछा। उनका नाम ग्रेविल जैनर था। उन्होंने कहा, 'जी हाँ, हाउस के चैपलिन को अभी आना है। उसके आने पर तथा प्रार्थना के बाद ही रात्रिभोज आरंभ होगा।' मैं दूसरी ओर बैठे अपने भारतीय साथी की ओर मुड़ा। वह वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता था। मैंने पूछा, 'यदि ऐसा ही कुछ भारत में होने लगा तो आप क्या करेंगे? वॉक आउट?' संयोगवश जब हाउस के चैपलिन पहुँचे तथा प्रार्थना करने लगे, तब जैनर ने मेरी ओर देखकर दबी जबान में कहा, 'मि. आडवाणी! आप हिंदू हैं और मैं यहूदी, आशा है कि वे हमें भी प्रार्थना में शामिल करेंगे।' इस डिनर से जैनर और मैं घनिष्ठ मित्र बन गए। वे अकसर भारत की यात्रा करते हैं तथा ऐसा कभी नहीं हुआ कि वे यहाँ आए और मुझसे मिले नहीं। मैं भी जब लंदन जाता हूँ, उनसे अवश्य मिलता हूँ। वे ब्रिटेन में तथा बाहर दोनों विभिन्न धर्मों के बीच अच्छे संबंधों को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। '' |