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लोकतंत्र की रक्षा करने में भारत के गौरवपूर्ण रिकार्ड पर आडवाणीजी के विचार |
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यह इस पृष्ठभूमि से भिन्न है कि मैं भारत की लोकतांत्रिक परम्परा और संघर्ष समाधान हेतु हमारे दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रस्तुत करना चाहता हूॅ। यह परम्परा और दृष्टिकोण मौलिक रुप से हिन्दू-दर्शन और सांस्कृतिक लोकाचारों से प्रभावित हैं। हमारी सभ्यता के प्रारंभ से ही हिन्दू-दर्शन अपने दृष्टिकोण और शिक्षाओं में बहुलतावादी रहा है। इसके फलस्वरुप, अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली में भारत अन्तर्निहित रुप से अकेला ही एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने आदर्शो एवं सिध्दांतों को दूसरे राष्ट्रों पर थोपना नहीं चाहता। इसीलिए भारत ने अपने हजारों साल के इतिहास में अपनी सेनाओं को दूसरे देश की भूमि जीतने और वहॉ के मूल निवासियों अथवा संस्कृतियों को मिटाने अथवा कुचलने के लिए कभी नहीं भेजा। बहुलवाद में विश्वास रखने और दूसरे के मत एवं विचारों का आदर करने के कारण ही भारत ने आजादी हासिल करने के बाद स्वाभाविक तौर पर लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षवाद को स्वीकार किया। हमने यह मंत्र पश्चिम देशों से हासिल नहीं किया। आप स्वयं से एक साधारण सा प्रश्न पूछिए : ऐसा क्यों है कि भारत जैसे विशाल और विभिन्नताओं वाले देश जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीब और कम पढ़ा लिखा हुआ है, में सेना का कभी-भी वर्चस्व नहीं रहा। कभी-भी हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है? भारत नियमित चुनाव कराने में कैसे सफल रहा है, जोकि हमेशा निष्पक्ष हुए और जिनके नतीजे हमेशा सभी राजनैतिक दलों ने स्वीकार किए है? हॉ आपातकाल के दौरान लोकतंत्र का कुछ हनन अवश्य हुआ था, लेकिन जनता ने आपातकाल के विरुध्द इतने आक्रोश में मतदान किया कि इन्दिरा गांधी जैसी कद्दावर नेता को भी पराजय का मुॅह देखना पड़ा था।
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