नेतृत्व
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नेतृत्व, नेतागिरी से भिन्न

'लीडरशीप' आम इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है लेकिन इसके कई अर्थ भी हैं जो संदर्भ और नेतृत्व के स्वरूप पर निर्भर करते हैं। हमारे समाज में लीडरशीप या 'नेतृत्व' को विशेषकर आधुनिक समाज में आमतौर पर 'राजनीतिक नेतृत्व' के रुप में समझा जाता है। इसलिए नेता को प्राय: एक राजनीतिक नेता समझा जाता है।

नेतागिरी आज के भारत की वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया में एक व्यापक प्रचलित शब्द है। हालांकि यह नेतृत्व से बिल्कुल अलग है। नेतृत्व अपने समर्थकों का एक समूह जुटाकर किसी कठिन कार्य को पूरा करने हेतु अपनी दूरदृष्टि, पक्के इरादे और योग्यता के सकारात्मक गुणाेंं के सम्मिश्रण का आभास देता है।

इसके विपरीत, जनता के मन में नेताओं के बारे में धारणा बहुत सकारात्मक नहीं है। साथ ही, भारत में राजनीतिक नेताओं को निजी तौर पर जो बहुत अधिक सम्मान और महत्व मिलता है, वह वास्तविकता से ज्यादा होता है। राजनीतिक नेताओं को गैर-अनुपातिक तौर पर मिलने वाला यह सम्मान और महत्व वस्तुत: राष्ट्रीय जीवन के अन्य क्षेत्रों के नेताओं के लिए अपेक्षित सम्मान की कीमत पर मिलता है।

नेतृत्व एक आम अवधारणा है जो राजनीति तक ही सीमित नहीं है बल्कि नेतृत्व की आवश्यकता व्यावहारिक तौर पर सामाजिक प्रगति, राष्ट्र-निर्माण, मानव जाति के कल्याण हेतु मानवीय प्रयासों के प्रत्येक क्षेत्र में होती है।

भारत को प्रत्येक क्षेत्र में अच्छे नेताओं-अच्छे अनुयायियों की जरुरत

आज भारत को शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, संस्कृति एवं कला, मीडिया, कूटनीति, अनुसंधान संस्थाओं, स्वैच्छिक संगठनों और धार्मिक तथा गैर-धार्मिक क्षेत्रों में भी अच्छे नेताओं की जरुरत है। इन क्षेत्रों में अच्छे नेतृत्व की जरुरत पड़ती है उन क्षेत्रों में भी जहां इसकी आवश्यकता बहुत कम महसूस की जाती है अथवा जहां इसकी मौजूदगी बहुत ही कम देखी जाती है। मैं परिवार क्षेत्र का जिक्र कर रहा हूं। हमारी महिलाएं औपचारिक तौर पर ज्यादा शिक्षित नहीं होती हैं, उनमें से कुछ महिलाएं अनपढ़ भी होती हैं, लेकिन जिस बेहतर ढंग से वे अपने परिवार के कार्यों को संभालती हैं और अपने परिवारों को नेतृत्व प्रदान करती हैं, वास्तव में, वह भूमिका सराहनीय होती है।

इसी प्रकार, ऐसे भी लोग हैं जो अपने आस-पड़ोस में, आवास कल्याण एसोसिएशन या किसी स्कूल के अभिभावक-अध्यापक एसोसिएशन में अथवा ऐसे किसी संगठन में सक्रिय होते हैं जो वरिष्ठ नागरिकों, अथवा महिलाओं तथा विपदाग्रस्त बच्चों के कल्याण के लिए कार्य कर रहे हैं। उममें से बहुत से लोग नेतृत्व वाली जिम्मेदारियां संभालते हैं, वे स्वयंसेवक जुटाते हैं, वे संसाधन जुटाते हैं, वे अन्याय के खिलाफ आन्दोलन करते हैं और दूसरे लोगों को नि:स्वार्थ सेवाएं प्रदान करने हेतु प्रेरित करते हैं। उनमें से अनेक लोगों की बातें मीडिया द्वारा नहीं सुनी जाती हैं और उन्हें किसी सरकारी या गैर-सरकारी संगठन द्वारा सम्मानित भी नहीं किया है, फिर भी, वे कर्मयोगियों की तरह ''कर्म ही उनका पुरस्कार है'' की भावना से अपने मिशन में जुटे रहते हैं।

यह इस तरह का नेतृत्व है जो किसी संगठन की रीढ़ होता है और किसी अच्छे सामाजिक कार्य की अत्यंत विश्वसनीय नींव होता है।

अच्छे नेता के गुण

अच्छे नेता किस तरह से बनाये जाते हैं? आजकल, नेतृत्व संगठन निर्माण और नेतृत्व विकास-अध्ययन, अनुसंधान तथा प्रशिक्षण का गंभीर विषय बन गया है। इसे प्रबंध संस्थानों तथा गोष्ठियों और कार्यशालाओं में पढ़ाया जाता है जिन्हें व्यावसायिक कार्यकारी अधिकारियों और व्यावसायिकों की विशिष्ठ श्रेणियाें के लिए आयोजित किया जाता है।

मेरा मानना है कि अच्छे नेता पैदा नहीं होते हैं बल्कि बनाए जाते हैं। वे निश्चित रुप से केवल इसलिए नेता होने के पात्र नहीं बन जाते कि उन्होंने किसी परिवार विशेष में जन्म लिया है। लोकतंत्र में, सभी व्यक्ति समान अधिकारों के साथ नेतृत्व प्रदान करने हेतु पैदा होते हैं बशर्ते कि उनमें नेतृत्व की जिम्मेदारी उठाने के गुण व योग्यता हो तथा जनता का समर्थन हासिल हो। परिवार विशेष द्वारा नेतृत्व की अवधारणा जिसे हम दुर्भाग्यवश, अपने देश में कुछ राजनीतिक पार्टियों में देख रहे हैं, लोकतांत्रिक आदर्श और आधुनिक काल की भावना, दोनों के लिए गंभीर रुप से घातक है।

यदि अच्छे नेता बनाए जाते हैं और पैदा नहीं होते तो इसका अभिप्राय यह है कि अच्छे नेताओं में राजनीति अथवा समाज के दूसरे क्षेत्रों के मूलभूत गुण होने आवश्यक हैं। केवल ऐसे कुछ लोग जिन्होंने जीवन के हर पहलू का अनुभव किया हो, अपने व्यवसायों की कठिनाइयों और धक्कम-धक्का को सहा हो; बड़े धैर्य के साथ जीवन के उतार-चढ़ाव का सामना किया हो; महत्वपूर्ण मोड़ों पर जीवन को निर्धारित करने वाले निर्णय लिए हों, साथ ही, नागरिकों की दु:ख-तकलीफों को महसूस किया हो; जरुरत पड़ने पर बलिदान दिए हों; अपने चुने क्षेत्रों की समस्याओं का अच्छा अध्ययन किया हो; और संगठनों के समक्ष आई चुनौतियों का प्रभावी ढंग से मुकाबले करने हेतु अपनी क्षमता और योग्यता का प्रदर्शन किया हो; किसी बड़े लक्ष्य के प्रति स्वयं उपयोगी बनना सीखा हो; दूसरे लोगों को न केवल उनके शब्दों में बल्कि उनके आचरण सहित प्रेरित करने की योग्यता विकसित की हो; और अपने मुख्य सिध्दांतों और धारणाओं के प्रति ईमानदार रहा हो- ही समाज में सच्चे नेताओं के रुप में उभरते हैं।

सच्चा नेतृत्व हासिल किया जाता है, न कि उस पर अधिकार जमाया जाता है

इससे स्पष्ट हो जाता है कि सही नेतृत्व अर्जित किया जाता है न कि उस पर अधिकार जमाया जाता है अथवा मांगा जाता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जो यह दर्शाता है कि जिन महान नेताओं ने न केवल जीवन में बल्कि अपने पूरे जीवन काल में जनता का सम्मान हासिल किया, वे अपनी निभाई गई नेतृत्व की भूमिका के बारे में कम संकोची थे। विनम्रता; छोटे तथा बड़े सभी लोगों के लिए समान आदर; कार्य की  पहल करने के लिए  (और उसमें गलतियां करने के लिए भी) अनुयायियों को प्रोत्साहन देना; सफलता का श्रेय दूसरों को देना; और किसी अन्य व्यक्ति की असफलता का दोष अपने ऊपर लेना-से सभी बातें हमेशा अच्छे नेताओं की विशेषताएं रही हैं।

स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रेरणादायी विरासत

यदि हम अपने देश के इतिहास में पीछे झांक कर देखें तो हम पायेंगे की कई उतरोत्तर पीढ़ियों के अनेक नेताओं जिनका स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान प्रादुर्भाव हुआ था, में ये गुण कूट-कूट कर भरे हुए थे। लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, पं0 जवाहर लाल नेहरु, सरदार पटेल, भगत सिंह और वीर सावरकर जैसे क्रान्तिकारी लोग और वे लोग जिन्होंने राजनीतिक संघर्ष में प्रत्यक्ष रुप से हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन राष्ट्रवादी चेतना जागृत करने में जबरदस्त प्रभाव डाला, जैसे स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्दो जैसे आज के युग के संत-इनमें से हर एक व्यक्ति अपने आप में एक अनुकरणीय नेता था।

ये महान नाम ऐसे हैं जिन्हें व्यापक रुप में पहचाना जाता है और ये स्वतंत्रता आन्दोलन के नेतृत्व के सम्मानित प्रतिनिधि हैं। लेकिन हम निकट से देखें तो हम पायेंगे कि ऐसे लाखों कम ज्ञात व्यक्ति भी थे जिन्होंने शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करके, राष्ट्रवादी समाचार पत्रों की नींव रखकर, समाज सुधार आन्दोलन चलाकर, और स्वदेशी उद्योगों की नींव डालकर उन दिनों में नेतृत्व की भूमिका निभाई।

आदर्शवाद का क्षरण

जो बात मुझे आहत करती है वह है-वर्ष 1947 के बाद की अवधि में देश की राजनीतिक संस्कृति में उतरोत्तर गिरावट आती गई है। सत्ता की ललक, व्यक्तिगत लाभों के लिए सत्ता का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, संस्थाओं को दुर्बल बनाना, राजनीतिक दलों में गुटबंदी तथा अनुशासनहीनता, जनता के हितों तथा कल्याण की अनदेखी-इन्होंने उन उच्च आदर्शों जो कभी लोगों को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करते थे, को पूरी तरह नहीं तो काफी हद तक बदलकर रख दिया है।

जब कभी राजनीतिक नेतृत्व में आदर्शवाद का क्षरण होने लगता है तो इसका जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी तेजी से विपरीत असर पड़ने लगता है। यही बात हम आज भारत के अन्दर देख रहे हैं।

हमारे समक्ष कार्य राष्ट्रवादी भावना वाले नेता विकसित करना

लेकिन मैं एक ऐसी तस्वीर पेश करना नहीं चाहता, जो केवल धुंधली, रुखी और निराशजनक हो क्योंकि यह वास्तविकता से दूर है। व्यावहारिक तौर पर, प्रत्येक क्षेत्र में-वास्तव में राजनीति की अपेक्षा अधिकतर अन्य क्षेत्रों में-हम ऐसे व्यक्तियों को देखते हैं जो उत्कृष्ट नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं। उनके बिना भारत उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर सकता थ-जैसा हम आज अनेक क्षेत्रों में देख रहे हैं।

जहां कहीं वे हैं, उनकी पहचान करना तथा उनकी मदद करना हमारा कर्तव्य है, हमें युवाओं जिनका प्रतिशत, भारत की जनसंख्या में बहुत ज्यादा है में से नेताओं की एक नई पीढ़ी तैयार करना और उनका विकास करना भी हमारा कर्तव्य है। नेताओं की नई पीढ़ी भी अधिक व्यापक होनी चाहिए जो हमारे विविध समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व करें। वस्तुत: इससे हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा और समाज में अधिक से अधिक सद्भाव को बढ़ावा मिलेगा।

और हरेक क्षेत्र के हमारे नेताओं को उनके समक्ष बड़े कार्य निर्धारित करने होंगे। वे दिन बीत गये हैं जब हम छोटी-छोटी सफलताओं पर खुश हुआ करते थे। विश्व तेजी से आगे बढ़ रहा है यह एक विस्मयकारी परिवर्तन का युग है। भारत में परिवर्तन और विकास की इस गति को पकड़ने और इससे अपने सभी करोड़ों देशवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाने की इसमें क्षमता है। इस क्षमता में से कुछ को पहले ही साकार किया जा रहा है और पूरा विश्व देख रहा है कि भारत यह सब करने में सक्षम है। लेकिन हमें बहुत तेजी से आगे बढ़ना होगा और हमें पहले की अपेक्षा बेहतर कर दिखाने की जरुरत है। इसके लिए जैसा कि मैंने पहले कहा है, हमें हरेक स्तर पर अच्छे नेतृत्व और अच्छी सहभागिता की जरुरत है।

मैंने नेतृत्व के गुण जिनकी इस समय भारत को जरुरत है, के बारे में अपना मूल्यांकन संक्षिप्त रखा है। हमें यह सुनिश्चित करना है कि हमारा देश उस प्रशंसा के शिखर पर पहुंचे जिसके लिए यह वस्तुत: पात्र है। मैं कहूंगा कि एक नेता में तीन सबसे महत्वपूर्ण गुण होने चाहिए : पहला, देशभक्ति, दूसरा, सदाचरण और सबसे ज्यादा, अपने किसी मिशन के प्रति प्रतिबद्वता जिसके लिए वह उसके 'अपने किसी भी निज स्वार्थ से सर्वथा ऊपर हो'

 

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