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धर्मं आधारित आरक्षण
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     ''मैं सांप्रदायिक आरक्षण के प्रति कांग्रेस पार्टी की सहमति को छद्म पंथनिरपेक्ष मनोवृत्ति तथा अल्पसंख्यकवाद की राजनीति में अंतर्निहित समझौतों और दबावों के प्रति पूर्ण समर्पण का परिणाम समझता हूँ। इससे यह दिखाई देता है कि राष्ट्र के दीर्घकालिक हित का त्याग करने, यहाँ तक कि अल्पसंख्यक वोट बैंक पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय आंदोलन के समय दर्शाई गई अपनी वचनबध्दता को भी छोड़ने की इच्छुक है।''

     '' इस माँग के बढ़ते रहने का खतरा है कि हिंदू समाज में अधिकाधिक वर्ग स्वयं को 'अल्पसंख्यक' कहलाना चाहेंगे; क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय में रहने का मतलब होगा भेदभाव तथा कठिनाइयाँ झेलना। इस असाधारण स्थिति जिसमें वृहत्त हिंदू समाज के अनेक भाग 'बहुसंख्यक' का हिस्सा होने को बोझ समझें, जबकि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों को प्राप्त अधिकारों की संवैधानिक योजना से खुद को वंचित अनुभव करेंयह हमारे संविधान निर्माताओं की सोच के उलट विकृति है। मैं आचार्य महाप्रज्ञ, जिन्हें मैं विश्व के महानतम जीवित संतों में एक मानता हूँ, से कई बार मिल चुका हूँ। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे जैनों को अल्पसंख्यक घोषित करने के विरुध्द हैं। ऐसा करके यह वर्ग वृहत्त हिंदू परिवार से अलग हो जाएगा।''

     ''मुझे आशंका है कि आनेवाले वर्षों में किसी-न-किसी रूप में सांप्रदायिक आरक्षण की माँग  को लेकर पुन: आवाज उठाई जाएगी। ऐसे भी संगठन हैं, जो जब-तब संसद् तथा राज्य विधायिकाओं में समानुपाती आरक्षण की माँग करते रहते हैं। सभी राष्ट्रवादियों और विशुध्द रूप में पंथनिरपेक्ष विचारधारा के लोगों का कर्तव्य है कि यदि कारगर ढंग से सामना नहीं कर सकते तथा इस माँग को शांत नहीं कर सकते या रोक सकते तो वे ऐसे विचारों से सतर्क रहें। इनसे भविष्य में भारत की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है।''

''मैं सांप्रदायिक आरक्षण के प्रति कांग्रेस पार्टी की सहमति को छद्म पंथनिरपेक्ष मनोवृत्ति तथा अल्पसंख्यकवाद की राजनीति में अंतर्निहित समझौतों और दबावों के प्रति पूर्ण समर्पण का परिणाम समझता हूँ। इससे यह दिखाई देता है कि राष्ट्र के दीर्घकालिक हित का त्याग करने, यहाँ तक कि अल्पसंख्यक वोट बैंक पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय आंदोलन के समय दर्शाई गई अपनी वचनबध्दता को भी छोड़ने की इच्छुक है।''

     '' इस माँग के बढ़ते रहने का खतरा है कि हिंदू समाज में अधिकाधिक वर्ग स्वयं को 'अल्पसंख्यक' कहलाना चाहेंगे; क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय में रहने का मतलब होगा भेदभाव तथा कठिनाइयाँ झेलना। इस असाधारण स्थिति जिसमें वृहत्त हिंदू समाज के अनेक भाग 'बहुसंख्यक' का हिस्सा होने को बोझ समझें, जबकि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों को प्राप्त अधिकारों की संवैधानिक योजना से खुद को वंचित अनुभव करेंयह हमारे संविधान निर्माताओं की सोच के उलट विकृति है। मैं आचार्य महाप्रज्ञ, जिन्हें मैं विश्व के महानतम जीवित संतों में एक मानता हूँ, से कई बार मिल चुका हूँ। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे जैनों को अल्पसंख्यक घोषित करने के विरुध्द हैं। ऐसा करके यह वर्ग वृहत्त हिंदू परिवार से अलग हो जाएगा।''

     ''मुझे आशंका है कि आनेवाले वर्षों में किसी-न-किसी रूप में सांप्रदायिक आरक्षण की माँग  को लेकर पुन: आवाज उठाई जाएगी। ऐसे भी संगठन हैं, जो जब-तब संसद् तथा राज्य विधायिकाओं में समानुपाती आरक्षण की माँग करते रहते हैं। सभी राष्ट्रवादियों और विशुध्द रूप में पंथनिरपेक्ष विचारधारा के लोगों का कर्तव्य है कि यदि कारगर ढंग से सामना नहीं कर सकते तथा इस माँग को शांत नहीं कर सकते या रोक सकते तो वे ऐसे विचारों से सतर्क रहें। इनसे भविष्य में भारत की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है।''

(इस मुद्दे से संबन्धित पूरा उध्दरण श्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्म-कथा से पढ़े)

क्यों मैं सांप्रदायिक आरक्षण के विरोध में हूँ?

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मजहब आधारित आरक्षण का मुद्दा प्रमुखता से उभरा। यह मुद्दा फूट डालनेवाला था। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के 'कम्युनल अवार्ड', 1935 का विरोध किया था, जिसके अंतर्गत कुछ धार्मिक वर्गों के लिए विधायिका में सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया था। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जब स्वतंत्रता आंदोलन के कद्दावर नेता भारत के नए गणराज्य संविधान का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त थे तब शीघ्र ही यह मुद्दा फिर जोर पकड़ने लगा, तब अंतत: यह मामला निश्चयात्मक रूप से सुलझ गया: सांप्रदायिक आरक्षण के बारे में दृढ़तापूर्वक 'न' कहा गया। पं. जवाहरलाल नेहरू ने चेतावनी दी थी'यह तरीका मूर्खतापूर्ण ही नहीं बल्कि इसमें तबाही छिपी है।'

इसलिए जब पं. नेहरू की दौहित्रवधू सोनिया गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने सांप्रदायिक आरक्षण की माँग की तथा इसका समर्थन किया, तब मुझे गहरी निराशा हुई। 11 जुलाई, 2004 को आंध्र प्रदेश की नव-निर्वाचित कांग्रेस सरकार ने सरकारी नौकरियों तथा शैक्षिक संस्थाओं में मुसलमानों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण के निर्णय की घोषणा की। मैं स्वीकार करता हूँ कि यद्यपि अल्पसंख्यक वोट बैंक पर कब्जा बनाए रखने के लिए तुष्टीकरण की कांग्रेसी नीतियों का मैं आदी हो चुका हूँ, फिर भी कांग्रेस के इस निर्णय से मैं घबरा गया। सबसे पहले मेरे मस्तिष्क में यह प्रश्न उठाक्या यह वही कांग्रेस पार्टी है, जिसका कभी महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू ने नेतृत्व किया था? क्या कांग्रेस जो कुछ कर रही है, उसके निहितार्थों व परिणामों को जानती है? क्या प्रमुख रूप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी यह पार्टी सैध्दांतिक दृष्टि से नितांत 'शून्य' हो गई है तथा राजनीतिक दृष्टि से इतनी पथभ्रष्ट हो गई है कि अपने संकीर्ण एवं क्षणिक राजनीतिक स्वार्थों की खातिर राष्ट्र की एकता व अखंडता को गिरवी रखना चाहती है?

  भाजपा से इतर जिन कुछ नेताओं ने आंध्र प्रदेश सरकार के इस निर्णय का विरोध किया इनमें तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जयललिता भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, 'इस देश में मुस्लिम ही अल्पसंख्यक नहीं हैं। ईसाई तथा अन्य अल्पसंख्यक भी हैं। यदि वे भी मजहब आधारित आरक्षण की माँग करते हैं तो हम कहाँ जाएँगे?' यह चिंता निर्मूल नहीं है। बाद में कुछ आवाजें और उठीं, मुख्यधारा की नहीं बल्कि हाशिए पर से जैन समुदाय को भी 'अल्पसंख्यक' का दर्जा देने की माँग उठी। जब कांग्रेस तथा कुछ अन्य पार्टियों ने अल्पसंख्यकों के लिए मजहब आधारित आरक्षण की घोषणा की, तब कुछ जैन भी सोचने लगे कि 'अल्पसंख्यक' कार्ड से वे भी लाभ उठा सकते हैं।

यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो इस माँग के बढ़ते रहने का खतरा है कि हिंदू समाज में अधिकाधिक वर्ग स्वयं को 'अल्पसंख्यक' कहलाना चाहेंगे; क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय में रहने का मतलब होगा भेदभाव तथा कठिनाइयाँ झेलना।

 इस असाधारण स्थिति जिसमें वृहत्त हिंदू समाज के अनेक भाग 'बहुसंख्यक' का हिस्सा होने को बोझ समझें, जबकि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों को प्राप्त अधिकारों की संवैधानिक योजना से खुद को वंचित अनुभव करेंयह हमारे संविधान निर्माताओं की सोच के उलट विकृति है। मैं आचार्य महाप्रज्ञ, जिन्हें मैं विश्व के महानतम जीवित संतों में एक मानता हूँ, से कई बार मिल चुका हूँ। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे जैनों को अल्पसंख्यक घोषित करने के विरुध्द हैं। ऐसा करके यह वर्ग वृहत्त हिंदू परिवार से अलग हो जाएगा।

वर्ष 2005 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार एक कदम और आगे बढ़ गई। इसने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में 'भारत के मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति' का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की। इस समिति ने अभूतपूर्व, अविचारणीय तथा पूर्णत: गलत प्रस्ताव रखासशस्त्र सेनाओं में मुसलमानों की गणना। इस प्रकार, यह सरकार राष्ट्र की रक्षा करनेवाले प्रहरियों के पंथनिरपेक्ष तथा निष्पक्ष आचरण पर भी कीचड़ उछालने लगी। भारत में जनमे अमेरिकी नागरिक उमर खालिदी की पुस्तक 'खाकी ऐंड एथनिक वॉयलेंस इन इंडिया' से थलसेना, नौसना एवं वायुसेना में मुसलमानों की गणना की 'प्रेरणा' मिली थी। इस पुस्तक के शीर्षक से ही पता चल जाता है कि इस लेखक ने सशस्त्र सेनाओं, बलों और राज्य पुलिस पर उँगली उठाई है। विदेशों में नियमित रूप से प्रचार किया जाता रहा है कि इन 'खाकीधारियों' द्वारा भारत का मुस्लिम वर्ग योजनाबध्द हिंसा का निशाना बनाया जाता है।

सैन्य बलों के प्रमुखों ही नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रों से इसका पुरजोर विरोध करते हुए सरकार को बाध्य किया गया कि इस गलत और निंदनीय विचार को छोड़ दे। इसी प्रकार से, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने जन हित मामले में मजहब आधारित आरक्षण पर सरकारी आदेश को अस्वीकार कर दिया। तब भी अल्पसंख्यकवादी मनोवृत्ति कांग्रेस पार्टी के शीर्ष स्तर पर तथा सरकार में बहुत ज्यादा सक्रिय है। यह उस समय और भी स्पष्ट हो गई जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 9 दिसंबर, 2006 को राष्ट्रीय विकास परिषद् में अपने भाषण में यह घोषणा की कि मुसलमानों का देश के संसाधनों पर सबसे पहला दावा होना चाहिए।

मुझे आशंका है कि आनेवाले वर्षों में किसी-न-किसी रूप में सांप्रदायिक आरक्षण की माँग  को लेकर पुन: आवाज उठाई जाएगी। ऐसे भी संगठन हैं, जो जब-तब संसद् तथा राज्य विधायिकाओं में समानुपाती आरक्षण की माँग करते रहते हैं। सभी राष्ट्रवादियों और विशुध्द रूप में पंथनिरपेक्ष विचारधारा के लोगों का कर्तव्य है कि यदि कारगर ढंग से सामना नहीं कर सकते तथा इस माँग को शांत नहीं कर सकते या रोक सकते तो वे ऐसे विचारों से सतर्क रहें। इनसे भविष्य में भारत की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है। इसी कारणवश, मैं सोचता हूँ कि इस विषय पर संविधान सभा में हुई अत्यधिक शिक्षाप्रद बहस की याद दिलाना मेरा कर्तव्य है कि किस तरह से और क्यों सांप्रदायिक आरक्षण को अस्वीकार किया गया था।

अगस्त 1947 में संविधान सभा के प्रारंभिक विचार-विमर्श में अल्पसंख्यक रक्षोपायों का इतना प्रभुत्व था कि इस सभा को संख्या के आधार पर केंद्रीय एवं प्रांतीय विधायिकाओं में मुसलमानों, ईसाइयों एवं सिखों के लिए सीटों के आरक्षण पर विचार करना पड़ा; लेकिन बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में संविधान सभा की 'मूल अधिकार तथा अल्पसंख्यक एवं जनजाति और छोडे ग़ए क्षेत्रों पर सलाहकार समिति' ने इस प्रस्ताव पर भली प्रकार से विचार किया। स्वतंत्रता आंदोलन के महान् नेता इस समिति के सदस्य थे। इनमें डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. के.एम. मुंशी, पुरुषोत्तमदास टंडन, पं. गोविंद बल्लभ पंत तथा गोपीनाथ बोरदोलोई के नाम शामिल थे। इस समिति की बैठक में पं. नेहरू को विशेष अतिथि के रूप में बुलाया गया था। इस समिति ने अंतत: यह विचार अभिव्यक्त किया कि 'यह समिति इससे संतुष्ट है कि अल्पसंख्यक स्वयं अनुभव करते हैं कि समग्र देश के हित में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सीटों का सांविधिक आरक्षण हटाया जाना चाहिए।

27 फरवरी, 1947 को संविधान सभा में इस समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय सरदार पटेल ने कहा था

   'हाल ही में आपने इस प्रश्न के संबंध में ब्रिटिश संसद् में आयोजित बहस सुनी होगी। ब्रिटिश सरकार की ओर से यह दावा किया गया था कि अल्पसंख्यकों की रक्षा इनकी विशेष जिम्मेदारी हैविशेष बाध्यता है। उनका दावा है कि हमसे ज्यादा वे इस बारे में रुचि लेते हैं। हमें यह सिध्द करना है कि उनका दावा खोखला है। भारत में अल्पसंख्यकों की रक्षा में हमसे ज्यादा कोई अन्य रुचि ले ही नहीं सकता। हमारा मिशन प्रत्येक हित की पूर्ति तथा समग्र राष्ट्रहित की रूपरेखा के भीतर सभी अल्पसंख्यकों के हितों के संतोषजनक रक्षोपाय बरतना है। आगे चलकर हमारा हित इसी में है कि हम यह भूल जाएँ कि इस देश में अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक जैसी कोई विचारधारा है तथा स्वीकार करें कि भारत में हम सबका केवल एक ही समुदाय है।'

 

'फ्रेमिंग ऑफ दि इंडियन कांस्टीटयूशन' नामक पाँच खंडों में लिखित अपने विशाल अध्ययन ग्रंथ में बी. शिव राव ने लिखा है'सलाहकार समिति के इन प्रस्तावों पर विस्तृत एवं दीर्घ विचार-विमर्श हुआ। अधिकांश वक्ताओं ने सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण खत्म करने के प्रस्ताव का समर्थन किया। इनमें मुस्लिम, ईसाई, आंग्ल भारतीय, अनुसूचित जाति तथा हिंदू सभी शामिल थे। जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को 'नियति का ऐतिहासिक मोड़' कहा। नेहरू ने जोड़ा, 'ऐसी स्थिति में इस प्रकार के रक्षोपाय का महत्त्व है जहाँ पर निरंकुश या विदेशी शासन हो। इस प्रकार से राजतंत्र को एक समुदाय को अन्य समुदाय के विरुध्द लड़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन पूर्ण लोकतंत्र में यदि आप अल्पसंख्यक के लिए रक्षोपायों की व्यवस्था करते हैं, जो अपेक्षाकृत लघु अल्पसंख्यक वर्ग है, तो आप इस वर्ग को मुख्यधारा से अलग कर देते हैं। हो सकता है, आप किसी हद तक उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हों, लेकिन किस कीमत पर? उन्हें अलग करके तथा मुख्यधारा से अलग रखकरमैं राजनीतिक आधार की बात कर रहा हूँतथा बहुसंख्यक वर्ग की आंतरिक सहानुभूति और सबके साथ मिलकर चलने का अधिकार खोने की कीमत पर।'

इस संविधान सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण के प्रस्ताव का ही सर्वसम्मति से समर्थन किया गया था। तदनुसार, संविधान के अनुच्छेद 341 में इस संबंध में ध्यान रखा गया। इस पर ध्यान देना उचित होगा कि इस प्रस्ताव के कार्यान्वयन में कांग्रेस सरकार ने विशिष्ट रूप से हिंदू अनुसूचित जातियों तथा सिखों में चार अनुसूचित जातियों (कबीरपंथी, रामदासी, सिकलीगर तथा मजहबी) को लाभभोगी के रूप में सुनिश्चित किया था। नेहरू सरकार ने मुसलमानों और ईसाइयों को शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति के आरक्षण के क्षेत्राधिकार से बाहर रखा था। संविधान के अनुच्छेद 341 में संशोधन करके राष्ट्रपति के आदेश से इस संबंध में संशोधन किया गया। इसके अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वह अनुसूचित जाति के रूप में किसी विशिष्ट जाति को अधिसूचित कर सकता है। संशोधित कानून के अनुसार, केवल वही दलित, जो हिंदू हैं, अनुसूचित जाति के सदस्य माने जाएँगे तथा इस प्रकार से आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के पात्र होंगे। वर्ष 1956 में इसमें सिख धर्म माननेवाली तमाम अनुसूचित जातियों को भी शामिल किया गया। वर्ष 1990 में बौध्द धर्म अपनानेवाले दलितों (नवबौध्द मतानुयायी) को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया गया।

लंबे समय तक तथाकथित 'दलित ईसाई' वर्ग एवं 'दलित मुसलमानों' के लिए आरक्षण की माँग की जाती रही है। तथापि परवर्ती सरकारों ने इन माँगों पर ध्यान नहीं दिया। क्यों? इसका कारण यह था कि भारतीय संविधान निर्माता इस बारे में स्पष्ट थे कि हिंदू समाज का प्रमुख लक्षण जाति है। यदि कुछ निम्न जाति के हिंदुओं ने अतीत में इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाया तो इसका कारण यह दावा रहा तथा इन धर्मों का वायदा रहा कि उनके यहाँ जाति का कोई स्थान नहीं है, इसलिए धर्मांतरित बनाम मूल मुसलमानों तथा ईसाइयों का बराबर स्थान है। यहाँ यह कहना भी उचित होगा कि पं. नेहरू के शासन में गृह मंत्रालय द्वारा यह महत्त्वपूर्ण परिपत्र (भारत सरकारसं. 18458-एस सी टी IV तारीख 23 जुलाई, 1959) जारी किया गया था।

विषय :  ईसाई बने अनुसूचित जातियों के पुन: हिंदू धर्म में मतांतरण पर उनका दर्जा।

        'भारत सरकार को हाल ही में इस प्रश्न पर विचार करने का मौका मिला है कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति मतातरण करके हिंदू धर्म का त्याग कर देता है तथा पुन: हिंदू धर्म स्वीकार कर लेता है तो उसे मूल अनुसूचित जाति का सदस्य माना जाएगा या नहीं। ध्यानपूर्वक विचार-विमर्श करने के लिए भारत सरकार को यह सलाह दी गई कि ऐसे व्यक्ति के पुनमतातरण को मूल जाति में परिवर्तन माना जाएगा तथा वह अनुसूचित जातियों के सदस्यों के विशेषाधिकार और सहायता का पात्र होगा, मूलत: जिस अनुसूचित जाति से संबंधित था। सूचना एवं मार्गदर्शन के लिए यह निर्णय राज्य सरकारोंसंघ-शासित सरकारों की जानकारी में लाया जाता है।'

 

इस परिपत्र में जाति संबंधी मुद्दे पर नेहरू सरकार की स्पष्ट विचारधारा को नितांत हिंदू सामाजिक श्रेणी के रूप में स्वीकार किया गया है। अन्य शब्दों में, नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव तक केंद्र में कांग्रेस सरकार तथाकथित 'दलित मुसलमानों' एवं 'दलित ईसाइयों' को आरक्षण के लाभ पहुँचाने के पक्ष में नहीं रही, इसलिए उन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं लिया जा सका है।

यह तथ्य विचारणीय है कि धार्मिक आधार पर अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण का लाभ उठाने के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं है। अनुसूचित जनजाति विनिर्दिष्ट करने के लिए धर्म कोई मानदंड नहीं है। यदि अनुसूचित जनजाति के लोग इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाते हैं तो उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलता रहेगा। इससे पुन: स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माताओं द्वारा जाति को हिंदू समाज के संबंध में श्रेणी विशिष्ट के रूप में मानने के क्या कारण थे।

कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व भारत के इतिहास को न तो जानता है, न ही इसकी परवाह करता है। फिर भी, कोई भी यह अपेक्षा करता है कि नेताओं को कम-से-कम अपना पार्टी के इतिहास की जानकारी अवश्य होनी चाहिए तथा आरक्षण के मुद्दे पर इसी के अनुरूप सोचना चाहिए। अन्य शब्दों में, कांग्रेस पार्टी के आज के नेताओं को पं. जवाहरलाल नेहरू तथा राजीव गांधी के विचारों को याद करना चाहिए। 27 जून, 1961 को सभी मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरूजी ने कहा था

 

   'मैंने कार्यदक्षता तथा पुरानी परंपराओं से उभरने के बारे में लिखा है। इसके लिए आवश्यक है कि आरक्षण की पुरानी आदत तथा किसी जाति या समूह को दिए जा रहे विशेषाधिकार का त्याग किया जाए। मैं किसी भी प्रकार का आरक्षण, खासतौर पर सेवाओं में आरक्षण, पसंद नहीं करता। मैं दृढ़तापूर्वक ऐसी किसी भी बात के संबंध में तुरंत प्रतिक्रिया करता हूँ, विरोध करता हूँ, जिसके कारण व्यवस्था में अक्षमता तथा घटिया स्तर जैसे दुर्गुण आएँ। यदि हम सांप्रदायिक तथा जाति के आधार पर आरक्षण का समर्थन करते हैं तो प्रतिभावान् एवं योग्य लोग गर्त में चले जाएँगे, दलदल में धँस जाएँगे तथा हमारा देश द्वितीय अथवा तृतीय श्रेणी का होकर रह जाएगा। मैं चाहता हूँ कि मेरा देश हर दृष्टि से अव्वल हो। जिस क्षण हमने दूसरे दर्जे को प्रोत्साहन देना शुरू किया, हमें अपनी हार को स्वीकार करना पड़ेगा। मुझे यह जानकर दु:ख पहुँचा है कि किस तरह सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण का कारोबार चल रहा है। यह मार्ग मूर्खता या गलतियों से ही भरा नहीं है, बल्कि यह तबाही की ओर ले जाता है।'

 

नेहरू के विचारों को मैंने उसकी संपूर्णता में समर्थन देने के लिए उध्दृत नहीं किया है, बल्कि वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व का ध्यान आकर्षित करने के लिए किया है। भाजपा मानती है कि आरक्षण कि वास्तव में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्गों के लिए आवश्यक है, मदद की जरूरत है, ताकि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिल सके। मैं यहाँ बताना चाहता हूँ कि इस बिंदु के दो पक्ष हैं, नेहरूजी सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए एकमात्र माध्यम के रूप में आरक्षण की सीमाओं से अवगत थे। दूसरा पक्ष हमारे वर्तमान संदर्भ से अधिक जुड़ा है, वे पूर्णरूपेण सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण के विरुध्द थे।

मैंने इससे पहले अध्याय में उल्लेख किया है कि राजीव गांधी को उस समय आरक्षण के बारे में बोलना पड़ा था, जब पक्षपातपूर्ण राजनीति तथा चुनावी लाभ की दृष्टि से आरक्षण पर विचार किया जा रहा था। मंडल आयोग की सिफारिशों पर हुई बहस में सितंबर 1990 के लंबे-चौड़े भाषणों में इस विपक्षी नेता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह पर आरोप लगाया कि 'इस प्रकार के आरक्षण से भारत की एकता और अखंडता को खतरा है। आपने पूरे देश में जातिवादी हिंसा भड़का दी है।' राजीव गांधी उस समय गरजकर बोले थे। विशेष तौर पर उन्होंने समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों, तथाकथित संपन्न वर्ग को आरक्षण का लाभ देने के औचित्य पर प्रश्न उठाया था।

जिन लोगों को मंडल आयोग की बहस याद है, वे जानते हैं कि आरक्षण के लाभभोगियों में से 'संपन्न वर्ग' (क्रीमी लेयर) को निकालने के प्रश्न पर भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टियों तथा कांग्रेस में सर्वसम्मति बनी थी। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन के संबंध में अपना निर्णय देते समय आरक्षण में 'संपन्न वर्ग' को शामिल न करने पर अपनी राय दी थी। वर्तमान संदर्भ में मैंने 'संपन्न वर्ग' के सिध्दांत का उल्लेख यह बताने के लिए किया है कि समग्र रूप में मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखते समय कांग्रेस ने इस सिध्दांत पर राजीव गांधी की चिंता या विचार पर ध्यान नहीं दिया। इस संदर्भ में मैं यहाँ उध्दृत करना चाहता हूँ कि पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष सम्मानित गांधीवादी काका कालेलकर ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय सरकार को लिखे पत्र में कहा था'पिछड़ा वर्ग आयोग के प्रयोजनार्थ हम यह विचार स्वीकार नहीं कर सकते कि सभी भारतीय ईसाई और भारतीय मुस्लिम पिछड़े हुए हैं। इस तर्क को स्वीकार किया जाए तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि सभी हिंदू समान रूप से पिछड़े हुए हैं।'

मैं सांप्रदायिक आरक्षण के प्रति कांग्रेस पार्टी की सहमति को छद्म पंथनिरपेक्ष मनोवृत्ति तथा अल्पसंख्यकवाद की राजनीति में अंतर्निहित समझौतों और दबावों के प्रति पूर्ण समर्पण का परिणाम समझता हूँ। इससे यह दिखाई देता है कि राष्ट्र के दीर्घकालिक हित का त्याग करने, यहाँ तक कि अल्पसंख्यक वोट बैंक पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय आंदोलन के समय दर्शाई गई अपनी वचनबध्दता को भी छोड़ने की इच्छुक है।

मैं यहाँ दुर्गादास बसु की अति महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'इंट्रोडक्शन टू द कांस्टीटयूशन ऑफ इंडिया' से एक अनुच्छेद उध्दृत करना चाहता हूँ। संवैधानिक मामलों के विख्यात विद्वान् बसु ने इन अनिष्टकारी प्रवृत्तियों के बारे में लिखा है, 'जो धार्मिक अल्पसंख्यकों की आक्रामक माँगों के संबंध में वर्ष 1980 के आम चुनावों से प्रकट होती आ रही हैं। ये प्रवृत्तियाँ तथा ऐसी माँगें संविधान की मूल भावना तथा बुनियाद के विरुध्द हैं। इसमें इस देश की सर्वोच्च न्यायपालिका की घोषणाओं के मूल संदेश को नहीं समझा गया। इन माँगों का आधार यह नहीं है कि ये घोषणाएँ संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं, बल्कि यह कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की अलगाववादी इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। स्वातंत्र्योत्तर काल के इस घटनाक्रम की सर्वाधिक कष्टदायी बात यह है कि अल्पसंख्यकों ने अपने वोट को प्रलोभन के रूप में माना है तथा विभिन्न पार्टियों से संबंधित बहुसंख्यक समुदाय के राजनीतिक नेता ने बिना सोचे-समझे अंधाधुंध अपने चुनाव घोषणा-पत्रों तथा गठबंधनों में इस प्रलोभन को निगल लिया है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समय अपनाई गई विचारधाराओं पर कोई ध्यान नहीं दिया, जबकि यह विचारधारा हमारे संविधान का आधार है। इस पृष्ठभूमि में, निष्पक्ष शिक्षाविद् का कर्तव्य है कि वह हरेक राष्ट्रवादी भारतीय (प्रत्येक भारतीय नागरिक के बारे में यह धारणा नहीं बनाई जा सकती कि उसकी संकीर्ण राजनीतिक आकांक्षाएँ हैं) को बताए कि अल्पसंख्यकों की राष्ट्रवाद-विरोधी माँग स्वीकार करने से भारत टुकड़ों में बिखर जाएगा।

सकारात्मक सोच रखनेवाले इस देश के लोगों, इनमें विचारशील कांग्रेसी भी शामिल हैं, से मेरा अनुरोध है कि अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के विरुध्द वे आवाज उठाएँ। चूँकि भारत मजहब आधारित राज्य नहीं है, इसलिए विभिन्न आस्थाओं पर आधारित समुदायों की पहचान और मजहबी अधिकार, जिससे वृहत्त भारतीय परिवार बनता है, को अवश्य ही संरक्षित किया जाना चाहिए। लेकिन 'बहुसंख्यक' और 'अल्पसंख्यक' धारणाओं का हमारे देश की राजनीति तथा शासन-पध्दति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इन धारणाओं का दुरुपयोग वोटबैंक की राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए। यह विभाजक मानसिकता भारत की संयुक्त एकता और सामंजस्यपूर्णता को खतरे में डालती है। ब्रिटिश शासकों के समान 'कांग्रेस पार्टी अपने स्वार्थों की खातिर' अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर राष्ट्र को निरंतर बाँट रही है।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी पार्टी अल्पसंख्यकोंमुस्लिम या अन्यके विरुध्द नहीं है, न ही भारत में किसी अल्पसंख्यक पंथ के खिलाफ है। हम इस्लाम सहित सभी धर्मों का आदर करते हैं। भारत देश हम सबका हैचाहे हमारा धर्म या जाति कुछ भी हो। हमारी राष्ट्रवाद की विचारधारा सबको साथ लेकर चलने की है, तथा पक्षपातरहित है। मेरी मुस्लिम समुदाय से अपील है कि वे इस प्रश्न पर आत्म-विश्लेषण करें, 'क्या मेरी पार्टी के प्रति आपके वर्तमान नकारात्मक दृष्टिकोण से आपके समुदाय का या व्यापक स्तर पर राष्ट्र का कोई भला होता है? स्वतंत्रता-प्राप्ति के साठ वर्षों बाद आपके समुदाय को गरीब तथा पिछड़ा रखने एवं बार-बार धोखा देने के बावजूद क्या कांग्रेस पार्टी आपके समर्थन की पात्र है? भारत के विविध समाज के सभी हिस्सों, वर्गों की प्रगति, कल्याण और सुरक्षा परस्पर संबध्द है तथा अखंड है। इसलिए आइए, अल्पसंख्यक मनोवृत्ति के जाल से बाहर निकलकर समान अधिकारों और उत्तरदायित्व की भावना के साथ राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल हो जाइए, ताकि सुदृढ़, समृध्द एवं न्यायपूर्ण भारत के निर्माण में सबकी समान जिम्मेदारियाँ हों और इसके फल सबको समान रूप से मिलें।'

 

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