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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में मेरा कार्यकाल
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मोरारजी देसाई ने 24 मार्च, 1976 को भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। दो दिन पश्चात् उन्नीस सदस्यीय मंत्रिमंडल ने भी शपथ ली। मैं तत्कालीन जनसंघ के उन तीन व्यक्तियों में से एक था, जो नई सरकार में शामिल थे। अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया, जबकि बृजलाल वर्मा को उद्योग मंत्रालय दिया गया। प्रधानमंत्री ने मुझसे पूछा कि मैं कौन सा मंत्रालय चाहता हूँ? बिना किसी झिझक के मैंने तुरंत कहा, 'सूचना एवं प्रसारण।' जब उन्होंने पूछा कि क्यों? मैंने उन्हें बताया कि '1960 में एक पत्रकार के रूप में काम करने से मुझे मीडिया से संबंधित मुद्दों में गहरी रुचि हो गई है। मैंने लगातार इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी द्वारा सरकार-संचालित मीडिया के पक्षपातपूर्ण प्रयोग के बारे में लिखा है।

राज्यसभा में मैंने आकाशवाणी और दूरदर्शन को स्वायत्तता प्रदान करने की माँग उठाई है। लेकिन सबसे बड़ा कारण आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा मुख्य रूप से प्रेस की स्वतंत्रता पर कुठाराघात है।' अब सेंसरशिप के कानूनी और प्रशासनिक ढाँचे को गिराने की आवश्यकता है, जिसे आपातकालीन शासन द्वारा खड़ा किया गया था। इसलिए नई सरकार के सामने आनेवाली चुनौतियों के रूप में भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मेरे लिए महत्त्वपूर्ण विभाग है।' मोरारजीभाई ने कहा, 'मैं आपसे सहमत हूँ। मैं इस नाजुक मंत्रालय में आपको चाहता हूँ।'

सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मेरा पहला कार्य था आपातकाल के दौरान जनसंचार के साधनों के दुरुपयोग पर एक श्वेत-पत्र प्रस्तुत करना। आपातकालीन शासन के विरुध्द जनता द्वारा दिए गए प्रबल समर्थन के बाद भारत के लोगों को यह जानने का अधिकार था कि प्रेस सेंसरशिप की आड़ में कितने अत्याचार किए गए, कैसे इसे न्यायोचित ठहराने की कोशिश की गई और कैसे इसका प्रतिरोध किया गया। इसलिए मैंने जल्दी ही एक विशेष समिति गठित की, जिसकी अध्यक्षता मेरे मंत्रालय के पूर्व सचिव ने की। समिति ने अपना काम रिकॉर्ड समय में पूरा किया और मैंने अगस्त 1977 में सदन के पटल पर श्वेत-पत्र रखा।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मेरा प्रमुख कार्य यह देखना था कि आपातकाल के दौरान प्रेस पर लगाए गए सभी प्रतिबंध और नियंत्रण हटा लिये गए हैं। इसके लिए मैंने तीन महत्त्वपूर्ण पहलें कीं। सबसे पहले, प्रेस सेंसरशिप के लिए जारी किए गए सभी निर्देशों को वापस लेना। उदाहरण के लिए, जेल में बंद लोगों के नाम और संख्या के प्रकाशन पर हास्यास्पद निषेधाज्ञा लागू थी। ऐसे सभी प्रतिबंध हटा लिये गए। साथ ही कई कानूनों में भी संशोधन किया गया। नई सरकार बनने के एक पखवाड़े के भीतर लोकसभा में दो विधेयक प्रस्तुत किए। एक में आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन से बचाव विधेयक को निरस्त करना, दूसरे का उद्देश्य थासंसदीय कार्रवाई (प्रकाशन की सुरक्षा) विधेयक, जिसे सामान्यत: 'फिरोज गांधी विधेयक' के रूप में जाना जाता था, उसे पुनर्स्थापित करना। ये दोनों विधेयक अत्यंत उत्साह से पारित किए गए।

मैंने संसद् के भीतर व बाहर आकाशवाणी और दूरदर्शन की संस्थानात्मक स्वायत्तता के मुद्दे पर गंभीर बहस की पहल की। इस उद्देश्य से श्री बी.जी. वर्गीज की अध्यक्षता में एक कार्यबल गठित किया गया। प्रसार भारती की अवधारणा, जोकि इन दोनों मीडिया संगठनों को एक स्वायत्त निगम द्वारा संचालित करने की थी, वह इसी समिति की सिफारिश थी। मैंने संसद् में 1977 में प्रसार भारती (भारतीय प्रसारण निगम) विधेयक पेश किया। यह राज्यसभा में पास नहीं हो सका, क्योंकि सदन में कांग्रेस का बहुमत था और वह इसके पक्ष में नहीं थी।

जनता पार्टी सरकार का पतन, इंदिरा गांधी की वापसी

जब जनवरी 1977 में जनता पार्टी ने जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर सरकार बनाई तो यह भारत के लोकतंत्र-प्रेमी लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का मूर्त रूप थी। देश में बहुत से लोग जे.पी. को दूसरा महात्मा मानते थे, जिनके नेतृत्व में भारत का 'दूसरा स्वतंत्रता संग्राम' लड़ा गया था। चार प्रमुख विपक्षी दलों के एक साथ आने से लोगों में विश्वास जागा था कि वे संसदीय चुनावों के माध्यम से आपातकालीन शासन को पराजित कर सकते हैं। जनता पार्टी की विजय ने यह सिध्द कर दिया था कि तानाशाही को लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण माध्यमों से खत्म किया जा सकता है।

दुर्भाग्य से जनता सरकार का गौरव अल्पकालिक था। पार्टी के भीतर घातक आपसी झगड़ों ने इसके द्वारा आधा कार्यकाल पूरा करने से पूर्व ही इसका अंत ला दिया। मोरारजी देसाई ने 15 जुलाई, 1979 को त्यागपत्र दे दिया। उपप्रधानमंत्री चरण सिंह ने इंदिरा गांधी के समर्थन से प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, जिनके विरुध्द वर्ष 1977 में लोगों ने निर्णायक फैसला दिया था। इंदिरा गांधी चरण सिंह की मित्र नहीं थीं, उन्होंने उनका प्रयोग जनता पार्टी को तोड़ने और छह महीने से भी कम समय में उनकी सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने में किया। इस प्रकार एक धोखे के बाद दूसरा धोखा होता गया।

उसके बाद देश ने एक और दुर्भाग्यपूर्ण घटना देखी। चरण सिंह के त्यागपत्र के बाद जनता पार्टी ने जगजीवन राम के नेतृत्व में अगली सरकार बनाने का दावा पेश कतत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. नीलम संजीव रेड्डी ने जगजीवन राम के सरकार बनाने के वैध अधिकार की अनदेखी कर उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया और 22 अगस्त, 1979 को लोकसभा भंग कर दी। अत: जनवरी 1980 में देश पर मध्यावधि चुनावों का बोझ डाल दिया गया। मतदाताओं ने सत्ता संघर्ष से भ्रमित होकर और जनता पार्टी में दरार के कारण इंदिरा गांधी को वापस सत्ता में लाने के लिए वोट दिया।

इतिहास में ऐसे अवसर कम ही देखने को मिलते हैं, जब सरकार को इस तरह का अवसर और लोगों का विश्वास मिलता है, जैसा जनता सरकार को मिला।

अपनी पुस्तक 'द पीपुल बिट्रेड' में मैंने विस्तार से जनता सरकार के उदय एवं अस्त से जुड़े आनंदातिरेक और पीड़ा का वर्णन किया है। चूँकि यह मोरारजी देसाई सरकार के अस्थिर होने के तुरंत बाद और 1980 के चुनावों से पहले लिखी गई थी, पुस्तक में घटनाओं का विश्लेषण उसी प्रकार किया गया है जैसे वे घटीं। जब मैं पीछे मुड़कर घटनाओं को देखता हूँ तब पाता हूँ कि मैंने उस समय जो निष्कर्ष निकाला था वह आज भी प्रासंगिक है।

आत्मघाती 'दोहरी सदस्यता' विवाद

वर्ष 1980 के संसदीय चुनावों में जनता पार्टी की हार का अनुमान मुझे पहले से ही था। यह हार अत्यंत गंभीर थी। इसने दर्शाया कि मतदाता 1977 के जनादेश के साथ विश्वासघात करने के लिएपार्टी को दंड देना चाहते थे। 1977 में 298 सीटों की तुलना में पार्टी को मात्र 31 सीटें प्राप्त हुईं। इसमें जनसंघ की सीटें 1977 में 93 की तुलना में मात्र 16 थीं। दूसरी ओर इंदिरा गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस (आई) शानदार तरीके से वापस लौटी और 1977 के 153 सांसदों की तुलना में 1980 में उसके 351 सांसद विजयी रहे, जो कि 542 सदस्यीय सदन में लगभग दो-तिहाई बहुमत था।

बाद में कहने को कुछ लोग कह सकते हैं कि सभी घटक पार्टियों के विलय के स्थान पर उनका गठबंधन बनाना ज्यादा उपयोगी होता। आपातकाल के दौरान मनोदशा ऐसी थी कि लगभग हर किसी को लग रहा था कि सभी लोकतांत्रिक दलों का एक सामान्य मंच ही कांग्रेस पार्टी को पराजित कर सकता है। जयप्रकाशजी भी एक सशक्त पार्टी की संरचना चाहते थे।

विलय का निर्णय गलत नहीं था; लेकिन दो कारण जनता पार्टी के लिए हानिकारक सिध्द हुए। पहला था, कुछ अति महत्त्वाकांक्षी नेताओं का आत्मकेंद्रित एवं गैर-अनुशासित व्यवहार, जिसके कारण उन्होंने तानाशाही के विरुध्द इतनी मुश्किल से मिले लाभ को मजबूत करने की बजाय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को महत्त्व दिया। दूसरा कारण था, कुछ नेताओं को भय था कि तत्कालीन जनसंघ के नेता शीघ्र ही जनता पार्टी पर प्रभुत्व स्थापित कर लेंगे। इस कारण से जब सदस्यता अभियान शुरू करने और संगठनात्मक चुनाव कराने की बात आई तब उन्होंने 'दोहरी सदस्यता' का मुद्दा उठाया।

मुख्य रूप से 'दोहरी सदस्यता' का विचार मधु लिमये की मानसिक उपज था, जिसका लक्ष्य था जनता पार्टी के उन सदस्यों को कमजोर करना, जो पहले जनसंघ का हिस्सा थे और लगातार संघ से जुड़े हुए थे। जब जनता पार्टी को बने एक वर्ष भी नहीं हुआ था तब लिमये, जो पार्टी के महासचिव थे, ने इस बात पर जोर दिया कि जनता पार्टी का कोई भी सदस्य साथ-ही-साथ संघ का भी सदस्य नहीं हो सकता।

अटलजी, नानाजी देशमुख और मैंने स्वाभाविक रूप से स्वयं को संघ से अलग कर लेने की माँग का तीव्र विरोध किया। जो भी हो, हमने जनसंघ के संघ के साथ संबंधों को जयप्रकाश नारायण तथा 'लोकतंत्र बचाओ' अभियान के अन्य नेताओं के समक्ष जनता पार्टी की स्थापना से पहले ही स्पष्ट कर दिया था। इसलिए हमने लिमये और अन्यों का प्रतिरोध करते हुए यह पूछा कि, 'आप जनता पार्टी के निर्माण के बाद दोहरी सदस्यता का प्रश्न कैसे उठा सकते हैं? हम, जिन्होंने लगभग अपना सारा जीवन संघ के स्वयंसेवकों के रूप में व्यतीत किया है, कैसे अचानक उसके साथ सारे संबंध समाप्त कर सकते हैं, वह भी उस पार्टी के लिए, जिससे हम कुछ ही महीने पहले जुड़े हैं?'

एक दिन चंद्रशेखर संसद् में मेरे कार्यालय में यह कहते हुए आए कि उन्हें अटलजी और मुझसे कोई जरूरी चर्चा करनी है। उन्होंने हमें बताया कि हेमवती नंदन बहुगुणा, जो उस समय चरण सिंह के खेमे के थे, तथा कुछ अन्य लोग जनता पार्टी में बने रहना चाहते हैं, यदि जनसंघ मोरारजीभाई की सरकार का हिस्सा न हो। बहुगुणा ने यह संकेत स्पष्ट रूप से हमें भी दिया था। चंद्रशेखर के जाने के बाद हमने आपस में इस मुद्दे पर चर्चा की। बृजलाल वर्मा, जो कि मंत्रिमंडल में जनसंघ के तीसरे मंत्री थे, से विचार-विमर्श करने के बाद हम एक सर्वसम्मत निर्णय पर पहुँचे। हम तीनों संसद् में प्रधानमंत्री के कक्ष में गए और उन्हें बताया कि हम सरकार के अस्तित्व एवं स्थिरता के लिए सरकार छोड़ने को तैयार हैं।

मोरारजी भाई ने उस प्रस्ताव पर विचार तक नहीं किया। उन्होंने यह कहते हुए तुरंत उसे ठुकरा दिया, 'आप क्यों त्यागपत्र देंगे? आपने क्या गलती की है? चाहे आपका यह प्रस्ताव मेरी सरकार की मदद करे, लेकिन मेरे द्वारा आपके त्यागपत्र स्वीकार करना अनैतिक होगा। आपको सरकार छोड़ने के लिए कहने की बजाय मैं स्वयं सरकार छोड़ना पसंद करूँगा।' 15 जुलाई को जब दल-बदल के कारण मोरारजीभाई ने संसद् में अपना बहुमत खो दिया तो उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। असैध्दांतिक समझौता करने की बजाय उन्होंने अपने पद का बलिदान करना उचित समझा।

 

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