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मेरे संसदीय जीवन की शुरूआत
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आर्गेनाइजर' में सात वर्षों का मेरा कार्यकाल सन् 1967 में समाप्त हुआ। ऐसा इसलिए हुआ कि एक लंबे अंतराल के बाद मुझे दिल्ली की राजनीति में वापस लौटना पड़ाइस बार एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी उठाने के लिए। सन् 1952 से 1955 तक दिल्ली एक पूर्ण राज्य था। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर केंद्रीय सरकार ने 1955 में उसका राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया। उसे केंद्र-शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया, जिसमें दो म्युनिसिपल निकाय थेनई दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (एन.डी.एम.सी.) और दिल्ली नगर निगम (एम.सी.डी.) ।

दिल्ली का राज्य का दर्जा समाप्त किया जाना उसके नागरिकों को रास नहीं आया। जनसंघ ने उनकी भावनाओं को अभिव्यक्त किया और वह राष्ट्रीय राजधानी को पूर्ण राज्य बनाए जाने की माँग करनेवाली पहली पार्टी बन गई। पार्टी ने इस मुद्दे पर एक जन आंदोलन भी चलाया। इस माँग से आधी सहमति के तौर पर केंद्रीय सरकार दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल, जिसे एक राज्य विधानसभा के बराबर का दर्जा दिया गया था, के गठन के लिए सहमत हो गई। उसने यह घोषणा भी की कि मार्च 1967 में होनेवाले आम चुनावों के साथ ही इस नई परिषद् के लिए भी चुनाव करवाया जाएगा। उस उपाय से लोगों की आकांक्षाएँ पूरी नहीं हुईं और इसलिए सरकार को अक्तूबर 1966 में एकअंतरिम दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल की स्थापना के लिए विवश होना पड़ा। दिल्ली नगर निगम में विभिन्न दलों की सदस्य संख्या के अनुसार इस परिषद् के सदस्य उन दलों द्वारा नामित किए गए। जनसंघ ने परिषद् के लिए मुझे नामांकित किया और मैं उसमें नेता प्रतिपक्ष बन गया।

पाँच महीनों के अंदर दिल्ली में लगभग एक साथ तीन चुनाव हुएलोकसभा, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल के लिए। जनसंघ तीनों में जीता। हमारी पार्टी ने 7 लोकसभा सीटों में से 6, नगर निगम की 100 सीटों में से 52 और परिषद् की 56 सीटों में 33 पर विजय प्राप्त की। राष्ट्रीय राजधानी में इस शानदार जीत के साथ ही वर्ष 1962 की 14 लोकसभा सीटों की तुलना में 1967 में कुल 35 सीटों पर कब्जा करके जनसंघ भारतीय राजनीति की एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरा।

मैंने मेट्रोपोलिटन काउंसिल का चुनाव नहीं लड़ा था, क्योंकि मुझ पर तीनों चुनावों के लिए पार्टी की शहरी इकाई को संगठित करने की जिम्मेदारी थी। दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल अधिनियम के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय परिषद् के लिए पाँच सदस्य नामांकित कर सकता था। इस प्रावधान का उपयोग करते हुए अटलजी ने परिषद् हेतु मुझे नामांकित करने के लिए तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री श्री वाई.बी. चव्हाण को सहमत कर लिया। फिर पार्टी ने परिषद् के अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए मुझे उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया। मैंने चुनाव जीता और मेट्रोपोलिटन काउंसिल का सभापति बन गया। मेरे पार्टी सहयोगी विजय कुमार मल्होत्रा परिषद् में मुख्य कार्यकारी पार्षद बने।

'60 के दशक की समाप्ति के साथ ही दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल का मेरा कार्यकाल भी समाप्त हो गया।

जनसंघ की कमान वाजपेयीजी के हाथों में

फरवरी 1968 में दीनदयालजी के आकस्मिक निधन ने हमारी पार्टी को अंधकार और अवसाद की लपेट में ले लिया था। हमारा दु:ख कहीं अधिक गहरा था, क्योंकि उनकी हत्या पर से रहस्य के परदे को सप्ताह और महीनों बीत जाने के बाद भी नहीं हटाया जा सका।

इस विषम परिस्थिति में पार्टी ने नेतृत्व के लिए अटलजी की ओर देखा। उन्हें तैंतालीस वर्ष की अवस्था में पार्टी अध्यक्ष चुना गया। एक उत्कृष्ट वक्ता और सांसद के रूप में पहले से विख्यात वाजपेयीजी से अब पार्टी में नई जान फूँकने के लिए अनुरोध किया गया। उन्होंने इस अनुरोध को अच्छे ढंग से स्वीकारा।

राज्यसभा में मेरा प्रवेश

अप्रैल 1970 में मैंने दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल के अध्यक्ष के कार्यालय से निकलकर भारत की संसद् में प्रवेश किया। संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली से राज्यसभा के सदस्य श्री इंद्रकुमार गुजराल का कार्यकाल पूरा होने से राज्यसभा में एक स्थान रिक्त हो गया था। पार्टी ने मुझे उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा और परिषद् में जनसंघ का बहुमत होने के कारण मैं चुनाव में विजयी हुआ।

मुझे स्मरण है कि राज्यसभा में शुरू में मैंने जो भाषण दिया था, उन मुद्दों को मैं विगत चार दशकों के दौरान उठाता रहा। ये मुद्दे थेदेश की एकता और अखंडता को कैसे सबल बनाया जाए; अपनी जनतांत्रिक संस्थाओं को कैसे सुरक्षित और अधिक प्रभावी बनाया जाए; सत्तारूढ़ दल की ओर से विपक्ष को सम्मान दिया जाना क्यों महत्त्वपूर्ण है और केंद्र-राज्य संबंध को कैसे मजबूत तथा मधुर बनाया जाए?

पहली बार पार्टी अध्यक्ष बनना

मुझे पार्टी अध्यक्ष बनने में बहुत ही संकोच हो रहा था। पार्टी अध्यक्ष बनने का दायित्व मेरे ऊपर कैसे आया, यह एक रोचक कहानी है, जो यहाँ उल्लेख करने योग्य है। मैंने पिछले अध्याय में उल्लेख किया कि फरवरी 1968 में पं. दीनदयाल उपाध्याय की दु:खद मृत्यु के पश्चात् अटलजी पार्टी अध्यक्ष बने थे, वे सन् 1971 के चुनाव के बाद पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे थे। 1972 के प्रारंभ में अटलजी ने मुझसे कहा, 'अब आप पार्टी के अध्यक्ष बन जाइए।' इसका कारण पूछने पर उन्होंने कहा, 'मैं इस पद पर अपना चार वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुका हूँ। अब समय है कि कोई नया व्यक्ति दायित्व स्वीकार करे।'

मैंने उनसे कहा, 'अटलजी, मैं किसी जनसभा में भाषण भी नहीं दे सकता हूँ। फिर मैं पार्टी अध्यक्ष कैसे हो सकता हूँ?' उन दिनों मैं जनता के बीच बोलने में भी पटु नहीं था और मुझे बोलने में संकोच भी होता था। मैं यह जरूर स्वीकार करता हूँ कि मेरे अंदर इस ग्रंथि के पनपने का एक बहुत बड़ा कारण अटलजी के साथ मेरा निकट संपर्क था, जो अपनी जादुई भाषण कला से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे।

अटलजी ने जोर देकर कहा, 'लेकिन अब तो आप संसद् में बोलने लगे हैं। फिर यह संकोच कैसा?'

मैंने उनसे कहा, 'संसद् में बोलना एक बात है और हजारों लोगों के सामने भाषण देना अलग बात है। इसके अतिरिक्त पार्टी में कई वरिष्ठ नेता हैं। उनमें से किसी को पार्टी अध्यक्ष बनाया जा सकता है।'

अटलजी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, 'किंतु दीनदयालजी भी वक्ता नहीं थे, लेकिन लोग उन्हें बहुत ही ध्यान से सुनते थे; क्योंकि उनके शब्दों में गहन चिंतन मौजूद रहता था। इसलिए पार्टी को नेतृत्व प्रदान करने के लिए बहुत बड़ा वक्ता होना आवश्यक नहीं है।'

मैं इस बात से प्रभावित नहीं हुआ। मैंने कहा, 'नहीं-नहीं, मैं पार्टी अध्यक्ष नहीं बन सकता। कृपया किसी अन्य व्यक्ति को ढूँढ़िए।'

उन्होंने कहा, 'दूसरा व्यक्ति कौन हो सकता है?'

मैंने कहा, 'राजमाता क्यों नहीं?'

विजयाराजे सिंधिया को ग्वालियर की राजमाता* के रूप में जाना जाता था। भारत के विशालतम और संपन्नतम राजेरजवाड़ों में से ग्वालियर एक था। उस रियासत के महाराजा के साथ उनका विवाह हुआ था। अपने पति की मृत्यु के बाद सन् 1962 में कांग्रेस के टिकट पर वे संसद् सदस्य बनीं। पाँच साल के बाद अपने सैध्दांतिक मूल्यों के दिशा-निर्देश पर वे कांग्रेस छोड़कर जनसंघ में शामिल हो गईं। एक राजपरिवार से रहते हुए भी वे अपनी ईमानदारी, सादगी और प्रतिबध्दता के कारण पार्टी में सर्वप्रिय बन गईं। शीघ्र ही वे पार्टी में शक्ति स्तंभ के रूप में सामने आईं।

अटलजी मेरे सुझाव से सहमत हो गए और हम दोनों राजमाता को जनसंघ अध्यक्ष बनने के लिए मनाने के उद्देश्य से ग्वालियर गए। वास्तव में उन्हें काफी मनाना पड़ा, किंतु अंतत: वे मान गईं। हमें राहत और प्रसन्नता मिली। स्वीकृति के लिए हमने उन्हें धन्यवाद दिया। फिर तुरंत उन्होंने कहा, 'किंतु कृपया प्रतीक्षा करें। अपनी अंतिम स्वीकृति के लिए आपको मुझे एक दिन का और समय देना होगा। जैसाकि आप जानते हैं, मैं अपने जीवन में कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय दतिया में रहनेवाले अपने श्रीगुरुजी की अनुमति और आशीर्वाद के बिना नहीं लेती हूँ।' उसी दिन वे मध्य प्रदेश के उस छोटे से नगर दतिया गईं। किंतु दूसरे दिन वापस लौटकर उन्होंने अप्रिय समाचार सुनाया'मेरे श्रीगुरुजी ने इसकी अनुमति नहीं दी।'

'अब हमें क्या करना चाहिए?' अटलजी ने पूछा।

मैंने कहा, 'हम लोग महावीरजी को क्यों नहीं मनाते हैं?' प्रसिध्द स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद* के पुत्र डॉ. भाई महावीर जनसंघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और उस समय राज्यसभा के सदस्य थे।

अटलजी इससे सहमत हो गए और हम दोनों जगन्नाथ राव जोशी के साथ महावीरजी से मिलने उनके पंत मार्ग, नई दिल्ली स्थित निवास पर गए। बिना किसी अधिक मान-मनौवल के वे सहमत हो गए। हम अपने मिशन की सफलता पर राहत महसूस करने लगे कि उन्होंने कहा, 'कृपया एक क्षण प्रतीक्षा करें। इस संबंध में मैं अपनी पत्नी से सलाह करना चाहूँगा।'वे घर के अंदर गए और कुछ समय बाद बुरी खबर के साथ वापस लौटे'मेरी पत्नी इससे सहमत नहीं हैं।'

जब हम उनके घर से बाहर निकले तो अटलजी ने मुझसे कहा, 'अब और असफल प्रयास नहीं। अब आपके पास विकल्प नहीं है, बल्कि मैं जो कहता हूँ उसपर 'हाँ' कहना है।' इस प्रकार औपचारिक रूप से मुझे दिसंबर 1972 में भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। उसके तुरंत बाद मैंने कानपुर में पार्टी के अठारहवें वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता की।

 

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