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वर्ष 1957 के शुरू में जब दीनदयालजी ने अटलजी और अन्य नव-निर्वाचित जनसंघी संसद् सदस्यों को उनके संसदीय कार्यों में सहायता देने के लिए मुझे राजस्थान से दिल्ली बुलाया। तभी से दिल्ली मेरी सभी राजनीतिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन गई। मेरे इस नए उत्तरदायित्व ने मुझे संसद् और सरकार की कार्य-पध्दति समझने के अतिरिक्त विवरणों का प्रारूप बनाने, प्रश्न तैयार करने और पार्टी के प्रचार बिंदुओं को चिह्नित करने में अपनी कुशलता बढ़ाने का अवसर दिया। कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन की राजनीति का पहला अनुभव गठबंधन की राजनीति में मेरा पहला प्रवेश दिल्ली नगर निगम से हुआ। दिल्ली, जो उस समय एक केंद्र-शासित प्रदेश था, में नगर निगम की स्थापना सन् 1958 में हुई। इन सभी में जनसंघ को अच्छा समर्थन प्राप्त था। इसलिए निगम के गठन से पार्टी को देश की राजधानी के नगरीय प्रशासन में एक अहम भूमिका निभाने का अवसर मिला। इसलिए, पार्टी की संसदीय शाखा में कार्य करने के अतिरिक्त पं. दीनदयालजी ने महामंत्री के रूप में मुझे जनसंघ की दिल्ली इकाई का काम देखने के लिए कहा। हमारा मुकाबला कांग्रेस पार्टी से था, जिसका राजनीतिक दबदबा उस समय पूरे भारत में था। 80 सदस्यों वाले निगम में हमने कांग्रेस से केवल 2 सीटें कम यानी कुल 2z सीटें जीतीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 8 सदस्य थे। इसके पास नगर निगम में इतनी सीटें थीं कि वे कांग्रेस या जनसंघ किसी की भी सरकार बनवा सकते थे। चुनावों के बाद शीघ्र ही भाकपा ने जनसंघ को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने का प्रस्ताव किया, बशर्ते कांग्रेस उसकी सदस्या एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और 'भारत छोड़ो' आंदोलन की सितारा अरुणा आसफ अली को दिल्ली की पहली मेयर बनाने के लिए तैयार हो जाए। कांग्रेस ने यह शर्त मान ली। लेकिन आंतरिक झगड़ों के कारण यह गठबंधन एक साल के अंदर ही टूट गया। इसके बाद जनसंघ और भाकपा के बीच एक समझौता हुआ कि महापौर और उपमहापौर के पद दोनों पार्टियों को बारी-बारी से दिए जाएँगे। तदनुसार प्रथम वर्ष के लिए अरुणा आसफ अली को महापौर होना था और उपमहापौर पद के लिए कम्युनिस्ट, केदारनाथ साहनी, जो बाद में जनसंघ और भाजपा के एक प्रमुख नेता बने, की उम्मीदवारी का समर्थन करते। दूसरे वर्ष के लिए साहनी महापौर बनते और उपमहापौर पद के लिए जनसंघ भाकपा के किसी उम्मीदवार का समर्थन करती। राजनीतिक नेतृत्व और रणनीति बनाने में मेरे लिए यह एक बहुत उपयोगी आरंभिक पाठ था। मैं यह कह सकता हूँ कि गठबंधन की राजनीति में यही मेरी प्रारंभिक शिक्षा थी, जो आनेवाले वर्षों और दशकों में कई अवसरों पर मेरे काम आई। अटलजी और दीनदयालजी के साथ सह जीवन राजस्थान से दिल्ली आने के बाद मेरा पहला निवास 30, राजेंद्र प्रसाद रोड स्थित अटलजी का सरकारी बँगला था, जहाँ वह महाराष्ट्र के चिपलूण चुनाव क्षेत्र से जनसंघ के सांसद प्रेमजीभाई आशर के साथ रहते थे। उन दिनों जनसंघ की यह विशिष्टता थी कि पूरी पार्टी एक वृहत् परिवार की तरह मिल-जुलकर कार्य करती थी। अशर की पत्नी हम सबके लिए खाना बनाती थीं और हम भी घर के कामों में हाथ बँटाया करते थे। अटलजी भी खाना बनाने में दक्ष थे और कभी-कभी अपने बनाए स्वादिष्ट व्यंजनों से हमें आनंदित किया करते थे। मैं अटलजी के साथ एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक रहा। दिल्ली नगर निगम की स्थापना के बाद जब दीनदयालजी ने मुझसे शहर में पार्टी का संगठन कार्य देखने को कहा तो मैं पुरानी दिल्ली के अजमेरी गेट स्थित जनसंघ के केंद्रीय कार्यालय में रहने लगा। यह एक शांत और छोटी जगह थी, जिसमें एक पार्टी 'कम्यून' की तरह मैं, दीनदयालजी, केदारनाथ साहनी और एक अन्य प्रतिबध्द कार्यकर्ता जगदीश प्रसाद माथुर, जिन्होंने सन् 1951 से 2007 में अपनी मृत्यु होने तक बड़ी निष्ठापूर्वक जनसंघ और भाजपा दोनों की ही सेवा की, रहते थे। वह जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था, परंतु उसमें एक अनोखा आकर्षण था। परंतु नियति मेरे सक्रिय जीवन, और बाद में मेरे व्यक्तिगत जीवन में भी, एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन की योजना बना रही थी। दिल्ली में पार्टी के संगठन सचिव के रूप में तीन वर्ष से अधिक कार्य करने के बाद अब समय आ गया था कि संघ के साप्ताहिक मुखपत्र 'ऑर्गेनाइजर' में शामिल होकर एक पत्रकार की हैसियत से अपने सार्वजनिक जीवन के एक नए अध्याय का आरंभ करूँ। और यही वह समय भी था, जब मैंने अपने निजी जीवन में भी नए अध्याय का आरंभ किया। ऑर्गेनाइजर के वर्ष मैंने बचपन में ही अपनी माँ को खो दिया था। मेरे पिता ने अत्यधिक लाड़-प्यार से मुझे पाला था। मेरी दादी और अन्य नजदीकी रिश्तेदारों ने इस कार्य में उनकी सहायता की थी। यह सच है कि विभाजन ने हमारे जीवन को समूल उखाड़ दिया था, परंतु मेरे परिवार में किसी ने भी हम सबके मन में कड़वाहट या निराशा का भाव नहीं आने दिया। फिर भी, एक बात मेरी चिंता बढ़ा रही थीमैंने पहले राजस्थान और फिर दिल्ली में जब से एक प्रचारक-सह-राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जीवन बिताने का निर्णय लिया था। मैंने अपने पिता, जो विभाजन के बाद कच्छ (गुजरात) में ही बस गए थे, को यदा-कदा ही देखा था। कच्छ में आकर मेरे पिता ने कांडला के पास आदीपुर में सिंधु रीसेटलमेंट कॉरपोरेशन में कार्य किया। वे अब रिटायर होने वाले थे। अब मुझे उनकी देखभाल करनी ही थी। उनके अतिरिक्त मेरी चचेरी बड़ी बहन राधी, जो आदीपुर में ही रहती थी, का भी मुझे ध्यान रखना था। 'मैं एक बेटे का कर्तव्य कैसे पूरा करूँ?' इस सवाल का जवाब न दे पाना मेरे मन को कचोट रहा था। एक दिन मैंने अपनी चिंता दीनदयालजी को बताई। वह ऐसे नेता थे, जिनका हृदय अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदना से भरा रहता था। उन्होंने मुझे 'ऑर्गेनाइजर' में नौकरी करने की सलाह दी। 'यह हमारा अपना जर्नल है।' उन्होंने मुझसे कहा, 'और तुम्हें वहाँ काम करना अच्छा लगेगा, क्योंकि तुम्हारा लेखन से हमेशा लगाव रहा है। पत्र को भी तुम जैसे व्यक्ति की जरूरत है। इसके अतिरिक्त, तुम्हेें इस बात की भी आजादी रहेगी कि तुम अपना राजनीतिक कार्य जारी रखो।' इस तरह सन् 1960 में एक सहायक संपादक के रूप में मैंने 'ऑर्गेनाइजर' में प्रवेश किया। सन् 1947 में स्थापित 'ऑर्गेनाइजर' की प्रसार संख्या तुलनात्मक रूप से कम थी, परंतु बौध्दिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उसकी दृश्यता एवं प्रभाव काफी थे। उसके संपादक के.आर. मलकाणी बहुत अच्छे लेखक थे और विभाजन से पहले सिंध में मेरी ही तरह संघ के एक प्रचारक थे। हम दोनों ने एक साथ सन् 1946 में नागपुर से संघ शिक्षा वर्ग किया था। मलकाणी के कुशल संपादन में 'ऑर्गेनाइजर' संघ एवं जनसंघ के मित्रों और विरोधियों द्वारा समान उत्सुकता से पढ़ा जाने लगा। मेरा वेतन अधिक नहीं थाकेवल 350 रुपए प्रति माह। ऐसा इसलिए था कि 'ऑर्गेनाइजर' व्यावसायिक पत्र नहीं था। इसके अतिरिक्त, स्वतंत्रता के बाद एक लंबे समय तक मीडिया की मुख्यधारा में भी वेतन काफी कम हुआ करते थे। आमदनी की दृष्टि से उन दिनों पत्रकारिता आज की तरह आकर्षक एवं लाभप्रद कैरियर का विकल्प नहीं था। उसमें आमतौर पर दो प्रकार के लोग जाते थेएक वे, जो लेखन में अधिक रुचि रखते थे और स्वाभाविक प्रतिभा के धनी थे, या वे जो आदर्शवादी तथा किसी विचारधारा से अनुप्राणित थे और जिन्हें अपने विचार प्रकट करने के लिए किसी मंच की तलाश थी। 'ऑर्गेनाइजर' में नौकरी करने से मेरे पहनावे में बदलाव हुआ। जब से संघ के प्रचारक के रूप में मैंने राजस्थान में कार्य करना शुरू किया था, मैंने पैंट-शर्ट पहनना छोड़कर भारतीय शैली की धोती और कुरता अपना लिया था। लेकिन जब मैं 'ऑर्गेनाइजर' में आया तो मेरे सहकर्मी कहने लगे, 'धोती-कुरता तो नेताओं का पहनावा है। यह पत्रकारों को नहीं जँचेगा।' मैंने इस बात में कभी विश्वास नहीं किया कि पश्चिमी वेशभूषा आधुनिकता की पहचान है। मैंने हमेशा स्वयं को धोती-कुरते में सहज महसूस किया है। परंतु इसके साथ ही इन मामलों में मैं कभी हठवादी नहीं रहा। अपने सहकर्मियों की सलाह मुझे ठीक लगी और मैंने फिर पैंट-शर्ट पहनना शुरू कर दिया। एक दिन संपादकीय समीक्षा बैठक में सामूहिक रूप से यह महसूस किया गया कि 'हमारा पत्र बहुत नीरस है और केवल राजनीतिक मुद्दों पर ही लिखता है।' संपादक मलकाणी ने कहा, 'यह सच है। हमें जीवन के अन्य दिलचस्प पहलुओं, जैसे फिल्म, पर भी लिखना चाहिए। परंतु फिल्मों पर लिखेगा कौन?' यह कार्य मैंने स्वीकार किया और 'नेत्र' उपनाम से सिनेमा पर एक नियमित स्तंभ लिखने लगा। |