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मैं नहीं जानता कि जिन्ना अपनी आस्था और आयाम में कितने सच्चे मुसलमान थे। पर इतिहास इस बात का गवाह है कि अंग्रेजों के बाद सांप्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन करनेवाले प्रधान वास्तुकार वे ही थे। सन् 1940 में उन्होंने घोषणा की थी, 'हिंदू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र हैं, जो एक साथ नहीं रह सकते।'y साथ ही इस बात के भी काफी प्रमाण हैं कि एक बार पाकिस्तान के बन जाने के बाद उनका अपनी कृति पर ही पूरा नियंत्रण नहीं रहा। डॉ. अजीत जावेद के अनुसार, जिन्होंने जिन्ना पर पर्याप्त अनुसंधान के बाद एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है'वे एक बीमार और उदास इनसान थे। उन्होंने पीड़ा से चिल्लाते हुए कहा था कि मैंने पाकिस्तान का निर्माण कर बहुत बड़ी भूल की है। मैं दिल्ली जाकर नेहरू से कहना चाहता हूँ कि वे अतीत की सारी शत्रुता को भूलकर पुन: मित्र बन जाएँ। ...उन्होंने लियाकत अली खाँ से भी घृणा करनी शुरू कर दी थी, जिनके अनुरोध और मान-मनौवल पर वे वर्ष 1937 में इंग्लैंड से वापस भारत लौटने और मुस्लिम लीग का नेतृत्व सँभालने पर सहमत हुए थे।' दु:ख के साथ कहना पड़ता है, जैसाकि मैंने पहले अध्याय में भी उल्लेख किया है, पाकिस्तान में स्थिति पूरी तरह से अलग थी। पाकिस्तान के निर्माण के बाद जिन्ना के कुछ भी कहने या करने से कराची तथा सिंध के अन्य भागों में रह रहे हिंदुओं में बढ़ते भय और आतंक में कोई कमी नहीं आई। अत: सिंध में मेरे अंतिम दिन अशांति और विक्षोभ से भरे थे। संघ द्वारा 5 अगस्त को कराची में आयोजित विशाल रैली, जिसे श्रीगुरुजी ने संबोधित किया था, निस्संदेह मनोबल बढ़ानेवाली थी। किंतु यह विभाजन द्वारा उत्पन्न घृणा और सांप्रदायिक हिंसा को नहीं रोक सकी। लगभग इसी समय एक अप्रत्याशित घटना हुई, जिसने सिंध में मेरे दिनों का अंत कर दिया। 9 सितंबर, 1947 को कराची की संभ्रांत शिकारपुर कॉलोनी में बम विस्फोट हुआ। इस विस्फोट को देखते हुए संघ के संघचालक खानचंद गोपालदास तथा संघ के अन्य प्रमुख उन्नीस स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया गया। राजपालजी संघ के प्रांत प्रचारकों की राष्ट्रीय बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली गए हुए थे। मुझे विस्फोट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। फिर भी चूँकि स्थानीय प्रेस ने संघ के विरुध्द गंभीर आरोप लगाने शुरू कर दिए थे, मेरे साथियों ने मुझे कराची छोड़ने का परामर्श दिया। उनके अनुरूप में 12 सितंबर को विमान से दिल्ली के लिए रवाना हुआ। मेरे साथ एक स्वयंसेवक मुरलीधर भी थे। मैं एक ब्रिटिश ओवरसीज एयरवेज कॉरपोरेशन (बी.ओ.ए.सी.) के प्रोपेलर एयरक्राफ्ट में चढ़ा। विमान से यह मेरी पहली यात्रा थी और यह इस बात से और भी यादगार बन गई थी कि मैं पाकिस्तान से एक शरणार्थी के रूप में यात्रा कर रहा था, लाखों अन्य लोगों की तरह आश्रय की चाह और विभाजित भारत में एक नई शुरुआत करने के लिए। एक बी.ओ.ए.सी. फ्लाइट से जब मैं कराची से रवाना हुआ था, उस समय के मेरे विचार मेरे तात्कालिक सरोकारों के साथ संबध्द थे। मैं राजपाल जी से किस तरह मिल पाऊंगा? मैं दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय कैसे ढूंढ पाऊंगा? कराची से दिल्ली तक की मेरी हवाई यात्रा के दौरान मेरे विचारों में जहां सिंध से मेरी बिदाई एक दूर की स्मृति बनती जा रही थी वहीं मुझे राजस्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक के रूप में अपने जीवन का अगला जीवन शुरू करना था। मैं और मेरे साथी व सहयात्री मुरलीधर दिल्ली में किसी को नहीं जानते थे। हमारा पहला और प्राथमिक कार्य था सिंध के प्रांत प्रचारक श्री राजपाल पुरी से मिलना, जो संघ की एक महत्त्वपूर्ण बैठक के लिए दिल्ली आए हुए थे। परंतु हमें कुछ पता नहीं था कि वे हमें कहाँ मिलेंगे। मैंने दिल्ली के केवल दो नामों के बारे में सुना थाश्री वसंतराव ओक, जो संघ के प्रांत प्रचारक थे और लाला हरीचंद, दिल्ली के संघचालक, जो सीताराम बाजार में कहीं रहते थे। जब हम नजदीक के दिल्ली कैंटोनमेंट एरिया में दाखिल हुए तो हमने किसी से पूछा, 'क्या आप यहाँ संघ के किसी कार्यकर्ता को जानते हैं?'उसने कहा, 'आप उस दुकान पर चले जाइए। वह संघ का आदमी है।' उसके जरिए हम वसंतराव ओक से मिले, जिन्होंने हमें बताया कि राजपालजी जोधपुर चले गए हैं, जहाँ से वे कराची जाएँगे। इस खबर ने मेरी हिम्मत तोड़ दी। मुझे किसी भी तरह राजपालजी से संपर्क कर उन्हें सिंध वापस जाने से रोकना था। इसलिए मैं और मुरलीधर उसी रात जोधपुर जानेवाली ट्रेन में सवार हो गए । जोधपुर पहुँचने पर मुझे बताया गया कि मेरे लिए कराची से संदेश आया है कि मैं वापस सिंध न जाऊँ। इसके अतिरिक्त सिंध से आए संघ के सभी प्रचारकों और वरिष्ठ नेताओं से जोधपुर में एकत्र होने के लिए कहा गया था, जहाँ कुछ दिनों बाद आनेवाले दिनों में जो कार्य किए जाने हैं, उनके बारे में हमें निर्देश दिए जाएँगे। पाकिस्तान से आए स्वयंसेवकों को संघ के नेताओं का निर्देश था कि हमें पाकिस्तान से आ रहे शरणार्थियों की यात्रा को सुगम और व्यवस्थित बनाने में सहायता करनी चाहिए। शरणार्थियों के राहत और पुनर्वास कार्यों में सहायता देने का कार्य भी हमें सौंपा गया था। हम इस कार्य में पूरी लगन के साथ जुट गए। |