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स्कूल और कॉलेज के मेरे दिन
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कराची में मेरी स्कूली शिक्षा सेंट पैट्रिक्स हाई स्कूल फॉर बॉयज में हुई थी, जो शहर का सबसे बड़ा और सबसे ऊँचे दर्जे का स्कूल माना जाता था। मैंने वर्ष 1936 से 1942 तकछह वर्ष तकवहाँ पढ़ाई की। उसकी स्थापना सन् 1845 में आयरलैंड से आए कैथोलिक मिशनरीज द्वारा मुख्य रूप से शहर के गोअन क्रिश्चियन समुदाय के लिए की गई थी। हमारे स्कूल के दाईं ओर सेंट पैट्रिक का भव्य चर्च (अब कैथेड्रल) था, जहाँ से संपूर्ण क्लार्क स्ट्रीट साफ दिखाई देती थी। उसके बाईं ओर सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल फॉर गर्ल्स था। उस स्कूल की प्रतिष्ठा, उसके शिक्षकों का प्रेम और उत्तरदायित्व से भरा स्वभाव, उसका वास्तुशिल्पीय सौंदर्य और शांत परिसरये सब घटक मिलकर मुझे सेंट पैट्रिक्स से जुड़ा होने पर गर्व महसूस कराते थे।

जहाँ तक मुझे याद है, मैं अपनी पढ़ाई में काफी परिश्रमी था और मैट्रिक तक मैंने हर कक्षा में प्रथम श्रेणी प्राप्त की थी।

सेंट पैट्रिक्स स्कूल में हमारे पास एक और भाषा सीखने का विकल्प था। कई विद्यार्थियों ने फे्रंच को चुना, कुछ ने फारसी ली; परंतु मैंने लैटिन को चुना। मुझे याद है कि बोर्ड की परीक्षा में मुझे लैटिन में काफी अच्छे अंक प्राप्त हुए थे। परंतु जीवन भर मुझे इस बात का खेद रहा कि मैंने स्कूल में संस्कृत नहीं सीखी। कराची के स्कूलों में आमतौर पर संस्कृत नहीं पढ़ाई जाती थी और एक कैथोलिक संस्था होने के कारण सेंट पैट्रिक्स में संस्कृत पढ़ाई ही नहीं जाती थी।

पाठकों को आश्चर्य होगा कि जब मैं कराची में था तो हिंदी अधिक नहीं जानता था। हिंदी फिल्में देखने के कारण मैं हिंदी समझ लेता था और टूटी-फूटी हिंदी में कुछ बात भी कर लेता था। वर्ष 1947 में भारत के इस भाग में आने के बाद ही, जब मैं बीस वर्ष पूरे कर चुका था, मैंने हिंदी पढ़ना, लिखना और बोलना सीखा।

सिनेमा, क्रिकेट और पुस्तकों से मेरा लगाव

मेरे चार मामाओं में सबसे छोटे सुंदर मामा मेरे अच्छे दोस्त बन गए, हालाँकि वह मुझसे काफी बड़े थे। हम दोनों साथ ही बाहर जाते और अकसर साथ ही फिल्में देखा करते थे। मुझमें हिंदी और अंग्रेजी फिल्में देखने का शौक जल्दी ही पैदा हो जाने का मुख्य कारण वही थे।

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स्कूल की क्रिकेट टीम के सदस्य 'लाल' प्रथम पंक्ति में एकदम बाएँ बैठे हुए।

अपने कॉलेज के वर्षों में मुझे पता चला कि मुझे अंग्रेजी साहित्य में अधिक रुचि है। सन् 1942 में जब मैंने हैदराबाद (सिंध) के दयाराम गिदूमल कॉलेज में प्रवेश किया, 'भारत छोड़ो' आंदोलन शुरू हो चुका था। शहर में स्थिति अशांत होने के कारण कॉलेज मुश्किल से ही सुचारु रूप से चल पाताऔर अधिकांश विद्यार्थी इधर-उधर घूमते रहते थे। मैं अपना अधिकांश समय कॉलेज लाइब्रेरी में व्यतीत करता था और जिस पुस्तक को पढ़ने का मन करता, उसे भुक्खड़ की तरह पढ़ डालता था। यहीं पुस्तकों से मेरा जीवन भर चलनेवाला प्रेम अंकुरित हुआ।

चौदह वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक बनना

हर एक के बचपन में एक क्षण ऐसा आता है जब दरवाजा खुलता है और भविष्य प्रवेश करता है।' मेरे मामले में भविष्य में दाखिल होने का वह क्षण अचानक खेल-खेल में ही आ गया, जब मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रवेश लिया। उस समय मैं चौदह वर्ष और कुछ महीने का था। मेरे मैट्रिकुलेशन करने के बाद मेरे पिता कराची से हैदराबाद (सिंध) आ गए थे। कॉलेज में प्रवेश लेने से पहले गरमी की छुट्टियों में मैंने टेनिस खेलना शुरू कर दिया। टेनिस कोर्ट में मेरे नियमित जोड़ीदारों में से एक मेरा मित्र था मुरली मुखी, जो मेरी ही उम्र का था। एक दिन ठीक खेल के बीच वह बोला, 'मैं जा रहा हूँ।' बड़े आश्चर्य से मैंने उससे पूछा तो वह बोला, 'कुछ दिन पहले मैं आर.एस.एस. का स्वयंसेवक बन गया हूँ। मैं शाखा में देर से नहीं पहुँच सकता, क्योंकि उस संगठन में समय की पाबंदी अत्यंत आवश्यक है।'

तब पहली बार मैंने आर.एस.एस. का नाम सुना था। 'यह संगठन है क्या चीज?' मैंने उससे पूछा। मेरे मित्र ने मुझे कुछ समझाया और बोला, 'तुम भी मेरे साथ 'शाखा' चला करो।'मैंने यह कहकर उसे मना कर दिया कि आज तो मैं टेनिस खेलूँगा, फिर किसी दिन देखेंगे। दो दिन बाद मैं उसके साथ एक 'शाखा' में गया और आज भी मुझे वह जगह अच्छी तरह से याद है। उन दिनों सिंध में मार्शल लॉ लगा होने से सार्वजनिक स्थानों पर कवायदें प्रतिबंधित थीं। इसलिए मैं 'शाखा' में पहली बार एक बड़े बँगले की छत पर गया, जो संघ के एक प्रमुख स्वयंसेवक राम कृपलाणी का था; अंत में सभी स्वयंसेवकों ने पंक्तिबध्द होकर सावधान की मुद्रा में मातृभूमि की वंदना हेतु 'संघ प्रार्थना' 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूम' का गायन किया। तब से अब तक पैंसठ वर्ष की लंबी अवधि में, मुझे इस बात का गर्व है कि मैं संघ का समर्पित, निष्ठावान एवं गर्वित स्वयंसेवक रहा हूँ।े

यहाँ मुझे इस बात की व्याख्या करनी चाहिए कि किस बात ने मुझे संघ में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया? जब तक मैं स्कूल में था, मेरी दुनिया मेरे घर और पढ़ाई तक सीमित थी। स्कूल में मैंने वह सारा ज्ञान आत्मसात् कर लिया था, जो मुझे अपने शिक्षकों और पाठय-पुस्तकों से मिला था। घर पर मैंने वह सारा प्यार, स्नेह और संस्कार आत्मसात् किए, जो मुझे अपने परिवार से मिले थे। यही वह पूँजी थी, जो मैंने अपने बचपन में जमा की थी। लेकिन मैं इस वृहद् विश्व के बारे में बहुत कम जानता था, जो मेरे घर और स्कूल की दीवारों के बाहर था। भारत और विश्व में हो रहे महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम से मेरा परिचय तभी हुआ जब मैंने संघ की शाखाओं में जाना आरंभ किया। एक दिन, जब मैं अन्य स्वयंसेवकों के साथ बैठकर श्री श्याम दास द्वारा प्रस्तुत बौध्दिक चर्चा में भाग ले रहा था। उन्होंने हमारे सामने एक सवाल रखा'आप लोग समाज से इतना कुछ पाते हैं, परंतु उसके बदले में समाज को क्या देते हैं? क्या आपका यह कर्तव्य नहीं है कि आप ऐसा करें? भारत अभी विदेशी शासकों के कब्जे में है। क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अपनी मातृभूमि को मुक्त कराएँ?' उनके शब्दों ने मेरे अंतर्मन में धीरे से एक नया दरवाजा खोलने और मुझे आत्ममंथन की राह पर ले जाने का कार्य किया।

मुझ पर देशभक्ति का प्रारंभिक प्रभाव

शाखा में जाने और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर वरिष्ठ लोगों से चरर््चा करने का मुझ पर एक और तात्कालिक प्रभाव पड़ाउसने पुस्तकों के प्रति मेरे लगाव को एक नया पैनापन, महत्त्व और उद्देश्य प्रदान किया। मैंने भारतीय इतिहासविशेष रूप से छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और गुरु गोविंद सिंह जैसे महान् देशभक्त योध्दाओं के इतिहासकी उपलब्ध पुस्तकें पढ़नी शुरू कर दीं। एक बार मैंने प्रसिध्द ब्रिटिश इतिहासकार डेनिस किंकेड की 'द ग्रैंड रिबेल'v सहित शिवाजी पर लिखी पाँच पुस्तकें लगातार पढ़ डालीं।

मैंने बंगाल के महान् इतिहासकार जदुनाथ सरकार, जिनकी पुस्तकें मुगल साम्राज्य के पतन और उस महान् मराठा शासक के अधीन राष्ट्रीय भावना के उत्थान का विवरण प्रस्तुत करती हैं, की पुस्तकें 'औरंगजेब' और 'शिवाजी' भी पढ़ीं।

मैं सन् 1942 में संघ में सम्मिलित हुआ था। अगले वर्ष संघ शिक्षा वर्ग (ओ.टी.सी.) का प्रथम वर्ष पूरा करने के लिए मैं इंदौर गया था। वापसी में कुछ दिन राजस्थान की यात्रा करने के लिए मैंने मार्ग बदल लिया। जब से मैंने कर्नल जेम्स टॉड की दो खंडों में लिखी उन्नीसवीं शताब्दी की क्लासिक पुस्तक 'एनल्स ऐंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' पढ़ी थी, नायकों और शहीदों की इस भूमि से मुझे लगाव हो गया

एक स्वयंसेवक को संगठन में कोई जिम्मेदारी का पद दिए जाने से पहले उसे अधिकारी प्रशिक्षण वर्ग के प्रशिक्षण से गुजरना होता है। यह प्रशिक्षण संघ के मुख्यालय नागपुर में तीसरे वर्ष का कोर्स करने के बाद पूरा होता है। मैंने वर्ष 1946 में यह किया। इससे पहले मैं अपना दूसरा वर्ष अहमदाबाद में कर चुका था। इस प्रकार गुजरात से मेरी संबध्दता आरंभ हुई, जो आज तक जारी है।

मैं जब सत्रह वर्ष का था तब मैंने अपने जीवन की पहली नौकरी की थीएक शिक्षक के रूप में। मैंने कॉलेज में तीन वर्ष पूरे कर लिये थे। उन दिनों शिक्षक बनने के लिए डिप्लोमा या स्नातक की डिग्री होना आवश्यक नहीं था। तब मैं काफी छोटा था। मेरे कई विद्यार्थी लगभग मेरी ही उम्र के थे। जिस बात ने मुझे शिक्षक बनने के लिए प्रेरित किया, वह संघ से मेरी संबध्दता ही थी। संघ ने मुझे सिखाया था कि विद्यार्थियों को देशभक्ति के आदर्श हृदय में उतारना, अच्छा चरित्र विकसित करना, अपने ज्ञान का आधार समृध्द करना और समाज की सेवा के लिए एक स्वाभाविक तत्परता विकसित करना चाहिए। एक स्वयंसेवक के रूप में मेरी इच्छा थी कि अधिक-से-अधिक युवा 'शाखा' में सम्मिलित हों और संघ से संस्कार ग्रहण करें। मैंने सोचा कि एक शिक्षक का व्यवसाय दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सबसे उपयुक्त है।

 

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