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मुद्दे
विकास
विकास और आधारभूत ढांचे के बारे में आडवाणीजी के विचार

भारतीय जनता पार्टी विकास के भारतीय मॉडल के लिए एक 'ब्लू प्रिंट' तैयार करेगी

विकास के भारतीय मॉडल की  आवश्यकता क्यों है ?

  मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जिस तरह से भारत का आर्थिक विकास पहले सोवियत मॉडल से बुरी तरह प्रभावित था, अब पश्चिमी मॉडल की नकल करके पेन्डुलम के दूसरे सिरे पर लटक गया है। किसी दूसरे बाहरी मॉडल को अपनाकर भारत की मौजूदा समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है और भावी जरूरतों को भी पूरा नहीं किया जा सकता है।

मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि जिस तरह से मेरी पार्टी अर्थव्यवस्था पर राज्य के अत्यधिक नियंत्रण के खिलाफ थी, उसी तरह राज्य के आर्थिक जीवन में कोई भूमिका न रखने वाले राज्य के विचार का भी विरोध किया गया था। दूसरे शब्दों में, हमने उन्मुक्त उद्यम, ''ट्रिकल डाऊन'' सिध्दांत आदि का भी समर्थन नहीं किया। लोकतांत्रिक राष्ट्र का एक निश्चित और अनिवार्य कर्तव्य है कि वह आर्थिक विकास को वांछित सामाजिक लक्ष्यों की ओर अभिमुख करें जैसाकि भारतीय परम्परा में कहा जाता है ''बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।'' अन्तोदय (समाज के 'अंतिम' आदमी का विकास) की अवधारणा की महात्मा गांधी और पं0 दीनदयाल उपाध्याय जो उस राजनीतिक आन्दोलन के प्रमुख सिध्दांतकार तथा प्रेरणादायी मार्गदर्शक थे जिसने भारतीय जनसंघ तथा बाद में , भारतीय जनता पार्टी को जन्म दिया, ने प्रशंसा की थी।

 

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विकास
महिला सशक्तिकरण
भारतीय जनता पार्टी संसद तथा विधानमंडलाें में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग करने वाली पहली पार्टी है

महिलाओं का सर्वांगीण सशक्तीकरण बेहतर तथा अधिक न्यायोचित समाज-निर्माण का अनिवार्य एवं आंतरिक भाग है। आरक्षण की नीति के माध्यम से महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की अत्यधिक एवं अत्यावश्यक महत्ता है। भाजपा पहली पार्टी है, जिसने वर्ष 1994 में संसद् तथा राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को पारित किया था। हमारी सबसे पहली और अभी तक की अकेली पार्टी है जिसने सर्वप्रथम अपने संगठन के भीतर सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है। मेरी सहयोगी तथा असाधारण वक्ता एवं योग्य सांसद सुषमा स्वराज ने दोनों प्रस्तावों को पारित करने के लिए पार्टी को सहमत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महिलाओं के लिए आरक्षण का सीधा-सादा औचित्य यह है कि सार्वजनिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। एक पुरुष की तुलना में उन्हें दोगुनी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। यहाँ तक ऐसी महिलाओं को भी जो पुरुषों की तुलना में दोगुनी सक्षम और योग्य होती हैं। संसद्, राज्य विधायिका तथा मंत्रालयों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व मुझे अखरता है। यह इसलिए भी असमर्थनीय है कि वर्ष 1992 में 73वें एवं 74वें संवैधानिक संशोधन के बाद महिलाओं ने पंचायतों और स्थानीयशासी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर उत्कृष्ट काम किया है।

इस क्रांतिकारी उपाय के फलस्वरूप भारत में विभिन्न पंचायती राज संस्थाओं में आज लाखों महिला सदस्य हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में सहकारी निकायों तथा स्व-पोषित समूहों में महिलाएँ निर्वाचित हुई हैं। यह भारत के लिए गर्व की बात है कि बुनियादी स्तर पर लोकतांत्रिक संगठनों में भी सबसे बड़ी संख्या में महिलाएँ निर्वाचित हुई हैं। वास्तव में सर्वश्रेष्ठ रूप से कार्य कर रही कुछ पंचायतें ऐसी हैं, जहाँ महिला सरपंच हैं। इसलिए विडंबना है कि संसद् के भीतर तथा बाहर वर्षों तक बहस चलने के बाद भी संसद् और विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए कानून बनाने में राजनीतिक सर्वसम्मति का अभाव बना रहा है। जब यह क्रांतिकारी कानून वास्तविकता का रूप लेगा, वह दिन भारत के लिए गर्व एवं खुशी का दिन होगा।

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
'राम सेतु' पर विवाद के बारे में आडवाणीजी के विचार

''सितंबर 2007 में 'रामसेतु' के मामले में हिंदू भावनाओं को उस समय गहरी ठेस पहुँची जब तमिलनाडु के पास सेतु समुद्रम शिप कैनाल परियोजना में 'रामसेतु' पर निरंतर छिड़s विवाद में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत हलफनामे में दावा किया कि भगवान् राम का कोई अस्तित्व ही नहीं था तथा 'रामायण' का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। इसपर और नमक छिड़कते हुए सत्तारूढ़ गठबंधन की एक पार्टी के नेता ने भगवान् राम के बारे में और भी ज्यादा अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। देश के सर्वोच्च न्यायालय में हिंदुओं को आघात पहुँचानेवाला हलफनामा पेश करके कांग्रेस पार्टी तथा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने विश्व भर के करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहँचाई है। पंथनिरपेक्षता का दावा करनेवाली सरकार का हिंदुओं की श्रेष्ठतम भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना, उन्हें तुच्छ या कूड़ा-करकट समझना, ईश-निंदा तथा अनधिकार चेष्टा, असंवेदनशीलता एवं उद्दंडता है। विविध दायरों में सरकार ने वह सब नकार दिया, जिसे हिंदू अपने धर्म में पवित्र, पावन समझते आ रहे हैं।'

मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, 'मैं यह बताना चाहूँगा कि 'महाभारत' के साथ 'रामायण' को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सभी महान् नेताओंमहात्मा गांधी से लेकर लोकमान्य तिलक एवं जवाहरलाल नेहरू से लेकर सरदार पटेल तकने भारत की राष्ट्रीय संस्कृति एवं अस्मिता की आधारशिला स्वीकार किया है। इसे मात्र पौराणिकता एवं कोरी कल्पना बताकर सरकार ने भारत के बारे में बने विचार को क्षत-विक्षत किया तथा हमारे प्राचीन राष्ट्र की सभ्यता की दृष्टि से पहचान के बारे में नए सिरे से सिखाने की कोशिश की।'

यद्यपि सरकार ने शीघ्रतापूर्वक इस निंदनीय हलफनामे को वापस ले लिया था, फिर भी इसने हिंदू संगठनों तथा धार्मिक नेताओं की यह माँग स्वीकार नहीं की है कि उस परियोजना का परित्याग कर दे, जिसमें 'रामसेतुÓ को नष्ट करने पर विचार किया जा रहा है।''

विकास
सामाजिक न्याय, समानता और हिन्दू समाज में सुधार

"भारत के सर्वांगीण विकास और राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विषय हिंदू समाज का सुधार एवं आत्म-उध्दार है। हिंदू धर्म मानव विकास और ईश्वर की प्राप्ति की शिक्षा का स्रोत है। इसका दर्शन गूढ़ है तथा इसके सिध्दांतों की प्रासंगिकता शाश्वत एवं सार्वदेशीय है। इसकी विलक्षण विशेषता कट्टर धर्म सिध्दांत का अभाव है; किसी एक पर अंतिम सत्य की मुहर लगाए बिना सभी रूपों में सत्य को स्वीकार करने, ग्रहण करने की तत्परता, शुध्द व पवित्र जीवन जीकर मानव-विकास के उच्चतर सोपान पर पहुँचने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसमें बुध्दिजीवी, वैचारिक और दार्शनिक विषयों के मामलों में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बेमेल है। यहाँ तक कि ईश्वर का अस्तित्व न मानने वाले चार्वाक का भी 'ऋषि' के रूप में आदर किया जाता है, क्योंकि उनके पास भी ज्ञान था। चूँकि हिंदू धर्म में समस्त जड़-चेतन में ईश्वर को देखने का उपदेश दिया जाता है, इसलिए हिंदू धर्म की विचारधारा में मनुष्यों की समानता की अवधारणा अंतर्गुंफित है। भगवद्गीता में इस विचार पर जोर दिया गया है कि व्यक्ति की महानता उसके कर्म से सुनिश्चित होती है, न कि जन्म से।

इसके बावजूद अनेक ऐतिहासिक कारणों से हिंदू समाज में कुछ नकारात्मक, ह्रासकारी तत्त्व तथा ऐसी बुराइयाँ आ गई हैं, जिनका समर्थन नहीं किया जा सकता। और इन कमियों पर अभी पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका है। जातिगत ऊँच-नीच की अवधारणा, विशेषत: कुछ जातियों को अछूत समझने की आदत, सबसे बड़ा दोष रहा है। अनेक रूपों में अन्याय जो प्राय: महिलाओं के प्रति किया जाता है, अन्य कमी है। इसे बरदाश्त नहीं किया जा सकता या किसी भी आधार पर इसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इससे भारतीय संविधान के आदर्शों का उल्लंघन होता है। यह अनेक सहस्राब्दियों से हिंदू धर्म के जीवन का मार्गदर्शन करनेवाले आध्यात्मिक सिध्दांतों के भी प्रतिकूल है। जब तक अपने भीतर विद्यमान बुराइयों से संघर्ष नहीं किया जाता, तब तक हिंदू समाज पुन: जीवन शक्ति प्राप्त नहीं कर सकता या पूर्णरूपेण प्रगति नहीं कर सकता। ''

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
पंथनिरपेक्षता बनाम छद्म-निरपेक्षता

भगवान राम और बाबर की तुलना

''अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का निकट संबंध विकृत पंथनिरपेक्षतावाद से है। यह भी कहा जा सकता है कि विकृत पंथनिरपेक्षता ही अल्पसंख्यकवाद का औचित्य स्थापित करती है। इसकी व्याख्या इस प्रकार से की जा रही है तथा इसे इस प्रकार से व्यवहार में लाया जा रहा है कि भारत की संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से बनी पहचान को नकारा जा रहा है। मैंने अयोध्या आंदोलन के संदर्भ में विस्तारपूर्वक इस मुद्दे पर विचार किया है, जहाँ पंथनिरपेक्षता के नाम पर भगवान् राम और बाबर को समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया गया तथा रामजन्मभूमि से जुड़ी करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं की घोर उपेक्षा की गई। 'क्या आप सिध्द कर सकते हैं कि राम ठीक इसी स्थान पर पैदा हुए थे?' कम्युनिस्ट बुध्दिजीवियों ने अपमानजनक लहजे में पूछा, जबकि हिंदू-इतर समुदाय से संबंधित विवाद के मामले में वे ऐसा कदापि नहीं कर सकते।

वर्ष 1987 में हिंदी पत्र 'वामा' में साक्षात्कार देते समय मैंने कहा था कि यदि बाबर के साथ भारतीय मुसलमानों का कोई वर्ग तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास करता है तो यह ठीक वैसे ही होगा जैसे दिल्ली के ईसाई इस आधार पर महात्मा गांधी की मूर्ति की जगह जॉर्ज पंचम की मूर्ति स्थापित करने के लिए झगड़ा करें कि जॉर्ज पंचम ईसाई था। अब गांधीजी धर्म की दृष्टि से हिंदू हो सकते हैं, लेकिन वे पूरे देश से जुड़े थे, जबकि जॉर्ज पंचम नहीं। इसी प्रकार, राम इस देश के हैं, चाहे हम उन्हें पौराणिक नायक कहें या ऐतिहासिक पात्र। यहाँ तक कि इतिहास और संस्कृति के मुद्दे पर मैं इस देश के मुस्लिम नेताओं से यह अनुरोध करना चाहूँगा कि यदि इंडोनेशिया के मुसलमान राम और 'रामायण' पर गर्व अनुभव कर सकते हैं तो भारतीय मुसलमान क्यों नहीं?''

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सु-शासन
आम सहमति की राजनीति

भारतीय जनता पार्टी के लिए कांग्रेस विपक्षी दल है न कि 'शत्रु'

हमारा फलता-फूलता बहुदलीय लोकतंत्र है। हमारे राजनीतिक तंत्र की विविधता में शक्ति तथा जीवंतता का स्रोत निहित है। चूँकि कांग्रेस पार्टी का भौगोलिक दृष्टि से देश भर से प्रभुत्व का दौर लगभग समाप्त हो चुका है, इसलिए भारत की समकालिक राजनीति का विन्यास अनिवार्यत: दो शक्तियों पर टिक गया हैराष्ट्रीय स्तर पर भाजपा तथा कांग्रेस पार्टी दो प्रमुख एवं स्थायी केंद्र बन गए हैं। इन दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों के अलावा विशिष्ट क्षेत्रीय या सामाजिक आकांक्षाओं से पहचानी जानेवाली अन्य अनेक पार्टियाँ भी हैं। केंद्र तथा अनेक राज्यों में मिली-जुली सरकार का गठन समय की माँग बन गई है। कुछ भागीदार समय-समय पर अपना गठबंधन बदलते भी रहते हैं।

पिछले दो दशकों में इस विकास के कारण राज्य व्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौती खड़ी हो गई है। यह किस प्रकार से सुनिश्चित किया जाए कि बहुदलीय प्रणाली में, उसकी अच्छाइयों और बुराइयों के बावजूद, मूल एकता तथा प्रयोजन की निरंतरता कायम रह सकती है? स्वाभाविक है, इस संबंध में क्षेत्रीय या प्रांतीय पार्टियों की तुलना में राष्ट्रीय पार्टियाँ अधिक उत्तरदायी हैं। इसलिए सभी पार्टियों ने बुनियादी स्तर पर सर्वसम्मति तथा अनिवार्यत: दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों के बीच सर्वसम्मति की परम आवश्यकता है। यह स्वाभाविक है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच मतभेद (अन्य पार्टियों के बीच भी) बने रहेंगे, क्योंकि ये अलग विचारधाराओं का प्रचार करते हैं तथा विकास के अलग-अलग मार्गों का अनुसरण करते हैं। इसके बावजूद दोनों के लिए संभव है, तथा आवश्यक भी है, कि व्यापक राष्ट्रीय महत्तावाले मुद्दों पर सहयोग की संभावनाओं का पता लगाया जाए और ऐसे क्षेत्र को और बढ़ाया जाए। इसके लिए यह अनिवार्य है कि सभी पार्टियों में परस्पर तनाव की जगह सहयोग की भावना विकसित हों और बुनियादी स्तर तक परस्पर संवाद बना रहे, जिसका प्रतियोगी चुनावी राजनीति के संकीर्ण विचारों की दृष्टि से त्याग नहीं किया जा सकता।

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विकास
गरीबी के अभिशाप से भारत की मुक्ति पर आडवाणी जी के विचार

समकालीन भारतीय वास्तविकता के दो पहलू

''आज जब भारत आर्थिक उपलब्धियों को लेकर उच्च विश्व रैंकिंग प्राप्त करने के लिए तैयार खड़ा है, घोर गरीबी हटाना एवं करोड़ों नागरिकों को जीवन-यापन का समुचित स्तर प्रदान करना उसकी सबसे बड़ी चुनौतियाँ बन रही हैं। निस्संदेह इस सत्य की पहचान करते हुए तथा उसे स्वीकार करते हुए इस तथ्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि हाल ही के दशकों में बड़ी संख्या में लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने में सफलता मिली है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता का केवल एक निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना उचित नहीं है। वास्तव में, आर्थिक सुधार से कतिपय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से वृध्दि के कारण भारत समृध्दि के पथ पर अग्रसर है।

साथ-ही-साथ हमें वर्तमान भारतीय वस्तुस्थिति के नकारात्मक पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी का शिकार है। समान रूप से अमीर और गरीब के बीच, शहरों तथा गाँवों के बीच तेजी से बढ़ती खाई भी चिंताजनक है। इसके कारण गाँवों को छोड़कर लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं, जो प्रक्रिया वर्ष 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद अधिक तीव्र हुई है। विकास की प्रक्रिया में क्षेत्रीय विषमताओं से समस्या और अधिक दुरूह हो गई है, जहाँ उत्तरी और पूर्वी राज्य दक्षिण और पश्चिम के राज्यों से काफी पीछे रह गए हैं।

मानव संसाधन भारत की बहुमूल्य संपदा है। तथापि मानव संसाधन तभी उपयोगी हो सकता है, जब रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार तथा उत्तम प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश जैसी बुनियादी जरूरतें सबके लिए पूरी हों। यदि देश में मानव संसाधन का बहुत बड़ा भाग गरीब है तो कोई भी देश समृध्द नहीं हो सकता। मुझे हमेशा इस बात पर आश्चर्य होता है, यदि भारत अपनी एक-तिहाई भली प्रकार से रह रही आबादी के बल पर इतनी उपलब्धि हासिल कर सकता है तो जब सभी मानव संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग होगा, तब यह देश कहाँ पहुँच जाएगा? कितनी ऊँचाइयों को छू लेगा? इसीलिए हाल में मैं एक बिंदु पर बार-बार बल दे रहा हूँ मेरे लिए 'भारत उदय' का अर्थ है प्रत्येक भारतीय का उदय। मेरे लिए विकसित देश के रूप में भारत अभ्युदय का अर्थ है प्रत्येक भारतीय का सर्वांगीण विकास।

क्या यह संभव है? हाँ, ऐसा हो सकता है क्या, हम भारत में गरीबी को इतिहास का वृत्तांत बना सकते हैं? हाँ, हम ऐसा कर सकते हैं। मेरे विचार में, इस प्रयास में सफलता की कुंजी मात्र भली प्रकार से तैयार की गई नीतियाँ एवं कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि अच्छा और ईमानदार शासन है। नीतियों आदि का महत्त्व अवश्य है। हमें चाहिए उद्यमिता को बढ़ावा देनेवाली अच्छी नीतियाँ। हमें चाहिए श्रेष्ठ गुणवत्ता को भौतिक तथा सामाजिक बुनियादी संरचना। हमें चाहिए विशेष रूप से अपनी कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान डालने के लिए आवश्यक उपाय। कृषि के बाद सबसे ज्यादा संख्या में लोगों को रोजगार देनेवाले असंगठित तथा अनौपचारिक क्षेत्र में जीवंत स्पंदन लाना अत्यावश्यक बन गया है। हमें सभी के लिए सभी स्तरों पर गुणात्मक शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी। हमें समुचित वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय संसाधनों का इस्तेमाल करके ज्ञान तथा व्यवहार के अग्रणी क्षेत्रों में देशीय क्षमताओं का सृजन करना होगा। हमें अपने पर्यावरण में हो रहे ह्रास को रोकना है, जिसके प्रति हमारी प्राचीन संस्कृति हमें आदर सम्मान करने के लिए उद्बोधित करती है। हमें ऐसे अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए, जो तेजी से परिवर्तनशील विश्व में उत्पन्न हो रहे हैं तथा ऐसा करते समय हमें ग्लोबलाइजेशन (भूमंडलीकरण) के नकारात्मक प्रभावों से स्वयं को बचाना है।

यह भी सत्य है कि हमें समग्र विकास ही नहीं करना बल्कि समग्र सुरक्षा भी सुनिश्चित करना है। हमारी सुरक्षा की अवधारणा में भारत की बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षाअर्थात् देश की सुरक्षा और आम आदमी की सुरक्षादोनों सम्मिलित होनी चाहिए। विश्वसनीय एवं व्यापक सुरक्षा के बिना विकास ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के रूप में हमारी उत्तरजीविता को भी खतरा होगा।''

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
हिन्दुत्व

 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की अवधारणा में भारत के विभिन्न धर्म अनुयायियों को यह आदेश दिया गया है कि विविधताओं को कायम रखते हुए प्राचीन देश की साझा संस्कृति का आदर करो, गर्व महसूस करो। अन्य राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखी जाए, न ही अन्य धर्मों को झूठा या हीन समझें, बल्कि यह सीखें कि प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषताएँ हैं। छल-कपट से, धर्मांतरण के माध्यम से अपने धर्मानुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न करें। अलगाववाद के प्रचार के प्रयोजन के लिए या धर्मतंत्र की स्थापना के लिए राजनीतिक वर्चस्व प्राप्त करने की कोशिश न करें। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का अर्थ इससे न ज्यादा है, न इससे कम।'

सैमुअल हंटिग्टन की पुस्तक ''हू आर वी?'' का मैंने यह सुझाव देने के लिए उल्लेख किया है कि सभी भारतीयों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए, 'हम कौन हैं?' अमेरिका से भिन्न हमारा राष्ट्र प्राचीन है। इसका इतिहास मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव से प्रारंभ होता है। अमेरिका के विपरीत, हमारी अधिकांश जनसंख्या सदियों से भारत में ही रहतh आ रहh है। जनसंख्या के किसी वर्ग की धार्मिक पहचान बदलने से राष्ट्र की पहचान नहीं बदल सकती। भारत के इतिहास में कभी यहाँ के किसी वर्ग का सामूहिक संहार नहीं किया गया, जैसा अमेरिका में वहाँ के मूल निवासियों के संदर्भ में हुआ। इसलिए यदि चार सौ वर्षों में अमेरिका की भावना वहाँ के लोगों को एकसूत्र में बाँध सकती है तो निश्चित रूप में अधिक संतुलित, दृढ़ तथा अंतर्भूत मानवतावादी 'भारतीयता' की भावना भी हजारों वर्षों से रह रहे विभिन्न धार्मिक, जातीय, भाषायी तथा नस्लीय समूहों को एकता के सूत्र में बाँध सकती है। चूँकि 'इंडियन' शब्द हाल ही की नई विचारधारा पर आधारित है, इसलिए एकीकरण का सिध्दांत 'हिंदुत्व' ही है। उदार विचारों से परिपूर्ण, सहनशील, बहुवादी तथा व्यापक भारतीय परंपरा का यह पर्यायी नाम है। यदि भारत को अ-हिंदु किया गया तो भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।

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सु-शासन
लोकतंत्र की रक्षा करने में भारत के गौरवपूर्ण रिकार्ड पर आडवाणीजी के विचार

यह इस पृष्ठभूमि से भिन्न है कि मैं भारत की लोकतांत्रिक परम्परा और संघर्ष समाधान हेतु हमारे दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रस्तुत करना चाहता हूॅ। यह परम्परा और दृष्टिकोण मौलिक रुप से हिन्दू-दर्शन और सांस्कृतिक लोकाचारों से प्रभावित हैं। हमारी सभ्यता के प्रारंभ से ही हिन्दू-दर्शन अपने दृष्टिकोण और शिक्षाओं में बहुलतावादी रहा है। इसके फलस्वरुप, अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली में भारत अन्तर्निहित रुप से अकेला ही एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने आदर्शो एवं सिध्दांतों को दूसरे राष्ट्रों पर थोपना नहीं चाहता। इसीलिए भारत ने अपने हजारों साल के इतिहास में अपनी सेनाओं को दूसरे देश की भूमि जीतने और वहॉ के मूल निवासियों अथवा संस्कृतियों को मिटाने अथवा कुचलने के लिए कभी नहीं भेजा।

बहुलवाद में विश्वास रखने और दूसरे के मत एवं विचारों का आदर करने के कारण ही भारत ने आजादी हासिल करने के बाद स्वाभाविक तौर पर लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षवाद को स्वीकार किया। हमने यह मंत्र पश्चिम देशों से हासिल नहीं किया। आप स्वयं से एक साधारण सा प्रश्न पूछिए : ऐसा क्यों है कि भारत जैसे विशाल और विभिन्नताओं वाले देश जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीब और कम पढ़ा लिखा हुआ है, में सेना का कभी-भी वर्चस्व नहीं रहा। कभी-भी हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है? भारत नियमित चुनाव कराने में कैसे सफल रहा है, जोकि हमेशा निष्पक्ष हुए और जिनके नतीजे हमेशा सभी राजनैतिक दलों ने स्वीकार किए है?

हॉ आपातकाल के दौरान लोकतंत्र का कुछ हनन अवश्य हुआ था, लेकिन जनता ने आपातकाल के विरुध्द इतने आक्रोश में मतदान किया कि इन्दिरा गांधी जैसी कद्दावर नेता को भी पराजय का मुॅह देखना पड़ा था।

सु-शासन
नेतृत्व

नेतृत्व, नेतागिरी से भिन्न

'लीडरशीप' आम इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है लेकिन इसके कई अर्थ भी हैं जो संदर्भ और नेतृत्व के स्वरूप पर निर्भर करते हैं। हमारे समाज में लीडरशीप या 'नेतृत्व' को विशेषकर आधुनिक समाज में आमतौर पर 'राजनीतिक नेतृत्व' के रुप में समझा जाता है। इसलिए नेता को प्राय: एक राजनीतिक नेता समझा जाता है।

नेतागिरी आज के भारत की वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया में एक व्यापक प्रचलित शब्द है। हालांकि यह नेतृत्व से बिल्कुल अलग है। नेतृत्व अपने समर्थकों का एक समूह जुटाकर किसी कठिन कार्य को पूरा करने हेतु अपनी दूरदृष्टि, पक्के इरादे और योग्यता के सकारात्मक गुणाेंं के सम्मिश्रण का आभास देता है।

इसके विपरीत, जनता के मन में नेताओं के बारे में धारणा बहुत सकारात्मक नहीं है। साथ ही, भारत में राजनीतिक नेताओं को निजी तौर पर जो बहुत अधिक सम्मान और महत्व मिलता है, वह वास्तविकता से ज्यादा होता है। राजनीतिक नेताओं को गैर-अनुपातिक तौर पर मिलने वाला यह सम्मान और महत्व वस्तुत: राष्ट्रीय जीवन के अन्य क्षेत्रों के नेताओं के लिए अपेक्षित सम्मान की कीमत पर मिलता है।

नेतृत्व एक आम अवधारणा है जो राजनीति तक ही सीमित नहीं है बल्कि नेतृत्व की आवश्यकता व्यावहारिक तौर पर सामाजिक प्रगति, राष्ट्र-निर्माण, मानव जाति के कल्याण हेतु मानवीय प्रयासों के प्रत्येक क्षेत्र में होती है।

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
अल्पसंख्यकवाद की राजनीति

सकारात्मक सोच रखनेवाले इस देश के लोगों, इनमें विचारशील कांग्रेसी भी शामिल हैं, से मेरा अनुरोध है कि अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के विरुध्द वे आवाज उठाएँ। चूँकि भारत मजहब आधारित राज्य नहीं है, इसलिए विभिन्न आस्थाओं पर आधारित समुदायों की पहचान और मजहबी अधिकार, जिससे वृहत्त भारतीय परिवार बनता है, को अवश्य ही संरक्षित किया जाना चाहिए। लेकिन 'बहुसंख्यक' और 'अल्पसंख्यक' धारणाओं का हमारे देश की राजनीति तथा शासन-पध्दति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इन धारणाओं का दुरुपयोग वोटबैंक की राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए। यह विभाजक मानसिकता भारत की संयुक्त एकता और सामंजस्यपूर्णता को खतरे में डालती है। ब्रिटिश शासकों के समान 'कांग्रेस पार्टी अपने स्वार्थों की खातिर' अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर राष्ट्र को निरंतर बाँट रही है।

 

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