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विदेश मामले
भारत और पाकिस्तान के बीच मैत्री सम्बन्धों पर आडवाणीजी के विचार
विभाजन (1947), तीन युध्द (1947-48, 1965, 1971), शिमला समझौता (1972), लाहौर घोषणा-पत्र (1999), कारगिल युध्द (1999), असफल आगरा शिखर र्वात्ता (2001), इस्लामाबाद संयुक्त वक्तव्य (2004), लगातार जारी सीमा पार आतंकवाद... क्या भारत और पाकिस्तान के बीच वैर-भाव को दूर कर स्थायी शांति और सद्भावपूर्ण सहयोग तथा अच्छे पड़ोसी जैसे संबंध स्थापित नहीं हो सकते? क्या हमारे आपसी संबंध अतीत की तरह कटु ही बने रहेंगे? क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को बेहतर भविष्य नहीं दे सकते या फिर क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है? मैं समझता हूँ कि यह हमारा कर्तव्य बनता है और हमें ऐसा करना ही चाहिए।
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भारत-बांग्लादेश सम्बन्ध
बंगलादेश से अवैध घुसपैठियों के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के अभियान से भारत और बंगलादेश जिनका साझा इतिहास उनके मध्य उभरे कुछ मतभेदों को भुलाने के लिए काफी महत्वपूर्ण है, के बीच मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगी सम्बन्धों में, दोनों देशों के हित में, किसी भी रूप में कमी नहीं आयेगी। भूगोल, इतिहास और विकास की कई बातें बताती हैं कि भारत और बंगलादेश ने दो समान और सार्वभौमिक भागीदारों के बीच एक परस्पर लाभकारी द्विपक्षीय सम्बंध बनाये। बंगलादेश तीन ओर से भारत से घिरा हुआ है। इसके सभ्यतात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास की जड़ें भारत के साथ साझी हैं। वस्तुत: बंगलादेश का भाग्य मध्य-पूर्व से ज्यादा भारत के भाग्य से ज्यादा घनिष्ट रुप से जुड़ा हुआ है।
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भारत-चीन सम्बन्ध

यह खुशी की बात है कि हाल के दशकों में भारत और चीन के बीच संबंध तेजी से सुधर रहे हैं। एक गौरवशाली भविष्य एशिया में शांति व स्थिरता को बढ़ावा देने तथा विश्व में सामान्य जन-जीवन को समृध्द बनाने हेतु दुनिया की इन दो प्राचीन सभ्यताओं को मिलकर आपसी सहयोग के मार्ग पर चलने का आह्वान कर रहा है। मेरा खयाल है कि अब दोनों देशों को सीमा विवाद को निष्पक्षता एवं आपसी सौहार्द तथा वस्तुस्थिति के आधार पर तत्काल हल करने की आवश्यकता और महत्त्व को स्वीकार करना चाहिए।

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भारत-अमेरिकी समझौते के बारे में आडवाणी जी के विचार

अमेरिका के साथ स्टे्रटेजिक भागीदारी, मगर समान शर्तों पर

प्रधानमंत्री के विरूध्द मेरा यह आरोप है कि उन्होंने दो सम्प्रभु राष्ट्रों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते को दो व्यक्तियों - स्वयं तथा राष्ट्रपति बुश के बीच सीमित कर दिया। उन्होंने इस भागीदारी में एक तरह से कनिष्ठ भागीदार के रूप में व्यवहार किया है।

वास्तव में, परमाणु समझौते के मूल पाठ और संदर्भ ने शुरू से ही भारतीयों कों यह आभास दिलाया है कि यू.पी.ए. सरकार विश्व-व्यवस्था में भारत की कमजोर स्थिति को स्वीकार करना चाहती है।

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