Homearrow मुद्दे arrow विकास
विकास
भारत में अमीर और गरीब के बीच खाई के बारे में आडवाणीजी के विचार
Read more...
बच्चों के पोषाहार के बारे में आडवाणीजी के विचार
Read more...
सामाजिक न्याय, समानता और हिन्दू समाज में सुधार
Read more...
सूचना प्रौद्योगिकी के बारे में आडवाणीजी के विचार
Read more...
पर्यावरण पर आडवाणीजी के विचार

मुझे कोई संदेह नहीं है कि यदि समाज और राज्य द्वारा संयुक्त रूप से दृढ़ व सतत प्रयास किया जाए तो पवित्र गंगा को उसकी प्राचीन शुध्दता प्रदान की जा सकती है। हालाँकि इस लक्ष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने में वर्षों लग सकते हैं, लेकिन यह महायज्ञ करना उपयोगी होगा। वास्तव में हमारा दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए भारत की सभी नदियों, झीलों और जल निकायों को प्रदूषण-मुक्त करना; क्योंकि वे केवल हमारे देश के विकास की जीवन-रेखा ही नहीं हैं, बल्कि भारत की प्राचीन एवं गौरवपूर्ण सभ्यता के संकेत और संवाहक भी हैं।''

Read more...
शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के बारे में आडवाणीजी के विचार
शिक्षा और स्वास्थ्य-सेवा में 'स्वर्णिम चतुर्भुज' वह क्षेत्र है जिसमें हमारा सबसे अधिक ध्यान शिक्षा के सभी क्षेत्रों में अवसरों के व्यापक विस्तार पर रहेगा। मेरा मानना है कि यह क्षेत्र आर्थिक वृध्दि को सर्वव्यापी और सतत् बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यदि हम आज भारत में शैक्षणिक परिदृश्य को देखें, तो पाते हैं कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से लाइसेंस-कोटा-परमिट राज आंशिक रूप से या पूरी तरह से समाप्त हो गया है, मगर शैक्षणिक क्षेत्र में यह न केवल मौजूद है अपितु फल-फूल भी रहा है-विशेषकर उच्च और व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में। एक अध्ययन के अनुसार ''इस समय शिक्षा प्रणाली एक ओर सरकार के अत्यधिक नियंत्रण और दूसरी ओर भेदमूलक निजीकरण के बीच फंसी हुई है जिससे इस क्षेत्र में सही ढंग से निजी पूंजी जुटाई नहीं जा पा रही है।'' पहला, शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न नियामक संस्थाएँ न केवल भ्रष्ट और अत्यधिक नौकरशाही वाली बन गई हैं अपितु वास्तव में वे भारत में शैक्षिक आधारभूत ढांचे के विकास में अवरोधक भी बन गई हैं। हमें सुधार के तेज हथियार से अनावश्यक नियंत्रण की प्रत्येक परत को हटाना है, साथ ही हरेक विनियमन को मजबूत बनाना है ताकि शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता बढ़ाई जा सके और जवाबदेही निर्धारित की जा सके।
Read more...
विकास और आधारभूत ढांचे के बारे में आडवाणीजी के विचार

भारतीय जनता पार्टी विकास के भारतीय मॉडल के लिए एक 'ब्लू प्रिंट' तैयार करेगी

विकास के भारतीय मॉडल की  आवश्यकता क्यों है ?

  मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जिस तरह से भारत का आर्थिक विकास पहले सोवियत मॉडल से बुरी तरह प्रभावित था, अब पश्चिमी मॉडल की नकल करके पेन्डुलम के दूसरे सिरे पर लटक गया है। किसी दूसरे बाहरी मॉडल को अपनाकर भारत की मौजूदा समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है और भावी जरूरतों को भी पूरा नहीं किया जा सकता है।

मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि जिस तरह से मेरी पार्टी अर्थव्यवस्था पर राज्य के अत्यधिक नियंत्रण के खिलाफ थी, उसी तरह राज्य के आर्थिक जीवन में कोई भूमिका न रखने वाले राज्य के विचार का भी विरोध किया गया था। दूसरे शब्दों में, हमने उन्मुक्त उद्यम, ''ट्रिकल डाऊन'' सिध्दांत आदि का भी समर्थन नहीं किया। लोकतांत्रिक राष्ट्र का एक निश्चित और अनिवार्य कर्तव्य है कि वह आर्थिक विकास को वांछित सामाजिक लक्ष्यों की ओर अभिमुख करें जैसाकि भारतीय परम्परा में कहा जाता है ''बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।'' अन्तोदय (समाज के 'अंतिम' आदमी का विकास) की अवधारणा की महात्मा गांधी और पं0 दीनदयाल उपाध्याय जो उस राजनीतिक आन्दोलन के प्रमुख सिध्दांतकार तथा प्रेरणादायी मार्गदर्शक थे जिसने भारतीय जनसंघ तथा बाद में , भारतीय जनता पार्टी को जन्म दिया, ने प्रशंसा की थी।

 

Read more...
महिला सशक्तिकरण
भारतीय जनता पार्टी संसद तथा विधानमंडलाें में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग करने वाली पहली पार्टी है

महिलाओं का सर्वांगीण सशक्तीकरण बेहतर तथा अधिक न्यायोचित समाज-निर्माण का अनिवार्य एवं आंतरिक भाग है। आरक्षण की नीति के माध्यम से महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की अत्यधिक एवं अत्यावश्यक महत्ता है। भाजपा पहली पार्टी है, जिसने वर्ष 1994 में संसद् तथा राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को पारित किया था। हमारी सबसे पहली और अभी तक की अकेली पार्टी है जिसने सर्वप्रथम अपने संगठन के भीतर सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है। मेरी सहयोगी तथा असाधारण वक्ता एवं योग्य सांसद सुषमा स्वराज ने दोनों प्रस्तावों को पारित करने के लिए पार्टी को सहमत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महिलाओं के लिए आरक्षण का सीधा-सादा औचित्य यह है कि सार्वजनिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। एक पुरुष की तुलना में उन्हें दोगुनी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। यहाँ तक ऐसी महिलाओं को भी जो पुरुषों की तुलना में दोगुनी सक्षम और योग्य होती हैं। संसद्, राज्य विधायिका तथा मंत्रालयों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व मुझे अखरता है। यह इसलिए भी असमर्थनीय है कि वर्ष 1992 में 73वें एवं 74वें संवैधानिक संशोधन के बाद महिलाओं ने पंचायतों और स्थानीयशासी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर उत्कृष्ट काम किया है।

इस क्रांतिकारी उपाय के फलस्वरूप भारत में विभिन्न पंचायती राज संस्थाओं में आज लाखों महिला सदस्य हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में सहकारी निकायों तथा स्व-पोषित समूहों में महिलाएँ निर्वाचित हुई हैं। यह भारत के लिए गर्व की बात है कि बुनियादी स्तर पर लोकतांत्रिक संगठनों में भी सबसे बड़ी संख्या में महिलाएँ निर्वाचित हुई हैं। वास्तव में सर्वश्रेष्ठ रूप से कार्य कर रही कुछ पंचायतें ऐसी हैं, जहाँ महिला सरपंच हैं। इसलिए विडंबना है कि संसद् के भीतर तथा बाहर वर्षों तक बहस चलने के बाद भी संसद् और विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए कानून बनाने में राजनीतिक सर्वसम्मति का अभाव बना रहा है। जब यह क्रांतिकारी कानून वास्तविकता का रूप लेगा, वह दिन भारत के लिए गर्व एवं खुशी का दिन होगा।

Read more...
सामाजिक न्याय, समानता और हिन्दू समाज में सुधार

"भारत के सर्वांगीण विकास और राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विषय हिंदू समाज का सुधार एवं आत्म-उध्दार है। हिंदू धर्म मानव विकास और ईश्वर की प्राप्ति की शिक्षा का स्रोत है। इसका दर्शन गूढ़ है तथा इसके सिध्दांतों की प्रासंगिकता शाश्वत एवं सार्वदेशीय है। इसकी विलक्षण विशेषता कट्टर धर्म सिध्दांत का अभाव है; किसी एक पर अंतिम सत्य की मुहर लगाए बिना सभी रूपों में सत्य को स्वीकार करने, ग्रहण करने की तत्परता, शुध्द व पवित्र जीवन जीकर मानव-विकास के उच्चतर सोपान पर पहुँचने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसमें बुध्दिजीवी, वैचारिक और दार्शनिक विषयों के मामलों में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बेमेल है। यहाँ तक कि ईश्वर का अस्तित्व न मानने वाले चार्वाक का भी 'ऋषि' के रूप में आदर किया जाता है, क्योंकि उनके पास भी ज्ञान था। चूँकि हिंदू धर्म में समस्त जड़-चेतन में ईश्वर को देखने का उपदेश दिया जाता है, इसलिए हिंदू धर्म की विचारधारा में मनुष्यों की समानता की अवधारणा अंतर्गुंफित है। भगवद्गीता में इस विचार पर जोर दिया गया है कि व्यक्ति की महानता उसके कर्म से सुनिश्चित होती है, न कि जन्म से।

इसके बावजूद अनेक ऐतिहासिक कारणों से हिंदू समाज में कुछ नकारात्मक, ह्रासकारी तत्त्व तथा ऐसी बुराइयाँ आ गई हैं, जिनका समर्थन नहीं किया जा सकता। और इन कमियों पर अभी पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका है। जातिगत ऊँच-नीच की अवधारणा, विशेषत: कुछ जातियों को अछूत समझने की आदत, सबसे बड़ा दोष रहा है। अनेक रूपों में अन्याय जो प्राय: महिलाओं के प्रति किया जाता है, अन्य कमी है। इसे बरदाश्त नहीं किया जा सकता या किसी भी आधार पर इसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इससे भारतीय संविधान के आदर्शों का उल्लंघन होता है। यह अनेक सहस्राब्दियों से हिंदू धर्म के जीवन का मार्गदर्शन करनेवाले आध्यात्मिक सिध्दांतों के भी प्रतिकूल है। जब तक अपने भीतर विद्यमान बुराइयों से संघर्ष नहीं किया जाता, तब तक हिंदू समाज पुन: जीवन शक्ति प्राप्त नहीं कर सकता या पूर्णरूपेण प्रगति नहीं कर सकता। ''

Read more...
गरीबी के अभिशाप से भारत की मुक्ति पर आडवाणी जी के विचार

समकालीन भारतीय वास्तविकता के दो पहलू

''आज जब भारत आर्थिक उपलब्धियों को लेकर उच्च विश्व रैंकिंग प्राप्त करने के लिए तैयार खड़ा है, घोर गरीबी हटाना एवं करोड़ों नागरिकों को जीवन-यापन का समुचित स्तर प्रदान करना उसकी सबसे बड़ी चुनौतियाँ बन रही हैं। निस्संदेह इस सत्य की पहचान करते हुए तथा उसे स्वीकार करते हुए इस तथ्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि हाल ही के दशकों में बड़ी संख्या में लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने में सफलता मिली है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता का केवल एक निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना उचित नहीं है। वास्तव में, आर्थिक सुधार से कतिपय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से वृध्दि के कारण भारत समृध्दि के पथ पर अग्रसर है।

साथ-ही-साथ हमें वर्तमान भारतीय वस्तुस्थिति के नकारात्मक पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी का शिकार है। समान रूप से अमीर और गरीब के बीच, शहरों तथा गाँवों के बीच तेजी से बढ़ती खाई भी चिंताजनक है। इसके कारण गाँवों को छोड़कर लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं, जो प्रक्रिया वर्ष 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद अधिक तीव्र हुई है। विकास की प्रक्रिया में क्षेत्रीय विषमताओं से समस्या और अधिक दुरूह हो गई है, जहाँ उत्तरी और पूर्वी राज्य दक्षिण और पश्चिम के राज्यों से काफी पीछे रह गए हैं।

मानव संसाधन भारत की बहुमूल्य संपदा है। तथापि मानव संसाधन तभी उपयोगी हो सकता है, जब रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार तथा उत्तम प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश जैसी बुनियादी जरूरतें सबके लिए पूरी हों। यदि देश में मानव संसाधन का बहुत बड़ा भाग गरीब है तो कोई भी देश समृध्द नहीं हो सकता। मुझे हमेशा इस बात पर आश्चर्य होता है, यदि भारत अपनी एक-तिहाई भली प्रकार से रह रही आबादी के बल पर इतनी उपलब्धि हासिल कर सकता है तो जब सभी मानव संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग होगा, तब यह देश कहाँ पहुँच जाएगा? कितनी ऊँचाइयों को छू लेगा? इसीलिए हाल में मैं एक बिंदु पर बार-बार बल दे रहा हूँ मेरे लिए 'भारत उदय' का अर्थ है प्रत्येक भारतीय का उदय। मेरे लिए विकसित देश के रूप में भारत अभ्युदय का अर्थ है प्रत्येक भारतीय का सर्वांगीण विकास।

क्या यह संभव है? हाँ, ऐसा हो सकता है क्या, हम भारत में गरीबी को इतिहास का वृत्तांत बना सकते हैं? हाँ, हम ऐसा कर सकते हैं। मेरे विचार में, इस प्रयास में सफलता की कुंजी मात्र भली प्रकार से तैयार की गई नीतियाँ एवं कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि अच्छा और ईमानदार शासन है। नीतियों आदि का महत्त्व अवश्य है। हमें चाहिए उद्यमिता को बढ़ावा देनेवाली अच्छी नीतियाँ। हमें चाहिए श्रेष्ठ गुणवत्ता को भौतिक तथा सामाजिक बुनियादी संरचना। हमें चाहिए विशेष रूप से अपनी कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान डालने के लिए आवश्यक उपाय। कृषि के बाद सबसे ज्यादा संख्या में लोगों को रोजगार देनेवाले असंगठित तथा अनौपचारिक क्षेत्र में जीवंत स्पंदन लाना अत्यावश्यक बन गया है। हमें सभी के लिए सभी स्तरों पर गुणात्मक शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी। हमें समुचित वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय संसाधनों का इस्तेमाल करके ज्ञान तथा व्यवहार के अग्रणी क्षेत्रों में देशीय क्षमताओं का सृजन करना होगा। हमें अपने पर्यावरण में हो रहे ह्रास को रोकना है, जिसके प्रति हमारी प्राचीन संस्कृति हमें आदर सम्मान करने के लिए उद्बोधित करती है। हमें ऐसे अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए, जो तेजी से परिवर्तनशील विश्व में उत्पन्न हो रहे हैं तथा ऐसा करते समय हमें ग्लोबलाइजेशन (भूमंडलीकरण) के नकारात्मक प्रभावों से स्वयं को बचाना है।

यह भी सत्य है कि हमें समग्र विकास ही नहीं करना बल्कि समग्र सुरक्षा भी सुनिश्चित करना है। हमारी सुरक्षा की अवधारणा में भारत की बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षाअर्थात् देश की सुरक्षा और आम आदमी की सुरक्षादोनों सम्मिलित होनी चाहिए। विश्वसनीय एवं व्यापक सुरक्षा के बिना विकास ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के रूप में हमारी उत्तरजीविता को भी खतरा होगा।''

Read more...