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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
ईसाई समुदाय की व्यथा तथा मतांतरण पर वाद-विवाद

विविधता में एकता, सभी धर्मों के प्रति आदर तथा अलग-अलग मतों के प्रचारक लोगों के बीच परस्पर सहनशीलता, सहअस्तित्व की भावना की दृष्टि से भारत विश्व के सामने गौरवशाली एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राय: कुछ स्थानीय परिस्थितियों में, विभिन्न धर्मों पर आधारित समुदायों के बीच संबंधों के साथ-साथ तनाव भी प्रदर्शित होता है, जो अकसर हिंसात्मक संघर्ष की आग में घी का काम करता है। एक ही समुदाय के भीतर भी संबंधों में तनाव के बारे में भी यह बात सही पाई गई है। लेकिन ऐसी सभी घटनाएँ निरपवाद रूप से मतिभ्रंश के कारण होती हैं और ये भारत की सामाजिक वस्तुस्थिति का स्थायी चरित्र नहीं है। ये मात्र अपवाद हैं, न कि कोई नियम।

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'राम सेतु' पर विवाद के बारे में आडवाणीजी के विचार

''सितंबर 2007 में 'रामसेतु' के मामले में हिंदू भावनाओं को उस समय गहरी ठेस पहुँची जब तमिलनाडु के पास सेतु समुद्रम शिप कैनाल परियोजना में 'रामसेतु' पर निरंतर छिड़s विवाद में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत हलफनामे में दावा किया कि भगवान् राम का कोई अस्तित्व ही नहीं था तथा 'रामायण' का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। इसपर और नमक छिड़कते हुए सत्तारूढ़ गठबंधन की एक पार्टी के नेता ने भगवान् राम के बारे में और भी ज्यादा अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। देश के सर्वोच्च न्यायालय में हिंदुओं को आघात पहुँचानेवाला हलफनामा पेश करके कांग्रेस पार्टी तथा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने विश्व भर के करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहँचाई है। पंथनिरपेक्षता का दावा करनेवाली सरकार का हिंदुओं की श्रेष्ठतम भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना, उन्हें तुच्छ या कूड़ा-करकट समझना, ईश-निंदा तथा अनधिकार चेष्टा, असंवेदनशीलता एवं उद्दंडता है। विविध दायरों में सरकार ने वह सब नकार दिया, जिसे हिंदू अपने धर्म में पवित्र, पावन समझते आ रहे हैं।'

मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, 'मैं यह बताना चाहूँगा कि 'महाभारत' के साथ 'रामायण' को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सभी महान् नेताओंमहात्मा गांधी से लेकर लोकमान्य तिलक एवं जवाहरलाल नेहरू से लेकर सरदार पटेल तकने भारत की राष्ट्रीय संस्कृति एवं अस्मिता की आधारशिला स्वीकार किया है। इसे मात्र पौराणिकता एवं कोरी कल्पना बताकर सरकार ने भारत के बारे में बने विचार को क्षत-विक्षत किया तथा हमारे प्राचीन राष्ट्र की सभ्यता की दृष्टि से पहचान के बारे में नए सिरे से सिखाने की कोशिश की।'

यद्यपि सरकार ने शीघ्रतापूर्वक इस निंदनीय हलफनामे को वापस ले लिया था, फिर भी इसने हिंदू संगठनों तथा धार्मिक नेताओं की यह माँग स्वीकार नहीं की है कि उस परियोजना का परित्याग कर दे, जिसमें 'रामसेतुÓ को नष्ट करने पर विचार किया जा रहा है।''

पंथनिरपेक्षता बनाम छद्म-निरपेक्षता

भगवान राम और बाबर की तुलना

''अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का निकट संबंध विकृत पंथनिरपेक्षतावाद से है। यह भी कहा जा सकता है कि विकृत पंथनिरपेक्षता ही अल्पसंख्यकवाद का औचित्य स्थापित करती है। इसकी व्याख्या इस प्रकार से की जा रही है तथा इसे इस प्रकार से व्यवहार में लाया जा रहा है कि भारत की संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से बनी पहचान को नकारा जा रहा है। मैंने अयोध्या आंदोलन के संदर्भ में विस्तारपूर्वक इस मुद्दे पर विचार किया है, जहाँ पंथनिरपेक्षता के नाम पर भगवान् राम और बाबर को समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया गया तथा रामजन्मभूमि से जुड़ी करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं की घोर उपेक्षा की गई। 'क्या आप सिध्द कर सकते हैं कि राम ठीक इसी स्थान पर पैदा हुए थे?' कम्युनिस्ट बुध्दिजीवियों ने अपमानजनक लहजे में पूछा, जबकि हिंदू-इतर समुदाय से संबंधित विवाद के मामले में वे ऐसा कदापि नहीं कर सकते।

वर्ष 1987 में हिंदी पत्र 'वामा' में साक्षात्कार देते समय मैंने कहा था कि यदि बाबर के साथ भारतीय मुसलमानों का कोई वर्ग तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास करता है तो यह ठीक वैसे ही होगा जैसे दिल्ली के ईसाई इस आधार पर महात्मा गांधी की मूर्ति की जगह जॉर्ज पंचम की मूर्ति स्थापित करने के लिए झगड़ा करें कि जॉर्ज पंचम ईसाई था। अब गांधीजी धर्म की दृष्टि से हिंदू हो सकते हैं, लेकिन वे पूरे देश से जुड़े थे, जबकि जॉर्ज पंचम नहीं। इसी प्रकार, राम इस देश के हैं, चाहे हम उन्हें पौराणिक नायक कहें या ऐतिहासिक पात्र। यहाँ तक कि इतिहास और संस्कृति के मुद्दे पर मैं इस देश के मुस्लिम नेताओं से यह अनुरोध करना चाहूँगा कि यदि इंडोनेशिया के मुसलमान राम और 'रामायण' पर गर्व अनुभव कर सकते हैं तो भारतीय मुसलमान क्यों नहीं?''

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हिन्दुत्व

 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की अवधारणा में भारत के विभिन्न धर्म अनुयायियों को यह आदेश दिया गया है कि विविधताओं को कायम रखते हुए प्राचीन देश की साझा संस्कृति का आदर करो, गर्व महसूस करो। अन्य राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखी जाए, न ही अन्य धर्मों को झूठा या हीन समझें, बल्कि यह सीखें कि प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषताएँ हैं। छल-कपट से, धर्मांतरण के माध्यम से अपने धर्मानुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न करें। अलगाववाद के प्रचार के प्रयोजन के लिए या धर्मतंत्र की स्थापना के लिए राजनीतिक वर्चस्व प्राप्त करने की कोशिश न करें। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का अर्थ इससे न ज्यादा है, न इससे कम।'

सैमुअल हंटिग्टन की पुस्तक ''हू आर वी?'' का मैंने यह सुझाव देने के लिए उल्लेख किया है कि सभी भारतीयों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए, 'हम कौन हैं?' अमेरिका से भिन्न हमारा राष्ट्र प्राचीन है। इसका इतिहास मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव से प्रारंभ होता है। अमेरिका के विपरीत, हमारी अधिकांश जनसंख्या सदियों से भारत में ही रहतh आ रहh है। जनसंख्या के किसी वर्ग की धार्मिक पहचान बदलने से राष्ट्र की पहचान नहीं बदल सकती। भारत के इतिहास में कभी यहाँ के किसी वर्ग का सामूहिक संहार नहीं किया गया, जैसा अमेरिका में वहाँ के मूल निवासियों के संदर्भ में हुआ। इसलिए यदि चार सौ वर्षों में अमेरिका की भावना वहाँ के लोगों को एकसूत्र में बाँध सकती है तो निश्चित रूप में अधिक संतुलित, दृढ़ तथा अंतर्भूत मानवतावादी 'भारतीयता' की भावना भी हजारों वर्षों से रह रहे विभिन्न धार्मिक, जातीय, भाषायी तथा नस्लीय समूहों को एकता के सूत्र में बाँध सकती है। चूँकि 'इंडियन' शब्द हाल ही की नई विचारधारा पर आधारित है, इसलिए एकीकरण का सिध्दांत 'हिंदुत्व' ही है। उदार विचारों से परिपूर्ण, सहनशील, बहुवादी तथा व्यापक भारतीय परंपरा का यह पर्यायी नाम है। यदि भारत को अ-हिंदु किया गया तो भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।

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अल्पसंख्यकवाद की राजनीति

सकारात्मक सोच रखनेवाले इस देश के लोगों, इनमें विचारशील कांग्रेसी भी शामिल हैं, से मेरा अनुरोध है कि अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के विरुध्द वे आवाज उठाएँ। चूँकि भारत मजहब आधारित राज्य नहीं है, इसलिए विभिन्न आस्थाओं पर आधारित समुदायों की पहचान और मजहबी अधिकार, जिससे वृहत्त भारतीय परिवार बनता है, को अवश्य ही संरक्षित किया जाना चाहिए। लेकिन 'बहुसंख्यक' और 'अल्पसंख्यक' धारणाओं का हमारे देश की राजनीति तथा शासन-पध्दति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इन धारणाओं का दुरुपयोग वोटबैंक की राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए। यह विभाजक मानसिकता भारत की संयुक्त एकता और सामंजस्यपूर्णता को खतरे में डालती है। ब्रिटिश शासकों के समान 'कांग्रेस पार्टी अपने स्वार्थों की खातिर' अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर राष्ट्र को निरंतर बाँट रही है।