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भारतीय जनता पार्टी के लिए कांग्रेस विपक्षी दल है न कि 'शत्रु' हमारा फलता-फूलता बहुदलीय लोकतंत्र है। हमारे राजनीतिक तंत्र की विविधता में शक्ति तथा जीवंतता का स्रोत निहित है। चूँकि कांग्रेस पार्टी का भौगोलिक दृष्टि से देश भर से प्रभुत्व का दौर लगभग समाप्त हो चुका है, इसलिए भारत की समकालिक राजनीति का विन्यास अनिवार्यत: दो शक्तियों पर टिक गया हैराष्ट्रीय स्तर पर भाजपा तथा कांग्रेस पार्टी दो प्रमुख एवं स्थायी केंद्र बन गए हैं। इन दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों के अलावा विशिष्ट क्षेत्रीय या सामाजिक आकांक्षाओं से पहचानी जानेवाली अन्य अनेक पार्टियाँ भी हैं। केंद्र तथा अनेक राज्यों में मिली-जुली सरकार का गठन समय की माँग बन गई है। कुछ भागीदार समय-समय पर अपना गठबंधन बदलते भी रहते हैं। पिछले दो दशकों में इस विकास के कारण राज्य व्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौती खड़ी हो गई है। यह किस प्रकार से सुनिश्चित किया जाए कि बहुदलीय प्रणाली में, उसकी अच्छाइयों और बुराइयों के बावजूद, मूल एकता तथा प्रयोजन की निरंतरता कायम रह सकती है? स्वाभाविक है, इस संबंध में क्षेत्रीय या प्रांतीय पार्टियों की तुलना में राष्ट्रीय पार्टियाँ अधिक उत्तरदायी हैं। इसलिए सभी पार्टियों ने बुनियादी स्तर पर सर्वसम्मति तथा अनिवार्यत: दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों के बीच सर्वसम्मति की परम आवश्यकता है। यह स्वाभाविक है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच मतभेद (अन्य पार्टियों के बीच भी) बने रहेंगे, क्योंकि ये अलग विचारधाराओं का प्रचार करते हैं तथा विकास के अलग-अलग मार्गों का अनुसरण करते हैं। इसके बावजूद दोनों के लिए संभव है, तथा आवश्यक भी है, कि व्यापक राष्ट्रीय महत्तावाले मुद्दों पर सहयोग की संभावनाओं का पता लगाया जाए और ऐसे क्षेत्र को और बढ़ाया जाए। इसके लिए यह अनिवार्य है कि सभी पार्टियों में परस्पर तनाव की जगह सहयोग की भावना विकसित हों और बुनियादी स्तर तक परस्पर संवाद बना रहे, जिसका प्रतियोगी चुनावी राजनीति के संकीर्ण विचारों की दृष्टि से त्याग नहीं किया जा सकता। |
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यह इस पृष्ठभूमि से भिन्न है कि मैं भारत की लोकतांत्रिक परम्परा और संघर्ष समाधान हेतु हमारे दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रस्तुत करना चाहता हूॅ। यह परम्परा और दृष्टिकोण मौलिक रुप से हिन्दू-दर्शन और सांस्कृतिक लोकाचारों से प्रभावित हैं। हमारी सभ्यता के प्रारंभ से ही हिन्दू-दर्शन अपने दृष्टिकोण और शिक्षाओं में बहुलतावादी रहा है। इसके फलस्वरुप, अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली में भारत अन्तर्निहित रुप से अकेला ही एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने आदर्शो एवं सिध्दांतों को दूसरे राष्ट्रों पर थोपना नहीं चाहता। इसीलिए भारत ने अपने हजारों साल के इतिहास में अपनी सेनाओं को दूसरे देश की भूमि जीतने और वहॉ के मूल निवासियों अथवा संस्कृतियों को मिटाने अथवा कुचलने के लिए कभी नहीं भेजा। बहुलवाद में विश्वास रखने और दूसरे के मत एवं विचारों का आदर करने के कारण ही भारत ने आजादी हासिल करने के बाद स्वाभाविक तौर पर लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षवाद को स्वीकार किया। हमने यह मंत्र पश्चिम देशों से हासिल नहीं किया। आप स्वयं से एक साधारण सा प्रश्न पूछिए : ऐसा क्यों है कि भारत जैसे विशाल और विभिन्नताओं वाले देश जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीब और कम पढ़ा लिखा हुआ है, में सेना का कभी-भी वर्चस्व नहीं रहा। कभी-भी हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है? भारत नियमित चुनाव कराने में कैसे सफल रहा है, जोकि हमेशा निष्पक्ष हुए और जिनके नतीजे हमेशा सभी राजनैतिक दलों ने स्वीकार किए है? हॉ आपातकाल के दौरान लोकतंत्र का कुछ हनन अवश्य हुआ था, लेकिन जनता ने आपातकाल के विरुध्द इतने आक्रोश में मतदान किया कि इन्दिरा गांधी जैसी कद्दावर नेता को भी पराजय का मुॅह देखना पड़ा था। |
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नेतृत्व, नेतागिरी से भिन्न 'लीडरशीप' आम इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है लेकिन इसके कई अर्थ भी हैं जो संदर्भ और नेतृत्व के स्वरूप पर निर्भर करते हैं। हमारे समाज में लीडरशीप या 'नेतृत्व' को विशेषकर आधुनिक समाज में आमतौर पर 'राजनीतिक नेतृत्व' के रुप में समझा जाता है। इसलिए नेता को प्राय: एक राजनीतिक नेता समझा जाता है। नेतागिरी आज के भारत की वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया में एक व्यापक प्रचलित शब्द है। हालांकि यह नेतृत्व से बिल्कुल अलग है। नेतृत्व अपने समर्थकों का एक समूह जुटाकर किसी कठिन कार्य को पूरा करने हेतु अपनी दूरदृष्टि, पक्के इरादे और योग्यता के सकारात्मक गुणाेंं के सम्मिश्रण का आभास देता है। इसके विपरीत, जनता के मन में नेताओं के बारे में धारणा बहुत सकारात्मक नहीं है। साथ ही, भारत में राजनीतिक नेताओं को निजी तौर पर जो बहुत अधिक सम्मान और महत्व मिलता है, वह वास्तविकता से ज्यादा होता है। राजनीतिक नेताओं को गैर-अनुपातिक तौर पर मिलने वाला यह सम्मान और महत्व वस्तुत: राष्ट्रीय जीवन के अन्य क्षेत्रों के नेताओं के लिए अपेक्षित सम्मान की कीमत पर मिलता है। नेतृत्व एक आम अवधारणा है जो राजनीति तक ही सीमित नहीं है बल्कि नेतृत्व की आवश्यकता व्यावहारिक तौर पर सामाजिक प्रगति, राष्ट्र-निर्माण, मानव जाति के कल्याण हेतु मानवीय प्रयासों के प्रत्येक क्षेत्र में होती है। |
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