पुस्तक के अंश
चरण-1 (1927-1947)

चरण एक (1927-47) में आडवाणीजी के सिंध में बिताए गये प्रारम्भिक दिनों का उल्लेख है। जब भारत में अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन का अंत हो रहा था, देश के- भारत-पाकिस्तान-दो अलग-अलग देशों के रुप में रक्त-रंजित विभाजन की हृदय- विदारक कहानी का इसमें वर्णन किया गया है। आडवाणी भी उन लाखों लोगों में शामिल थे जो पाकिस्तान छोड़कर भारत आये थे तथा जो भारत से विस्थापित होकर पाकिस्तान गये थे। सिंध का एक आकर्षक सामाजिक-आध्यात्मिक इतिहास बताने के बाद, आडवाणीजी ने कराची (जिसे वे अपना ''मन पसन्द'' शहर बताते हैं) में घर और स्कूल में बिताए गये दिनों का वर्णन किया है। वे अपने जीवन पर पड़े दो रुपान्तरकारी प्रभावों के बारे में भी लिखते हैं; एक राष्ट्रवादी संगठन-राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ जिसमें वे 14 साल की उम्र में एक स्वयंसेवक के रुप में शामिल हुए थे और दूसरे, कराची में रामकृष्ण मठ के प्रमुख तथा स्वामी विवेकानंद के दर्शन के एक बहुश्रुत व्याख्याता स्वामी रंगनाथानंद का जिनसे वे पहली बार कराची में मिले थे।

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चरण-2 (1947-1957)

चरण दो (1947-57) में राजस्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक (संगठक) और भारतीय जनसंघ के एक सक्रिय कार्यकर्ता के रुप में आडवाणीजी के जीवन का उल्लेख है। आडवाणीजी कहते है कि ''इस चरण ने मुझे सार्वजनिक जीवन और राजनीति में प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान की। इसी ने मेरे संगठन की विचारधारा और आदर्शवाद को समर्पित एक सादगीपूर्ण एवं अनुशासित जीवन जीने के मेरे संकल्प को मजबूती दी।'' इस चरण का एक महत्वपूर्ण भाग महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच परस्पर सम्मानपूर्वक सम्बंधों पर प्रकाश डालता है। आडवाणीजी भारतीय वामपंथी पार्टियों के इस घिनौने प्रचार कि जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के पीछे भारतीय जनसंघ का हाथ था, का दृढतापूर्वक खंडन करते हैं।

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चरण-3 (1957-77)

चरण तीन (1957-77) में आडवाणीजी का नई दिल्ली में एक राजनीतिक नेता के रूप में प्रादुर्भाव होने का उल्लेख किया गया है। वे लिखते हैं, '' जनसंघ के मुख्य दार्शनिक, मार्गदर्शक और संगठनकर्ता पं0 दीनदयाल उपाध्याय द्वारा मुझसे अपना कार्यक्षेत्र दिल्ली में बनाने और अटलजी जो उस समय हाल ही में लोक सभा के लिए पहली बार निर्वाचित हुए थे, के राजनीतिक सहयोगी के रुप में काम करने के लिए कहा गया था। इन्हीं दोनों दशकों के दौरान मैंने राजनीतिक संगठन, राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व के उन्नत अनुभव किए।'' भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा जून, 1975 में क्रूर आपातकाल शासन लागू किए जाने का वर्णन इस चरण का विशेष रुप से एक भयावह हिस्सा है। लाखों लोकतंत्र समर्थकों तथा विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं के साथ आडवाणीजी ने भी उन्नीस महीने जेल में बिताए। इस चरण में आपातकाल की दु:खद गाथा और लोकतंत्र की रोमांचकारी विजय की कहानी का व्यापक रुप में वर्णन किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि किस तरह से कांग्रेस नेतृत्व ने संविधान के मूल ढांचे को तहस-नहस करने की कोशिश की। इस गलत कार्य पर पार्टी ने कभी भी न तो ईमानदारीपूर्वक बहस कराई और न ही इसके लिए खेद प्रकट किया। आडवाणीजी लिखते हैं, ''इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।'' चूंकि कांग्रेस में एक परिवार-विशेष के शासन की संस्कृति में नेहरु-गांधी परिवार द्वारा की गई अनेक भयंकर त्रुटियों पर आत्म-विश्लेषण करने अथवा स्वयं-सुधार करने की कोई जगह नहीं है जिसके लिए भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। वास्तव में, विशेष परिवारवाद अब ''कांग्रेस के बुनियादी ढांचे'' का एक हिस्सा बन गया है।

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चरण-4 (1977-97)

वर्ष 1977 से 1997 तक चौथे चरण में आडवाणीजी एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता के रुप में उभरे। इस चरण में संसद में और आपातकाल के दौरान पैदा हुई तानाशाही के कानूनी ढांचे को तोड़कर सत्ता में आई जनता सरकार (1977-97) में सूचना तथा प्रसारण मंत्री के रुप में उनके उत्कृष्ट कार्यों का वर्णन किया गया है। इसमें जनता पार्टी के विखंडन और भारतीय जनता पार्टी  के गठन का एक संक्षिप्त ब्यौरा भी दिया गया है। इस चरण के विशेष रुप से आकर्षित करने वाले भाग में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण हेतु आन्दोलन में भारतीय जनता पार्टी की सक्रिय भागीदारी का वर्णन है। आडवाणीजी लिखते हैं: ''यह शीघ्र ही स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़े आन्दोलन में परिवर्तित हो गया।'' सितम्बर-अक्टूबर 1990 में सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की मेरी राम रथ यात्रा को देखने उमड़ी जनता की भीड़ मेरी अपेक्षाओं से काफी अधिक रही। आपातकाल के विरुध्द संघर्ष को देखकर मेरी आखें खुली रह गर्इं कि भारतीय जनता का लोकतंत्र में कितना अटूट विश्वास है। अयोध्या आन्दोलन के दौरान मैं यह देखकर चकित रह गया कि देश भर में सभी जातियों एवं सम्प्रदायों के हिन्दुओं के जीवन में धर्म का कितना गहरा प्रभाव है। अयोध्या आन्दोलन से कांग्रेस पार्टी, वामपंथी पार्टियों तथा कुछ अन्य पार्टियों द्वारा व्यवहार में लाई गई छदम्-पंथनिरपेक्षता के प्रति जनता की प्रतिक्रिया भी सामने आई और मेरी पार्टी को वास्तविक पंथनिरपेक्षता का पक्का समर्थक बताया गया। इस चरण का अंत आडवाणीजी के जीवन में एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियान--स्वर्ण-जयंती रथ यात्रा के वर्णन से हुआ है जो भारत की स्वतंत्रा की स्वर्ण-जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी।

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चरण-5 (1997-2007)

चरण पॉच (1997-2007) में आडवाणीजी के राजनीतिक जीवन की प्रमुख उपलब्धियों का उल्लेख है। वर्ष 1989 से भारतीय जनता पार्टी के चमत्कारिक उत्कर्ष की परिणति मार्च 1998 में श्री अटल विहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केन्द्र में पहली सही मायने में एक गैर-कांग्रेसी गठबंधन वाली सरकार के गठन में हुई। वर्ष 1999 में नये जनादेश के साथ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने पूर्ण निष्ठा और विशिष्टता के साथ छह वर्षों तक राष्ट्र की सेवा की। ''इस सरकार में वाजपेयीजी के सहयोगी के रुप में मुझे गृह मंत्रालय का विनिर्दिष्ट कार्यभार सौंपा गया था। मेरी भूमिका मेरे लिए अति सन्तोष जनक थी। राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास में राजग सरकार की  कई उपलब्धियों पर मुझे गर्व है। उनमें से कुछ, जैसे भारत को परमाणु शक्ति-संपन्न बनाने का साहसी निर्णय और पाकिस्तान के विश्वासघात के बावजूद उससे अपने संबंधों को सामान्य बनाने के लिए ईमानदारी के साथ किए गए हमारे प्रयास देश के इतिहास में अमिट रहेंगे। यह इतिहास में दर्ज होगा कि वाजपेयी के नेतृत्व में भारत एक अधिक शक्तिशाली राष्ट्र, एक अधिक आत्म-विश्वासपूर्ण राष्ट्र बना।''

इस चरण में मई, 2004 के संसदीय चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की अप्रत्याशित पराजय का एक स्पष्ट और स्व-आलोचनात्मक मूल्यांकन भी दिया गया है। आडवाणीजी कहते हैं  ''इसमें मुझे रंचमात्र भी संदेह नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी पहले की तरह फिर से सत्ता में आयेगी।'' पुस्तक के इस भाग की मुख्य बातों में ये शामिल हैं- पाकिस्तान द्वारा समर्थित सीमा पार से आतंकवाद जिसे धार्मिक चरमपंथियों द्वारा उकसाया जा रहा है, के विरुध्द वाजपेयी सरकार की निर्णित लड़ाई; कारगिल युध्द में भारत की विजय; पाकिस्तान के साथ संबंधों को समान्य बनाने हेतु वाजपेयी-आडवाणी, दोनों के ईमानदारीपूर्वक प्रयास; वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा शिखर सम्मेलन से आशाएं तथा नैराश्य और जून, 2005 में आडवाणीजी की ऐतिहासिक पाकिस्तानी यात्रा। इस यात्रा से उठे विवाद के बारे में वे कहते हैं, ''मुझे कोई खेद नहीं है।''

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